गुलाब-सी महकी यादें




चंद यादें
ज़िन्दगी के आंगन में
खिले सुर्ख़ गुलाबों की तरह
होती हैं
जिनकी भीनी-भीनी ख़ुशबू
मुस्तक़बिल तक को महका देती है...
-फ़िरदौस ख़ान
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सहरा की धूप नज़र आती है ये हयात


पतझड़ में मुझको ख़ार का मौसम बहुत अज़ीज़
तन्हा उदास शाम का आलम बहुत अज़ीज़

छोटी-सी ज़िन्दगी में पिया है कुछ इतना ज़हर
लगने लगा है मुझको हर इक ग़म बहुत अज़ीज़

सहरा की धूप नज़र आती है ये हयात
जाड़ों की नरम धूप-सा हमदम बहुत अज़ीज़

सारी उम्र गुज़ारी है ख़ुदा ही के ज़िक्र में
मोमिन की नात में ढली सरगम बहुत अज़ीज़

सूरज के साथ-साथ हूं आशिक़ बहारे-गुल
सावन बहुत अज़ीज़, शबनम बहुत अज़ीज़
-फ़िरदौस ख़ान

शब्दार्थ
अज़ीज़ : प्रिय
हयात : ज़िन्दगी

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जगह मिलती है हर इक को कहां फूलों के दामन में


किसी को दुख नहीं होता, कहीं मातम नहीं होता
बिछड़ जाने का इस दुनिया को कोई ग़म नहीं होता

जगह मिलती है हर इक को कहां फूलों के दामन में
हर इक क़तरा मेरी जां कतरा-ए-शबनम नहीं होता

हम इस सुनसान रस्ते में अकेले वो मुसाफ़िर हैं
हमारा अपना साया भी जहां हमदम नहीं होता

चरागे-दिल जला रखा है हमने उसकी चाहत में
हज़ारों आंधियां आएं, उजाला कम नहीं होता

हर इक लड़की यहां शर्मो-हया का एक पुतला है
मेरी धरती पे नीचा प्यार का परचम नहीं होता

हमारी ज़िन्दगी में वो अगर होता नहीं शामिल
तो ज़ालिम वक़्त शायद हम पे यूं बारहम नहीं होता

अजब है वाक़ई 'फ़िरदौस' अपने दिल का काग़ज़ भी
कभी मैला नहीं होता, कभी भी नम नहीं होता
-फ़िरदौस ख़ान
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परंपरा में रहकर परंपरा से मुक्ति 'मेले में यायावर'

