106 सूरह क़ुरैश
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*सूरह क़ुरैश*
*बिस्मिल्लाह हिर्रहमा निर्रहीम*
1 लि इलाफ़ी क़ुरैश.
2 इलाफ़िहिम.
3 रिहलतश शिफ़ाई वस सैफ़.
4 फ़ल यअबुदू रब्बा हाज़ल बैत.
5 अल्लज़ी अत अमाहुम मिन ...
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20 दिसंबर 2009 को 12:35 am बजे
कोमल भावों की प्रभावशाली अभिव्यक्ति। -
http://drashokpriyaranjan.blogspot.com
http://www.ashokvichar.blogspot.com
20 दिसंबर 2009 को 12:36 am बजे
वाह बहुत सुंदर बात
20 दिसंबर 2009 को 1:32 am बजे
फिरदौस साहिबा,
'इंसान जितना.....यही ज़िंदगी है
ऐसा क्यूं सोचती हैं आप?
जिगर साहब का एक शेर समाअत फरमायें-
चला जाता हूं हंसता खेलता दौरे-हवादिस से
अगर आसानियां हों, ज़िंदगी दुश्वार हो जाये...
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद
20 दिसंबर 2009 को 8:05 am बजे
उलझन जीवन की सखा कभी न छूटे साथ।
खुशियाँ मिलतीं हैं तभी मिले हाथ से हाथ।।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
20 दिसंबर 2009 को 12:16 pm बजे
सही बात कही आपने शुभकामनायें