बुलंदी...


बुलंदी सबको नसीब नहीं हुआ करती, लेकिन बुलंदी सबको अच्छी लगती है... बुलंदी पर पहुंचना एक ख़्वाब होता है, लेकिन बुलंदी की अपनी हदें हुआ करती हैं, कुछ मजबूरियां हुआ करती हैं... जिनकी वजह से इंसान आम ज़िन्दगी नहीं गुज़ार पाता और छोटी-छोटी ख़ुशियों को तरस जाता है... मिसाल देखें-
लड़के ने लड़की से पूछा :  ईदी में क्या लेना है ?
लड़की : हरे कांच की चूड़ियां...
लड़का : मंगा दूंगा
लड़की :  नहीं, ख़ुद लाकर देना
लड़का : कहां से लाऊं ?
लड़की  :  दिल्ली में चूड़ियों की दुकानों की कमी है क्या ?
लड़का : जान ! बहुत मजबूर हूं, क़ाहिरा के बाज़ार से तुम्हें चूड़ियां लाकर दे सकता हूं, लेकिन दिल्ली के बाज़ार में चूड़ियां लेने ख़ुद नहीं जा सकता...

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नेशनल हेराल्ड से उम्मीद जगी

फ़िरदौस ख़ान
अख़बारों का काम ख़बरों और विचारों को जन मानस तक पहुंचाना होता है. सूचनाओं के इसी प्रसार-प्रचार को पत्रकारिता कहा जाता है. किसी ज़माने में मुनादी के ज़रिये हुकमरान अपनी बात अवाम तक पहुंचाते थे. लोकगीतों के ज़रिये भी हुकुमत के फ़ैसलों की ख़बरें अवाम तक पहुंचाई जाती थीं. वक़्त के साथ-साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान के तरीक़ों में भी बदलाव आया. पहले जो काम मुनादी के ज़रिये हुआ करते थे, अब उन्हें अख़बार, पत्रिकाएं, रेडियो, दूरदर्शन और वेब साइट्स अंजाम दे रही हैं. पत्रकारिता का मक़सद जनमानस को न सिर्फ़ नित नई सूचनाओं से अवगत कराना है, बल्कि देश-दुनिया में घट रही घटनाओं से उन पर क्या असर होगा, यह बताना भी है.  लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि जिस तरह पिछले चंद सालों में कुछ मीडिया घरानों ने पत्रकारिता के तमाम क़ायदों को ताख़ पर रखकर ’कारोबारी’ राह अपना ली है, उससे मीडिया के प्रति जनमानस का भरोसा कम हुआ है. ऐसा नहीं है कि सभी अख़बार या ख़बरिया चैनल बिकाऊ हैं. कुछ अपवाद भी हैं. जिस देश का मीडिया बिकाऊ होगा, उस देश के लोगों की ज़िन्दगी आसान नहीं होगी. पिछले कई साल से देश में अराजकता का माहौल बढ़ा है. जिस तरह से सरेआम लोगों पर हमला करके उनकी हत्याएं की जा रही हैं, अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने वाले दलितों, किसानों पर गोलियां बरसाई जा रही हैं, ऐसे में मीडिया की ख़ामोशी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है. अराजकता भरे दौर में ऐसे अख़बारों की ज़रूरत महसूस की जा रही है, जो सच्चे हों, जिन पर अवाम भरोसा कर सके, जो चंद सिक्कों के लिए अपना ज़मीर न बेचें, जो जनमानस को गुमराह न करें.