फ़िरदौस ख़ान
सीमा में रहते हुए असीम हो जाना और परंपरा का अनुगमन करते हुए परंपरा का अतिक्रमण कर जाना किसी चमत्कार के द्वारा ही संभव है, लेकिन डॉ. राम सनेही लाल शर्मा 'यायावर' के नवीनतम गीत संग्रह 'मेले में यायावर' से गुंजरते हुए यह अनुभूति पग-पग पर होती है. सुकीर्ति प्रकाशन कैथल से प्रकाशित उनका संग्रह 75 विविधवर्णी गीतों का गुलदस्ता है. गीत को अपना 'प्राण तत्व' अपनी 'ऊर्जा' और 'सर्वस्व' बताने वाले यायावर जी कई गीतों में परंपरागत कथ्य संसार और प्रचलित फार्मेट को अतिक्रमित करते दिखाई पडते हैं. कहीं वे छंद की छवि को तोडक़र नई लय-भंगिमा रच देते हैं और कहीं शब्दों के विचलनपरक प्रयोगों से नयी अर्थ-छवियों को जगा देते हैं. कहीं से विशुध्द परंपरागत गीतकार लगते हैं और कहीं शुध्द नवगीतकार. गीत भंगिमा का यही व्याप उन्हें गीतकारों से अलग करता है जहां-
-शैया पर अंगारे धरकर निंदा में नींद चुराई है
-कांधों पर घर है
-ये टूटी आस्थाओं वाले दरके दिन हैं
-जागरणों में हंसती रातें
-मौसम की सूखी टहनी पर फिर से वृंदावन चाहकेगा
-खेतों में उगती मिली अदावत की फ़सलें
-ढोंगी मुस्कानें
-कुंठाएं आकर लगी बैठने सिरहाने ले चली उदासी कान पकड़कर मैख़ाने
-कलह यहां कजरी गाती है गाता वैर मल्हारें
-हिंसक होकर प्रश्न अड़े हैं उत्तर सहमे हुए खड़े हैं
-पीड़ाएं हो गईं सयानी
-ले नपुंसक क्रोध भटके नौजवानी
-अब संबंधों के हर गमले में उगती है बस नागफनी
-कुछ मार रहे हैं अपने 'मैं' को कुछ हैं जिनको मारा मैं ने
-हर आंगन में छत से ऊंची तनी हुई मीनारें
जैसी अभिव्यक्तियां उन्हें गीत का पांक्तेय गीतकार ही सिध्द नहीं करतीं अपितु उनका शब्द-सामर्थ्य, शिल्प-कौशल और पुरातन शब्दों को ही अभिनव अर्थ गरिमा प्रदान करने की क्षमता का उद्धोष भी करती हैं.
डॉ. यायावर के गीतों का कथ्य-संसार बहु आयामी है. वे दर्शन की दुरूहता को गीत की स्नेहिल तरलता सौंपने में सिध्दहस्त हैं. इसलिए उनके गीतों में कहीं जीवन 'वृंदावन का रास' है और कहीं 'भागती हुई एक्सप्रैस गाडी', कहीं वह 'सागर की सीपी' है और कहीं 'मरूथल में अपनी गंध से विभ्रमित दौडते मृग की भटकन'. कभी डॉ. यायावर 'मंजुललित कोमल ललाम' कवि विद्यापतिको प्रणाम करते हैं और कभी मातृभूमि की महिमामयी गरिमा को मस्तक झुकाते हैं, लेकिन युग का जटिल यथार्थ, मूल्यों का धू-धूकर जलता लाक्षागृह, सांस्कृतिक प्रदूषण की धिक्कृत अवस्था नगरों का स्वार्थ रंजित, उपयोगितावाद, गांव की दरकती हुई 'अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है' वाली परंपरागत छवि तथा भारत की शस्य श्यामला धरती की हरियाली को चरने वाला डंकल उनकी 'तीसरी आंख' से ओझल नहीं है तभी तो वे-
बांचते हैं गीध अब पावन ऋचायें
पढ़ रहे हैं काक पौराणिक कथायें
जैसी पंक्तियों से राजनीतिक विद्रूपता और नायकों के प्रतिनायकों में बदल जाने की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति करते हैं.
और कभी-
लाठी चला रही जूते से
सरपंची कानून
