नारी का मन...





फ़िरदौस ख़ान
एक नारी का मन प्रेमियों के बिना शायद स्थिर नहीं रह पाता...क्या यह सच है...? क्या नारी का मन सचमुच इतना चंचल होता है कि उसे स्थिर रखने के लिए एक पुरुष की ज़रूरत पड़ती है...  क्या नारी बंधन में ही सुख पाती है...बंधन भी ऐसा जिसमें वह ख़ुद अपनी मर्ज़ी से बंधती है...या फिर वह किसी पुरुष को बांधे रखना चाहती है...
       
प्रसिद्ध इतालवी लेखक रोबर्तो कलासो की किताब 'क भारतीय मानस और देवताओं की कहानियां' में अर्जुन के एक साल के अज्ञातवास का ज़िक्र करते हुए रोबर्तो कलासो लिखते हैं- "एक वर्ष कठिनाई भरा, संघर्ष पूर्ण, बुरी तरह थका देने वाला, लेकिन आवेगपूर्ण था. संध्या समय कन्याओं का एक छोटा समूह उन्हें घेरकर बैठ जाता और वह दैत्यों, राजाओं, राज कन्याओं और योद्धाओं की मनोरंजक कथाएं सुनाते. लड़कियां उन्हें सारा समय घेरे रहतीं और उनका नृत्य मुद्राओं तथा हाव-भाव का अनुसरण करतीं. दिन का समय प्राय: नृत्यशाला में बीतता था. विराट एक समृद्ध राज्य का राजा था, किंतु समस्याएं भी अनेक थीं. सबसे बड़ी समस्या तो बेटी उत्तरा स्वयं थी. अर्जुन ने मन ही मन प्रण किया कि वह उत्तरा को स्पर्श तक नहीं करेंगे, लेकिन न जाने क्या बात थी, दोनों का समय अधिकतर साथ-साथ ही बीतता था. अर्जुन ने अपने मन को बस इतना ही अधिकार दिया था कि वह उत्तरा को लेकर कल्पना का ताना-बाना बुन सकते थे. उत्तरा के लिए तो स्थिति और भी दारुण थी. अभी तक वह बहुत छोटी थी-किसी बच्ची जैसी, जो अपने अदृश्य  प्रेमी के घेरे से बाहर आ रही थी धीरे-धीरे. सर्वप्रथम उसे प्राप्त करने वालों में था सोम. फिर आया गंधर्व. तीसरे अदृश्य पति थे अग्नि और चौथा एक मनुष्य हो सकता था. एक नारी का मन प्रेमियों के बिना शायद स्थिर नहीं रह पाता. वह पहले सोम के साथ रहती रही, फिर गंधर्व और फिर अग्नि के साथ. अब एक मानव प्रेमी की प्रतीक्षा कर रही थी. वह कोई भी हो सकता था. उस मनुष्य की खोज अर्जुन में पूरी हो गई जो उत्तरा को नृत्य-संगीत की शिक्षा दे रहे थे. लेकिन अर्जुन के लिए इतना ही पर्याप्त था, इससे अधिक कुछ नहीं. वह उत्तरा की अति निकटता के बचकर चलते थे. उत्तरा ने दुख भरे स्वर में कहा, आप तो किसी गंधर्व से भी दुर्लभ हैं और देवताओं से भी अधिक अप्राप्य. आप भले ही मुझसे दूर-दूर रहें, मैं तो आप में समाई हूं...कहते-कहते वह रो पड़ी. इस रूदन में दुख नहीं, गहन आनंद की अनुभूति बोल रही थी. अर्जुन अब समझ सके कि उर्वशी ने उनसे कैसा भयानक प्रतिशोध लिया है. क्योंकि उन्होंने उर्वशी को अपनी मां समझते हुए ठुकरा दिया था. इसलिए उन्हें उत्तरा को भी अस्वीकार करना था, अपनी बेटी मानकर."  

