ख़त...

ख़त...
दूधिया वरक़ों पर लिखे
ज़ाफ़रानी हर्फ़
उसने
काग़ज़ पर नहीं
मेरी रूह पर टांक दिए थे...
-फ़िरदौस ख़ान
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6 Response to "ख़त..."

  1. अजय कुमार says:
    22 दिसंबर 2009 को 6:14 pm

    चंद लफ्जों में खत के खासियत का खुलासा

  2. वन्दना says:
    22 दिसंबर 2009 को 6:33 pm

    bahut khoob.........kya baat hai.

  3. महफूज़ अली says:
    22 दिसंबर 2009 को 7:47 pm

    चंद लफ़्ज़ों.... में खूबसूरत नज़्म....

  4. Apoorv says:
    22 दिसंबर 2009 को 10:52 pm

    खूबसूरत...रूह पर टंके इन खतों के हर्फ़ ही उसकी मुकद्दर की जाफ़रानी इबारत बन जाते हैं..हमेशा के लिये..
    चंद पंक्तियों मे कमाल..

  5. शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' says:
    23 दिसंबर 2009 को 12:06 am

    क्या बात है,
    'दूधिया वरक़'
    'जाफ्ररानी हर्फ़'
    और
    रूह पर टांक देने की बात......
    उपमाओं के हवाले से ऐसी नज्म
    ब्लाग पर तो कहीं नज़र नही आई
    फिरदौस साहिबा,
    आप तो गुलज़ार साहब के लिए 'खतरा' बनती जा रही हैं!
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

  6. मौसम says:
    6 मार्च 2010 को 9:13 pm

    ख़त...
    दूधिया वरक़ों पर लिखे
    ज़ाफ़रानी हर्फ़
    उसने
    काग़ज़ पर नहीं
    मेरी रूह पर टांक दिए थे...

    सुब्हानअल्लाह.......अब क्या कहें.......लफ़्ज़ ही नहीं मिल रहे हैं.......

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