मुखिया के बेटे से बड़ा
न कोई अफलातून
जैसी अभिव्यक्तियां से गांव के नंगे सच को रेखांकित कर रहे होते हैं. लोक संस्कृति से डॉ. यायावर को गहरा आत्मिक लगाव है इसीलिए वे शहरों के भस्मासुरी उदर में समाती पगडंडियों, पनघटों और चौपालों की व्यथा से पीडित हैं. साथ ही महानगर के प्रतीकों शोर, उन्माद, पोस्टर, ढोंग, बोरियत और काफीघर को भूल भुलैया कहकर उससे बाहर निकलने को अकुलाते हैं.
डॉ. यायावर अपने व्यष्टि को समष्टि की चिंता में विलीन करने की कला जानते हैं इसीलिए जब वे अपने बेटे को या पोती को संबोधित कर रहे होते हैं तब भी क्रमश: युग के भयावह दोगलेपन या 'कविता के भविष्य' या 'भविष्य की कविता' को लेकर चिंता प्रकट कर रहे होते हैं.
डॉ. यायावर के गीतों में मिथकों का प्रयोग नई अर्थ छवियां पैदा करता है. बांसुरी, कृष्ण, राधा, गोपी, अर्जुन, वृंदावन, कुबरी, यशोदा, राम, सीता, शकुनि, धृतराष्ट्र, कुम्भकर्ण, मेघनाद तथा हनुमान आदि मिथकों को वे बिल्कुल नए तेवर में प्रयुक्त कर उन्हें युगीन यथार्थ की अभिव्यक्ति का वाहक बना देते हैं. उनकी प्रतीकात्मकता उच्च स्तरीय है उनके प्रतीक जाने पहचाने हैं, लेकिन उनसे अभिव्यक्त अर्थ बिल्कुल भिन्न प्रकार का है. जंगल, अमराई, नदी, नाव, घाट, सूर्य, चंद्रमा, पगडंडी, पनघट, काफीघर, चिमनी, काक, गीध, कबीर, प्रश्न, उत्तर, मेघदूत, यक्ष, चौपाल, खेत, मेंड, फ़सल, पायल, चूनर आदि नितांत परिचित प्रतीक हैं, लेकिन इनके द्वारा होने वाला अर्थाभिव्यंजन नितांत नवीन है. गीतकार भाषा के स्तर पर ही नयापन नहीं करता छांदसिक संरचना में भी नवीनता उत्पन्न करता है मसलन उनके एक गीत का धु्रवपद व अंतरा देखें-
ज्वालामुखी दबाकर उर में बूंद-बूंद पडता है गलना
बेटे! बहुत संभलकर चलना
आपाधापी वाला यह युग जराजीर्ण है
जीवन का पथ सरल नहीं कंट काकीर्ण है
तापमान बढ़ रहा धरा कासपने नित्य जला करते हैं
गैरों से अपनापन मिलता अपने यहां छला करते हैं
छल के हाथों से छल जाना किंतु किसी को कभी न
यहां धु्रवपद की पहली पंक्ति 32 मात्रा की है. फिर 16 मात्रा की अध्र्दाली है. अंतरे की पहली व दूसरी पंक्ति 24-24 मात्रा की है. तीसरी, चौथी व पांचवीं पंक्तियां 32-32 मात्रा की हैं. पांचवीं पंक्ति के अध्र्दाश से तुक मिलती है, लेकिन एक ही अंतरे में छंद का यह वैविध्य होते हुए भी कवि ने यहां लय-भंग नहीं होने दी है, न पाठक इस छंद परिवर्तन को समझ जाता है. यही यायावर जी की कुशलता है.
ये गीत कवि के जीवन, जगत व ईश्वर के प्रति आस्था के सूचक हैं. मुख्य पृष्ठ उत्तम कोटि का है. प्रभावी है व शीर्षक को सार्थक करता है, लेकिन प्रूंफ की भूलें यत्र तत्र रह गई हैं. फिर भी यह गीत संग्रह गीत-जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएगा, ऐसी उम्मीद है.
समीक्ष्य कृति : मेले में यायावर (गीत संग्रह)
कृतिकार : डॉ. राम स्नेही लाल शर्मा
पृष्ठ : 128
मूल्य : 100 रुपए
प्रकाशन : 2007
प्रकाशक : सुकीर्ति प्रकाशन
करनाल रोड, कैथल-136027
(हरियाणा)

