ईदी बनाम अहसान


कई साल पहले की बात है... हम रिश्ते के मामा के घर गए हुए थे... हमने अपने मामूज़ाद भाई ज़ुल्फ़िक़ार को ईदी में पांच सौ रुपये दे दिए, उसने बहुत ना-नुकर की... हमने कहा कि ईदी को मना नहीं करते... सो, उसने पैसे ले लिए... कुछ देर बाद मामी आईं, शायद वो पड़ौस में गई हुई थीं... हमने उन्हें मिठाई का डिब्बा दिया... उन्होंने बहुत ना-नुकर की और कहने लगीं, देने का फ़र्ज़ तो हमारा है, हम कैसे ले सकते हैं... हमने कहा कि अम्मी ने भिजवाई है... ख़ैर उन्होंने मिठाई ले ली...
कुछ देर बाद उनके जेठ आए... उन्होंने हमें और ज़ुल्फ़िक़ार को दो-दो सौ रुपये की ईदी दी... मामी फिर ना-नुकर करने लगीं, लेकिन बड़े मामा पैसे देकर चले गए... दोपहर में मामा आए, तो मामी कहने लगीं, तुम्हारे बड़े भाई आए थे. ज़ुल्फ़िक़ार को दो सौ रुपये दे गए हैं. जाओ अपनी भतीजी को तीन सौ रुपये दे आओ, हम किसी का अहसान नहीं रखते... मामा बोले, पहले कुछ खाने को दे दो, लेकिन वो नहीं मानी कहने लगी, पहले अहसान उतार कर आओ, फिर कुछ खाना-पीना...
हम सोचने लगे कि ये हमारे साथ भी यहीं करने वाली हैं... हुआ भी यही, जब हम चलने लगे, तो उन्होंने हमारे हाथ पर छह सौ रुपये रख दिए... हमने बहुत मना किया, लेकिन वो नहीं मानी...
घर आकर हमने अम्मी से कहा कि अब इस मामी की चौखट पर कभी क़दम नहीं रखेंगे...

ईदी तो ख़ुशी की चीज़ हुआ करती है और उन्होंने इसे ’अहसान’ कहकर ’बोझ’ बनाकर रख दिया... हम सोचने लगे, अगर मामी किसी को एक गिलास पानी पिलाती होंगी, तो सोचती होंगी कि उन्होंने सामने वाले पर कितना बड़ा अहसान किया है... ज़िन्दगी में हम प्यासे मर जाएंगे, लेकिन मामी से कभी एक बूंद पानी नहीं लेंगे...

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3 Response to "ईदी बनाम अहसान"

  1. Satish Saxena says:
    22 अप्रैल 2015 को 9:00 pm

    यही मानसिकता है …।

  2. राजेंद्र कुमार says:
    23 अप्रैल 2015 को 11:34 am

    आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (24.04.2015) को "आँखों की भाषा" (चर्चा अंक-1955)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

  3. Sanju says:
    24 अप्रैल 2015 को 9:23 pm

    सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
    शुभकामनाएँ।
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

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