ऐसे में कांग्रेस के अख़बार नेशनल हेराल्ड के प्रकाशन का शुरू होना, ख़ुशनुमा अहसास है. गुज़श्ता 12 जून कोकर्नाटक की राजधानी बंगलुरु में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी में इसके संस्मरणीय संस्करण का लोकार्पण किया गया. यह अख़बार दिल्ली से साप्ताहिक प्रकाशित किया जाएगा.  इस मौक़े पर राहुल गांधी ने कहा कि मौजूदा वक़्त में जो लोग सच्चाई के साथ हैं, उन्हें दरकिनार किया जा रहा है. दलितों को मारा जा रहा है, अल्पसंख्यकों को सताया जा रहा है और मीडिया को धमकाया जा रहा है. उन्होंने कहा कि नेशनल हेराल्ड के एडिटर एक दिन मेरे पास आए. मैंने उनसे कहा, अगर आपको किसी दिन कांग्रेस पार्टी या मेरे ख़िलाफ़ कुछ लिखना हो, तो बिना ख़ौफ़ के लिखें. ये वो चीज़ है, जो हम नेशनल हेराल्ड से चाहते हैं. सच्चाई से डरने की ज़रूरत नहीं है और ना चुप रहने की.

ग़ौरतलब है कि जवाहरलाल नेहरू और स्वतंत्रता सेनानियों ने लखनऊ से 9 सितंबर, 1938 को नेशनल हेराल्ड नाम से एक अख़बार शुरू किया था. उस वक़्त यह अख़बार जनमानस की आवाज़ बना और जंगे-आज़ादी में इसने अहम किरदार अदा किया. शुरुआती दौर में जवाहरलाल नेहरू ही इसके संपादक थे. प्रधानमंत्री बनने तक वे हेराल्ड बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स के चेयरमैन भी रहे. उन्होंने अख़बार के अंतर्राष्ट्रीय संवाददाता के तौर पर भी काम किया. अख़बार लोकप्रिय हुआ. साल 1968 में दिल्ली से इसके संस्करण का प्रकाशन शुरू हो गया.  हिंदी में नवजीवन और उर्दू में क़ौमी आवाज़ के नाम से इसके संस्करण प्रकाशित होने लगे. अख़बार को कई बार बुरे दौर से गुज़रना पड़ा और तीन बार इसका प्रकाशन बंद किया गया. पहली बार यह अंग्रेज़ी शासनकाल में उस वक़्त बंद हुआ, जब अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारतीय अख़बारों के ख़िलाफ़ दमनकारी रवैया अपनाया था. नतीजतन, 1942 से 1945 तक नेशनल हेराल्ड को अपना प्रकाशन बंद करना पड़ा. फिर साल 1945 में अख़बार का प्रकाशन शुरू किया गया. साल 1946 में फ़िरोज़ गांधी को नेशनल हेराल्ड का प्रबंध निदेशक का कार्यभार सौंपा गया. वे 1950 तक उन्होंने इसकी ज़िम्मेदारी संभाली. इस दौरान अख़बार की माली हालत में भी कुछ सुधार हुआ. लेकिन आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी की हार के बाद अख़बार को दो साल के लिए बंद कर दिया गया.  कुछ वक़्त बाद अख़बार शुरू हुआ, लेकिन साल 1986 में एक बार फिर से इस पर संकट के बादल मंडराने लगे, लेकिन राजीव गांधी के दख़ल की वजह से इसका प्रकाशन होता रहा. मगर माली हालत ख़राब होने की वजह से अप्रैल 2008 में इसे बंद कर दिया गया.