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माना हमारे ख़्वाब की ताबीर तुम नहीं


होठों पे नरम धूप सजाते रहे हैं हम
आंखों में जुगनुओं को छुपाते रहे हैं हम

माना हमारे ख़्वाब की ताबीर तुम नहीं
पलकों पे इनको फिर भी सजाते रहे हैं हम

हक़ दोस्ती का यूं तो अदा हो नहीं सका
ख़ुद को मगर ज़रूर मिटाते रहे हैं हम

ख़ुद अपनी ज़िन्दगी तो सज़ा बनके रह गई
राहे-वफ़ा जहां को दिखाते रहे हैं हम

भूली हुई गली में वो शायद कि आ ही जाए
इस आस में चराग़ जलाते रहे हैं हम

दो पल की ज़िन्दगी की ख़ुशी के लिए सदा
'फ़िरदौस' आंसुओं में नहाते रहे हैं हम
-फ़िरदौस ख़ान
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अब ख़्वाब भी नींदों में सताने नहीं आते


होंठों पे मुहब्बत के तराने नहीं आते
जो बीत गए फिर वो ज़माने नहीं आते

हल कोई जुदाई का निकालो मेरे हमदम
अब ख़्वाब भी नींदों में सताने नहीं आते

बादल तो गरजते हैं, मगर ये भी हकीक़त
आंगन में घटा बनके वो छाने नहीं आते

क़दमों में बहारें तो बहुत रहती हैं लेकिन
'फ़िरदौस' को ये रास ख़ज़ाने नहीं आते
-फ़िरदौस ख़ान
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बारिश में भीगती है कभी उसकी याद तो

नगमें रफ़ाक़तों के सुनाती हैं बारिशें
अरमान ख़ूब दिल में जगाती हैं बारिशें

बारिश में भीगती है कभी उसकी याद तो
इक आग-सी हवा में लगाती हैं बारिशें

मिस्ले-धनक जुदाई के ल्म्हाते-ज़िंदगी
रंगीन मेरे ख़्वाब बनाती हैं बारिशें

ख़ामोश घर की छत की मुंडेरों पे बैठकर
परदेसियों को आस बंधाती हैं बारिशें

जैसे बगैर रात के होती नहीं सहर
यूं साथ बादलों का निभाती हैं बारिशें

सहरा में खिल उठे कई महके हुए चमन
बंजर ज़मीं में फूल खिलाती हैं बारिशें

'फ़िरदौस' अब क़रीब मौसम बहार का
आ जाओ कब से तुमको बुलाती हैं बारिशें
- फ़िरदौस ख़ान
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उसके बग़ैर कितने ज़माने गुज़र गए...


कुछ ख़्वाब इस तरह से जहां में बिखर गए
अहसास जिस कद्र थे वो सारे ही मर गए

जीना मुहाल था जिसे देखे बिना कभी
उसके बग़ैर कितने ज़माने गुज़र गए

माज़ी किताब है या अरस्तु का फ़लसफ़ा
औराक़ जो पलटे तो कई पल ठहर गए

कब उम्र ने बिखेरी है राहों में कहकशां
रातें मिली स्याह, उजाले निखर गए

सहरा में ढूंढते हो घटाओं के सिलसिले
दरिया समन्दरों में ही जाकर उतर गए

कुछ कर दिखाओ, वक़्त नहीं सोचने का अब
शाम हो गई तो परिंदे भी घर गए

'फ़िरदौस' भीगने की तमन्ना ही रह गई
बादल मेरे शहर से न जाने किधर गए

-फ़िरदौस ख़ान
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तुम्हारे इंतज़ार में...


मैंने
कितने ही ख़त लिखे
तुम्हें बुलाने के लिए
मगर
तुम न आए
तुम्हारे इंतज़ार से ही
मेरी सहर की इब्तिदा होती
दोपहर ढलती
और फिर
शाम की लाली की तरह
तुमसे मिलने की
मेरी ख़्वाहिश भी शल हो जाती
सारे अहसासात दम तोड़ चुके होते
लेकिन
उम्मीद की एक नन्ही किरन
मेरी उंगली थामकर
मुझे, रात की तारीकियों से दूर, बहुत दूर...
दिन के पहले पहर की चौखट तक ले आती
और फिर
मेरी नज़रें राह में बिछ जातीं
तुम्हारे इंतज़ार में...
-फ़िरदौस ख़ान
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