बंधन...आख़िर बंधन ही होता है... भले वह प्रेम का ही क्यों न हो... मन तो चंचल है...और वो अरमानों के पंखों के साथ सपनों के आसमान में उड़ान भरने को आतुर रहता है...
क्या प्रेम सिर्फ़ एक बार ही होता है...या फिर बार-बार हो सकता है...उत्तरा ने कई बार प्रेम किया...अलग-अलग पुरुषों से...सभी के साथ वह संतुष्ट रही... क्या कोई महिला अपने प्रेमी या साथी के बिछड़ने पर उम्रभर उसका शोक मनाती रहे...या उसे भी नया प्रेमी या साथी तलाश लेना चाहिए...
अपने सहकर्मी पुरुष के एक सवाल के जवाब में एक लड़की ने जवाब दिया-मैं बॉय फ्रेंड नहीं पालती... एक दूसरी लड़की का कहना था कि बॉय फ्रेंड परेशानी का सबब बन जाते हैं...यानी रोक-टोक लगाना... इससे न मिलो, उससे बात न करो...ख़ुद भी कोई काम नहीं करके देंगे...और किसी दूसरे से काम कराने पर उसमें हज़ार ऐब निकाल देंगे... इसलिए बॉय फ्रेंड रखकर कौन मुसीबत मोल ले... एक और लड़की कहती है-जब तक किसी के साथ संबंध मधुर है, तब तक तो ठीक है...लेकिन जैसे ही रिश्ते में कटुता आने लगे तो बेहतर है कि ऐसे रिश्ते को तोड़ दिया जाए...

मेरी एक दोस्त की खाला को किसी लड़के से प्रेम हो गया... लड़के के घरवालों को रिश्ता मंज़ूर नहीं था...वजह लड़की उनकी ज़ात की नहीं थी... कुछ वक़्त बाद लड़के ने अपने घरवालों की पसंद से शादी कर ली, लेकिन खाला ने शादी नहीं की... उस लड़के का आज भरा पूरा परिवार है...बीवी है, बच्चे हैं... वह लड़का तो अपनी नई ज़िन्दगी में मस्त हो गया...लेकिन उम्र के आख़िरी पड़ाव में वो अकेले ही दिन गुज़ार रही हैं... आख़िर इस प्यार ने उन्हें क्या दिया...? अगर वह भी अपना नया साथी चुन लेतीं तो शायद आज उनकी ज़िन्दगी इतनी वीरान नहीं होती... आख़िर नारी का मन ऐसा क्यों होता है...?

क़रीब दो साल पहले मेरी दोस्त की शादी हुई है...उसे भी एक लड़के से प्रेम था...दोनों की ज़ात अलग थी... लड़के में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वो समाज की ज़ात-बिरादरी की दीवार तोड़ कर उसे अपना पाता... मेरी दोस्त बहुत रोती थी, इसलिए कि उसे बुज़दिल लड़के से प्रेम हुआ...आख़िर वह रोती भी कितने दिन... उसने अपने घरवालों की मर्ज़ी से शादी कर ली...

सोचती हूं कि कौन सही है...? किसी के बिछड़ने पर उम्रभर उसके ग़म में डूबी रहने वाली खाला या नया साथी चुनकर ज़िन्दगी  के  रास्ते पर आगे बढ़ जाने वाली दोस्त... बेशक, दोस्त ही सही है...क्योंकि ज़िन्दगी तो एक बार ही मिलती है...फिर उसे किसी ऐसे व्यक्ति के लिए क्यों बर्बाद किया जाए, जो या तो तुम्हें छोड़कर चला गया है...या वो कभी तुम्हारा हो ही नहीं सकता...

तस्वीर : गूगल से साभार  
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

ताल्लुक़ बोझ बन जाये तो उसको तोड़ना अच्छा...


फ़िरदौस ख़ान
माना ज़िन्दगी में प्रेम की भी अपनी अहमियत है...मगर प्रेम ही तो सबकुछ नहीं है...ज़िन्दगी बहुत ख़ूबसूरत है...और उससे भी ख़ूबसूरत होते हैं हमारे इंद्रधनुषी सपने...हमें अपनी भावनाएं ऐसे व्यक्ति से नहीं जोड़नी चाहिए, जो इस क़ाबिल ही हो... जिस तरह पूजा के फूलों को कूड़ेदान में नहीं फेंका जा सकता, उसी तरह अपने प्रेम और इससे जुडी कोमल भावनाओं को किसी दुष्ट प्रवृति के व्यक्ति पर न्योछावर नहीं किया जा सकता.