क़ाबिले-ग़ौर है कि असोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड कंपनी (एजेएल ) के तहत नेशनल हेराल्ड का प्रकाशन किया जाता था, जो एक सेक्शन-25 कंपनी थी. इस तरह की कंपनियों का मक़सद कला-साहित्य आदि को प्रोत्साहित करना होता है. मुनाफ़ा कमाने के लिए इनका इस्तेमाल नहीं किया जाता. मुनाफ़ा न होने के बावजूद यह कंपनी काफ़ी अरसे तक नुक़सान में चलती रही. कांग्रेस ने असोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड कंपनी को चलाए रखने के लिए कई साल तक बिना ब्याज़ के उसे क़र्ज़  दिया. मार्च 2010 तक कंपनी को दिया गया क़र्ज़ 89.67 करोड़ रुपये हो गया. बताया जाता है कि कंपनी के पास दिल्ली और मुंबई समेत कई शहरों में रीयल एस्टेट संपत्तियां हैं. इसके बावजूद कंपनी ने कांग्रेस का क़र्ज़ नहीं चुकाया. पार्टी के वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा को 22 मार्च 2002 को कंपनी के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. इसके कई साल बाद 23 नवंबर 2010 को यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड नाम की सेक्शन-25 कंपनी सामने आई. गांधी परिवार के क़रीबी सुमन दुबे और सैम पित्रोदा जैसे लोग इसके निदेशक थे. अगले महीने 13 दिसंबर 2010 को राहुल गांधी को इस कंपनी का निदेशक बनाया गया. अगले ही साल 22 जनवरी 2011 को सोनिया गांधी भी यंग इंडिया के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में शामिल हो गईं. उनके साथ-साथ  मोतीलाल वोरा और कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य ऑस्कर फ़र्नांडीज भी यंग इंडियन के बोर्ड में शामिल किए गए. इस कंपनी के 38-38 फ़ीसद शेयरों पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी की हिस्सेदारी है, जबकि के 24 फ़ीसद शेयर मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडीज के नाम हैं. दिसंबर 2010 में असोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड कंपनी के प्रबंधकों ने 90 करोड़ रुपये के क़र्ज़ बदले पूरी कंपनी यंग इंडियन के हवाले कर दी. यंग इंडियन ने इस अधिग्रहण के लिए 50 लाख रुपये का भुगतान किया. इस तरह यह कंपनी यंग इंडियन की सहायक कंपनी बन गई.

बहरहाल, कांग्रेस ने नेशनल हेराल्ड शुरू करके सराहनीय काम किया है. पिछले कुछ अरसे से ऐसे ही अख़बार की ज़रूरत महसूस की जा रही थी. आज का अख़बार कल का साहित्य है, इतिहास है. अख़बार दुनिया और समाज का आईना हैं. देश-दुनिया में में जो घट रहा है, वह सब सूचना माध्यमों के ज़रिये जन-जन तक पहुंच रहा है. आज के अख़बार-पत्रिकाएं भविष्य में महत्वपूर्ण दस्तावेज़ साहिब होंगे, क्योंकि इनके ज़रिये ही आने वाली पीढ़ियां आज के हालात के बारे में जान पाएंगी. इसके ज़रिये ही लोगों को समाज की उस सच्चाई का पता चलता है, जिसका अनुभव उसे ख़ुद नहीं हुआ है. साथ ही उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का भी पता चलता है. पत्रकारिता सरकार और जनता के बीच सेतु का काम करती है. अख़बारों के ज़रिये अवाम को सरकार की नीतियों और उसके कार्यों का पता चलता है. ठीक इसी तरह अख़बार जनमानस की बुनियादी ज़रूरतों, समस्याओं और उनकी आवाज़ को सरकार तक पहुंचाने का काम करते हैं.

यह बात समझनी होगी कि मीडिया का काम ’सरकार’ या ’वर्ग’ विशेष का गुणगान करना नहीं है. जहां सरकार सही है, वहां सरकार की सराहना की जानी चाहिए, लेकिन जब सत्ताधारी लोग तानाशाही रवैया अपनाते हुए जनता पर क़हर बरपाने लगें, तो उसका पुरज़ोर विरोध होना ही चाहिए.  मीडिया को जनता की आवाज़ बनना चाहिए, न कि सरकार का भोंपू.
चूंकि, नेशनल हेराल्ड एक सियासी पार्टी का अख़बार है, इसलिए इसे अवाम में अपनी साख बनाए रखने के लिए फूंक-फूंक कर क़दम रखना होगा. इसके हिन्दी, उर्दू व अन्य भाषाओं के संस्करण भी प्रकाशित होने चाहिए.

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इंतज़ार के रंग...

