अब ख़्वाब भी नींदों में सताने नहीं आते


होंठों पे मुहब्बत के तराने नहीं आते
जो बीत गए फिर वो ज़माने नहीं आते

हल कोई जुदाई का निकालो मेरे हमदम
अब ख़्वाब भी नींदों में सताने नहीं आते

बादल तो गरजते हैं, मगर ये भी हकीक़त
आंगन में घटा बनके वो छाने नहीं आते

क़दमों में बहारें तो बहुत रहती हैं लेकिन
'फ़िरदौस' को ये रास ख़ज़ाने नहीं आते
-फ़िरदौस ख़ान
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7 Response to "अब ख़्वाब भी नींदों में सताने नहीं आते"

  1. मौसम says:
    15 सितंबर 2008 को 11:24 am

    होंठों पे मुहब्बत के तराने नहीं आते
    जो बीत गए फिर वो ज़माने नहीं आते

    हल कोई जुदाई का निकालो मेरे हमदम
    अब ख़्वाब भी नींदों में सताने नहीं आते

    सुब्हान अल्लाह...बहुत ख़ूब...

  2. pallavi trivedi says:
    15 सितंबर 2008 को 12:55 pm

    bahut khoob...badhiya likha.

  3. Parul says:
    15 सितंबर 2008 को 1:12 pm

    bahut acchhey!!!

  4. डॉ .अनुराग says:
    15 सितंबर 2008 को 1:16 pm

    बादल तो गरजते हैं, मगर ये भी हकीक़त
    आंगन में घटा बनके वो छाने नहीं आते
    bahut achhe....

  5. Udan Tashtari says:
    16 सितंबर 2008 को 12:01 am

    हल कोई जुदाई का निकालो मेरे हमदम
    अब ख़्वाब भी नींदों में सताने नहीं आते


    --वाह वाह! बहुत खूब!!

  6. सतीश सक्सेना says:
    25 सितंबर 2008 को 3:31 pm

    "हल कोई जुदाई का निकालो मेरे हमदम
    अब ख़्वाब भी नींदों में सताने नहीं आते"

    निहायत खूबसूरत अभिव्यक्ति !

  7. "Arsh" says:
    27 अक्तूबर 2008 को 7:57 pm

    muje tirhi ghazal lekhan ki bidha sikhani hai .. aapki madad chahiye..


    regards
    arsh

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