पिछले दिनों दो ऐसे हादसे हुए जो प्रेम, विश्वासघात और ख़ुदकुशी से जुड़े थे. दोनों ही हादसों में दो होनहार लड़कियों की ज़िन्दगी ख़त्म हो गई. दोनों ने ही अपने प्रेमियों के बर्ताव से आहत होकर मौत को गले लगा लिया. पहला मामला है जमशेदपुर की 22 वर्षीय  आदिवासी छात्रा मालिनी मुर्मू का, जिसने अपने प्रेमी के रवैये से आहत होकर ख़ुदकुशी कर ली. उसका बेंगलूर में ही रहने वाले उसके ब्वायफ्रेंड से हाल में कथित तौर पर कुछ मनमुटाव और कहासुनी हुई थी. इसके बाद लड़के ने फेसबुक में अपने वॉल पर एक संदेश में लिखा था- 'मैं आज बहुत आराम महसूस कर रहा हूं. मैंने अपनी गर्लफ्रेंड को छोड़ दिया है. अब मैं स्वतंत्र महसूस कर रहा हूं. स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं.'   मामले की जांच कर रहे अधिकारियों के मुताबिक़ सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर मालिनी  के ब्वॉयफ्रैंड ने उससे संबंध तोड़ लिए थे. इससे उसे गहरा आघात लगा और उसने क्लास में भी जाना छोड़ दिया. क्लास में उसे नहीं पाकर जब उसके दोस्त हॉस्टल के कमरा नंबर 421 में गए तो उसने दरवाज़ा नहीं खोला. गार्ड्स को बुलाकर दरवाज़ा तुड़वाया गया. कमरे के भीतर मालिनी का शव पंखे से झूलता मिला.

मालिनी ज़िन्दगी में एक बड़ा मुक़ाम हासिल करना चाहती थी. उसने साकची के राजेंद्र विद्यालय से दसवीं की पढ़ाई की थी. इसके बाद उसने उड़ीसा के आईटीई से बारहवीं पास की. वह आईआईएम बेंगलुरू में एमबीए प्रथम वर्ष की छात्रा थी. लैपटॉप में छोड़े अपने सुसाइड नोट में उसने लिखा है- उसने मुझे छोड़ दिया, इसलिए आत्महत्या कर रही हूं.

दूसरा मामला है  36 वर्षीय एयरफोर्स की पूर्व महिला फ्लाइंग ऑफिसर अंजलि गुप्ता का, जिसने अपने विवाहित प्रेमी  ग्रुप कैप्टन अमित गुप्ता के विश्वासघात से दुखी होकर कथित तौर पर ख़ुदकुशी कर ली थी.  अंजलि के परिजनों ने आरोप लगाया है कि अमित गुप्ता उसके साथ पिछले सात साल से लिव इन रिलेशनशिप में रह रहा था. दोनों की मुलाक़ात साल 2001  में कर्नाटक के बेलगांव में उस वक़्त हुई,  जब अंजलि ने बतौर फ्लाइंग ऑफिसर पहली पोस्टिंग ली थी. उस दौरान अमित वहां ग्रुप कैप्टन थे. अमित ने उसके साथ दोस्ती बढ़ाई, फिर शादी करने का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध भी बनाए. अमित ने अपनी पहली पत्नी से तलाक़ लेकर उससे शादी रचाने का वादा भी किया था, लेकिन शादी नहीं की.  शाहपुरा पुलिस को भोपाल के फॉच्यरून ग्लोरी निवासी अमित गुप्ता के मकान से अंजलि की लाश मिली थी. उसने दुपट्टे का फंदा बनाकर फांसी लगाई थी.

ये दोनों ही लड़कियां अति भावुक थीं. ख़ुदकुशी करते वक़्त इनकी मनोस्थिति क्या रही होगी, इसे समझा जा सकता है...लेकिन इन्होंने अपनी ज़िन्दगी ख़त्म करके अच्छा नहीं किया. अगर ये थोड़ा समझदारी और धैर्य से काम लेतीं तो आज ज़िंदा होतीं.  ऐसी कोई वजह नहीं थी कि इन्हें ज़िन्दगी में अच्छे लड़के नहीं मिलते. अगर इन्हें लग रहा था कि इनके प्रेमी इनके साथ धोखा कर रहे हैं, तो इन्हें अपने प्रेमियों को छोड़ देना चाहिए था.
   