मेरे महबूब !
हिज्र के मौसम में
आसमान पर छाई
काली घनघोर घटाओं ने
फ़िज़ा में
कितने रंग बिखेरे हैं
बिल्कुल
तुम्हारे इंतज़ार की तरह...
एक रंग हिज्र का
एक रंग विसाल का
और
एक रंग इंतज़ार का
जो अज़ल से जारी है...
-फ़िरदौस ख़ान

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खाने के वक़्त मौत

ज्योतिष एक ऐसा इल्म है, जो माज़ी, हाल और मुस्तक़बिल के बारे में कई बातें बता देता है... बशर्त बताने वाला इसमें माहिर हो, इसका आलिम हो... हमने बहुत सी बातें सच होते हुए देखी हैं... हमारे नाना जान इल्मे-नजूम के जानकार थे... वे भी जो बताते थे, वह सही साबित होता था... फ़िलहाल दो वाक़ियात का ज़िक्र कर रहे हैं...

हमारे बचपन की बात है... हमारे दादा जान के एक दोस्त थे... वे ज्योतिष शास्त्र के विद्वान थे...  सितारों की चाल देखकर वे जो बताते थे, वह सच होता था... उनकी बताई दो बातें हमने भी देखीं हैं, जो सौ फ़ीसद सही साबित हुईं...

पहली, हम अपने पुराने घर आए थे... पापा हमें पहुंचा कर वापस चले गए थे... कुछ रोज़ बाद हम और हमारे भाइयों की तबियत बहुत ख़राब हो गई... दादा जान के दोस्त पापा से मिले और उन्होंने उनसे कहा कि बेटा आज ही अपने शहर चले जाओ... पापा ने वजह पूछी, तो वे टाल गए... पापा आए और उन्होंने हम अबको बीमार पाया... चंद रोज़ बाद हमारे दादा जान का इंतक़ाल हो गया... कुछ अरसे बाद हम सब वापस अपने घर आ गए...

दूसरी, पापा के दोस्त के पिता ने एक बार दादा जान के दोस्त से अपनी मौत के बारे में पूछा... उन्होंने बताने से मना कर दिया और कहा कि ऐसी बातें नहीं जाननी चाहिए... लेकिन उन्होंने ज़िद कर ली... इस पर उन्होंने कहा कि मैं बस एक बात बताऊंगा, उससे आगे मत पूछना... वे मान गए... उन्होंने बताया कि तुम्हारी मौत खाने के वक़्त होगी... उन्होंने अपनी मौत के बारे में पूछ तो लिया, लेकिन फिर उन पर मौत का ख़ौफ़ ऐसा तारी हुआ कि उन्होंने अपनी पसंदीदा मछली खानी छोड़ दी... उन्हें लगता था कि शायद मछली का कांटा उनके हलक़ में फंस जाएगा, जिससे उनकी मौत हो जाएगी...

इस तरह कई बरस बीत गए... एक दिन वे ग्राहकों से पैसे इकट्ठे करने गांव गए हुए थे... उनके पीछे उनके बेटे की किसी बात पर पड़ौस के दुकानदार से लड़ाई हो गई और वह बंदूक़ लेने के लिए घर चला गया. वे गांव से लौटकर आए और अपनी गद्दी पर बैठ गए... तभी पड़ौस का दुकानदार आया और उनके सिर पर लाठी से कई वार कर दिया... मौक़े पर ही उनकी मौत हो गई... उस वक़्त दोपहर का एक बज रहा था, यानी खाने का वक़्त था... उनकी भविष्यवाणी सच हुई...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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दुआ... एक पुरअसरार सदा

दुआ... कितनी पाकीज़गी है इस एक लफ़्ज़ में... दुआ क्या होती है... दुआ, वो होती है, जो दिल से निकलती है और सीधे अर्श तक जाती है... दुआ में बहुत असर होता है... दुआ नामुमकिन को भी मुमकिन बना देती है... इस ज़मीन से उस आसमान तक अगर सबसे ज़्यादा पुरअसरार कोई सदा है, तो वो दुआ की है...
बहुत ख़ुशनसीब होते हैं वो लोग, जो किसी की दुआओं में रहा करते हैं...

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तुम्हारे नाम का कलमा...

मेरे महबूब
मेरी ज़िन्दगी का
जब आख़िरी लम्हा आए
मेरे होंठों पे
तुम्हारे नाम का कलमा आए...
-फ़िरदौस ख़ान

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आख़िरी लम्हे

मेरे महबूब !
मैं अकसर ज़िन्दगी के उन आख़िरी लम्हों के बारे में सोचा करती हूं, जब मौत सिरहाने ख़ड़ी होगी... सांसें थम रही होंगी... धड़कनें भी धीमी हो जाएंगी... ख़ून रगों में जमने लगेगा और जिस्म ठंडा पड़ना शुरू हो जाएगा...
उस वक़्त मैं किस हाल में रहूंगी... तुम्हें लेकर क्या कुछ दिलो-दिमाग़ में चल रहा होगा... क्या उस वक़्त तुम मेरे क़रीब रहोगे... मेरा हाथ अपने हाथ में थामे... तुम्हारी निगाहें मुझसे क्या कुछ कह रही होंगी...

या मेरी निगाहें तुम्हें ढूंढ रही होंगी... आख़िर तुम्हें पाने के लिए मुझे कितने जनम लेने होंगे... जन्म-जन्मांतर मेरे वजूद पर सिर्फ़ तुम्हारा ही हक़ रहेगा...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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अमलतास... तपती धूप में सड़कों के किनारे लगे अमलतास के दरख़्त कितने भले लगते हैं... पीले फूलों के गुच्छे मानो अपने पास बुला रहे हों और कह रहे हों-
ओ राही ! आओ, कुछ देर हमारे साये में सुकून पा लो... फिर अपने सफ़र पर आगे बढ़ जाना...
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सफ़र

कभी-कभी इन क़दमों को सफ़र भी कितने रास आते हैं... ये ज़िन्दगी भी तो एक सफ़र ही है... एक ऐसा सफ़र जिसकी मंज़िल का कहीं कोई पता नहीं... बे मक़सद-सी, बे मतलब सी ज़िन्दगी... एक ऐसी ज़िन्दगी जैसे किसी को सेहरा में फेंक दिया हो, हर तरफ़ रेत ही रेत... मुसाफ़िर कहां जाए, और कहां न जाए... या फिर किसी गहरे समंदर में फेंक दिया हो... दूर तक सिर्फ़ पानी ही पानी है... कहीं कोई किनारा ही नज़र नहीं आता... लेकिन रेगिस्तान में भटकना तो है, समंदर में डूबते-डूबते तैरना है और तैरते-तैरते डूबना है... आख़िर ये सफ़र कभी न कभी, कहीं न कहीं जाकर ख़त्म तो होगा ही...

  • फिर से एक ख़ूबसूरत सफ़र का आग़ाज़ हो रहा है... उस ज़मीन पर फिर से क़दम पड़ेंगे, जिसका हर ज़र्रा हमारे लिए क़ाबिले-एहतराम हो गया है... जिसकी फ़िज़ाओं में मुहब्बत की ख़ुशबू घुल गई है...

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मां! तुझे सलाम...


बहुत ख़ुशनसीब होते हैं वो लोग, जिनकी मां उनके पास होती है...बहुत ख़ुशनसीब होते हैं वो लोग, जिनके साथ उनकी मां की दुआएं होती हैं...बहुत ख़ुशनसीब होते हैं वो लोग, जो दूसरों की मां की भी इज़्ज़त करते हैं, और उनसे दुआएं पाते हैं...
लेकिन 
बहुत बदनसीब होते हैं वो लोग, जो न अपनी मां की इज़्ज़त करते हैं और न ही दूसरों की मांऑं की...
आज मदर डे हैं...हम अपनी अम्मी से दूर हैं...बहुत दूर...लेकिन दिल के बहुत क़रीब हैं...हम बहुत ख़ुशनसीब हैं कि अम्मी की दुआएं हमारे साथ हमेशा रहती हैं...आज भी सुबह सबसे पहले हमने अपनी अम्मी को ही फ़ोन किया...
उनके  लिए ख़ुश हैं कि वो अपनी मां के साथ हैं...
आप सभी को मदर डे की दिली मुबारकबाद...

मां! तुझे सलाम... 
-फ़िरदौस ख़ान
क़दमों को मां के इश्क़ ने सर पे उठा लिया
साअत सईद दोश पे फ़िरदौस आ गई...
ईश्वर ने जब कायनात की तामीर कर इंसान को ज़मीं पर बसाने का तसव्वुर किया होगा...यक़ीनन उस वक़्त मां का अक्स भी उसके ज़हन में उभर आया होगा... जिस तरह सूरज से यह कायनात रौशन है...ठीक उसी तरह मां से इंसान की ज़िन्दगी में उजाला बिखरा है...तपती-झुलसा देने वाली गर्मी में दरख़्त की शीतल छांव है मां...तो बर्फ़ीली सर्दियों में गुनगुनी धूप का अहसास है मां...एक ऐसी दुआ है मां, जो अपने बच्चों को हर मुसीबत से बचाती है... मां, जिसकी कोख से इंसानियत जनमी...जिसके आंचल में कायनात समा जाए...जिसकी छुअन से दुख-दर्द दूर हो जाएं...जिसके होठों पर दुआएं हों... जिसके दिल में ममता हो और आंखों में औलाद के लिए इंद्रधनुषी  सपने सजे हों...ऐसी ही होती है मां...बिल्कुल ईश्वर के प्रतिरूप जैसी...ईष्वर के बाद मां ही इंसान के सबसे क़रीब होती है...

सभी नस्लों में मां को बहुत अहमियत दी गई है. इस्लाम में मां का बहुत ऊंचा दर्जा है. क़ुरआन की सूरह अल अहक़ाफ़ में अल्लाह फ़रमाता है-"हमने मनुश्य को अपने मां-बाप के साथ अच्छा बर्ताव करने की ताक़ीद की. उसकी मां ने उसे (पेट में) तकलीफ़ के साथ उठाए रखा और उसे तकलीफ़ के साथ जन्म भी दिया। उसके गर्भ में पलने और दूध छुड़ाने में तीस माह लग गए." हज़रत मुहम्मद सलल्ललाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि "‘मां के क़दमों के नीचे जन्नत है." आपने एक हदीस में फ़रमाया है-"‘मैं वसीयत करता हूं कि इंसान को मां के बारे में कि वह उसके साथ नेक बर्ताव करे." एक हदीस के मुताबिक़ एक व्यक्ति ने हज़रत मुहम्मद साहब से सवाल किया कि- इंसानों में सबसे ज़्यादा अच्छे बर्ताव का हक़दार कौन है? इस पर आपने जवाब दिया-तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने दोबारा वही सवाल किया. आपने फ़रमाया-तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने तीसरी बार फिर वही सवाल किया. इस बार भी आपने फ़रमाया कि तुम्हारी मां. उस व्यक्ति ने चौथी बार फिर भी यही सवाल किया. आपने कहा कि तुम्हारा पिता. यानी इस्लाम में मां को पिता से तीन गुना ज़्यादा अहमियत दी गई है. इस्लाम में जन्म देने वाली मां के साथ-साथ दूध पिलाने और परवरिश करने वाली मां को भी ऊंचा दर्जा दिया गया है. इस्लाम में इबादत के साथ ही अपनी मां के साथ नेक बर्ताव करने और उसकी ख़िदमत करने का भी हुक्म दिया गया है. कहा जाता है कि जब तक मां अपने बच्चों को दूध नहीं बख़्शती तब तक उनके गुनाह भी माफ़ नहीं होते.

भारत में मां को शक्ति का रूप माना गया है. हिन्दू धर्म में देवियों को मां कहकर पुकारा जाता है. धन की देवी लक्ष्मी, ज्ञान की देवी सरस्वती और शक्ति की देवी दुर्गा को माना जाता है. नवरात्रों में मां के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना का विधान है. वेदों में मां को पूजनीय कहा गया है. महर्षि मनु कहते हैं-दस उपाध्यायों के बराबर एक आचार्या होता है, सौ आचार्यों के बराबर एक पिता होता है और एक हज़ार पिताओं से अधिक गौरवपूर्ण मां होती है। तैतृयोपनिशद्‌ में कहा गया है-मातृ देवो भव:. इसी तरह जब यक्ष ने युधिष्ठर से सवाल किया कि भूमि से भारी कौन है तो उन्होंने जवाब दिया कि माता गुरुतरा भूमे: यानी मां इस भूमि से भी कहीं अधिक भारी होती है. रामायण में श्रीराम कहते हैं- जननी जन्मभूमिश्च  स्वर्गादपि गरीयसी यानी जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. बौद्ध धर्म में महात्मा बुद्ध के स्त्री रूप में देवी तारा की महिमा का गुणगान किया जाता है.

यहूदियों में भी मां को सम्मान की दृश्टि से देखा जाता है. उनकी धार्मिक मान्यता के मुताबिक़ कुल 55 पैग़म्बर हुए हैं, जिनमें सात महिलाएं थीं. ईसाइयों में मां को उच्च स्थान हासिल है. इस मज़हब में यीशु की मां मदर मैरी को सर्वोपरि माना जाता है. गिरजाघरों में ईसा मसीह के अलावा मदर मैरी की प्रतिमाएं भी विराजमान रहती हैं. यूरोपीय देशों में मदरिंग संडे मनाया जाता है. दुनिया के अन्य देशों में भी मदर डे यानी मातृ दिवस मनाने की परंपरा है. भारत में मई के दूसरे रविवार को मातृ दिवस मनाया जाता है. चीन में दार्शनिक मेंग जाई की मां के जन्मदिन को मातृ दिवस के तौर पर मनाया जाता है, तो इज़राईल में हेनेरिता जोल के जन्मदिवस को मातृ दिवस के रूप में मनाकर मां के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है. हेनेरिता ने जर्मन नाज़ियों से यहूदियों की रक्षा की थी. नेपाल में वैशाख के कृष्ण पक्ष में माता तीर्थ उत्सव मनाया जाता है. अमेरिका में मई के दूसरे रविवार को मदर डे मनाया जाता है. इस दिन मदर डे के लिए संघर्ष करने वाली अन्ना जार्विस को अपनी मुहिम में कामयाबी मिली थी. इंडोनेशिया में 22 दिसंबर को मातृ दिवस मनाया जाता है. भारत में भी मदर डे पर उत्साह देखा जाता है.

मां बच्चे को नौ माह अपनी कोख में रखती है. प्रसव पीड़ा सहकर उसे इस संसार में लाती है. सारी-सारी रात जागकर उसे सुख की नींद सुलाती है. हम अनेक जनम लेकर भी मां की कृतज्ञता प्रकट नहीं कर सकते. मां की ममता असीम है, अनंत है और अपरंपार है. मां और उसके बच्चों का रिश्ता अटूट है. मां बच्चे की पहली गुरु होती है. उसकी छांव तले पलकर ही बच्चा एक ताक़तवर इंसान बनता है. हर व्यक्ति अपनी मां से भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है. वो कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए, लेकिन अपनी मां के लिए वो हमेशा  उसका छोटा-सा बच्चा ही रहता है. मां अपना सर्वस्व अपने बच्चों पर न्यौछावर करने के लिए हमेशा तत्पर रहती है. मां बनकर ही हर महिला ख़ुद को पूर्ण मानती है.

कहते हैं कि एक व्यक्ति बहुत तेज़ घुड़सवारी करता था. एक दिन ईश्वर ने उस व्यक्ति से कहा कि अब ध्यान से घुड़सवारी किया करो. जब उस व्यक्ति ने इसकी वजह पूछी तो ईश्वर ने कहा कि अब तुम्हारे लिए दुआ मांगने वाली तुम्हारी ज़िन्दा नहीं है. जब तक वो ज़िन्दा रही उसकी दुआएं तुम्हें बचाती रहीं, मगर उन दुआओं का साया तुम्हारे सर से उठ चुका है. सच, मां इस दुनिया में बच्चों के लिए ईश्वर का ही प्रतिरूप है, जिसकी दुआएं उसे हर बला से महफ़ूज़ रखती हैं. मातृ शक्ति को शत-शत नमन... (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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