बक़ौल साहिर लुधियानवी-
तार्रुफ़ रोग हो जाये तो उसको भूलना बेहतर
ताल्लुक़ बोझ बन जाये तो उसको तोड़ना अच्छा
वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन
उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा... 


ज़िन्दगी चलते रहने का नाम है...और इसकी सार्थकता चलते रहने में ही है... किसी दुष्ट के लिए अपनी ज़िन्दगी क्यों बर्बाद की जाए... 
बहरहाल, इंसान को फ़ैसले लेते वक़्त दिल से ही नहीं दिमाग़ से भी काम लेना चाहिए...

आख़िर में 
सोशल नेटवर्किंग साइट फ़ेसबुक ऐसी प्रणाली लॉन्च कर रहा है, जिसकी मदद से लोग अपने ऐसे दोस्तों के बारे में रिपोर्ट कर सकते हैं जो उनकी नज़र में ख़ुदकुशी करने के बारे में सोच रहे हैं. यह सुविधा समैरिटन्स नाम की संस्था के साथ मिलकर शुरु की गई है. इस संस्था का कहना है कि प्रणाली के परीक्षण के दौरान कई लोगों ने इसका इस्तेमाल किया है. यह संस्था ऐसे लोगों को भावनात्मक समर्थन देती है, जो अवसाद या मुश्किल दौर से गुज़र रहे हों. इसमें ऐसे लोग भी शामिल हैं, जो ख़ुदकुशी कर सकते हैं. अगर आप अपने किसी दोस्त को लेकर फ़िक्रमंद  हैं तो फ़ेसबुक पर अपनी चिंताओं के बारे में लिखते हुए एक फ़ॉर्म भर सकते हैं. यह फॉर्म साइट के मॉडरेटरों तक पहुंचा दिया जाता है. फ़ेसबुक के उस पेज का यूआरएल देना होगा, जहां ख़ुदकुशी करने बाबत संदेश लिखा हुआ है. इसके अलावा यूज़र का नाम और वो किस-किस नेटवर्क का सदस्य है...ये जानकारियां  भी देनी होंगी. ख़ुदकुशी संबंधी संदेशों के बारे में फ़ेसबुक की टीम को अलर्ट किया जाएगा.  

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

हिन्दुस्तान का शहज़ादा


हिन्दुस्तान का शहज़ादा
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

मेरी रूह महक रही है, तुम्हारी मुहब्बत से...

मेरे महबूब !
मुहब्बत के शहर की
ज़मीं का वो टुकड़ा
आज भी यादों की ख़ुशबू से महक रहा है
जहां
मैंने सुर्ख़ गुलाबों की
महकती पंखुड़ियों को
तुम्हारे क़दमों में बिछाया था...
तुमने कहा था-
यह फूल क़दमों में बिछाने के लिए नहीं
तुम्हारे बालों में सजाने के लिए हैं... 
फिर तुमने
मेरे खुले बालों में 
सुर्ख़ गुलाब लगाते हुए कहा था- 
आई लव यू ...
तब से मेरे बाल ही नहीं
मेरी रूह भी महक रही है
तुम्हारी मुहब्बत से...
-फ़िरदौस ख़ान
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

एक झूठा लफ़्ज़ मुहब्बत का...


सरहद पार से न्यूज़ एंकर सईद साहब ने हमें एक नज़्म भेजी है...
नज़्म का एक-एक लफ़्ज़ रूह की गहराइयों में उतर जाने वाला है...जबसे हमने यह नज़्म पढ़ी है...तब से हम ख़ुद को इसके असर से जुदा नहीं कर पाए हैं...इस नज़्म में ऐसा क्या है, जिसने हमें इस क़द्र बांध लिया है...उसे लफ़्ज़ों में क़ैद करके बयां करने में ख़ुद को नाक़ाबिल महसूस कर रहे हैं...मुलाहिज़ा फरमाएं...

एक झूठा लफ़्ज़ मुहब्बत का
इस दिल में सलामत है अब तक
वो शोख़ी-ए-लब वो हर्फ़-ए-वफ़ा
वो नक़्श-ए-क़दम वो अक्स-ए-हिना
सौ बार जिसे चूमा हमने
सौ बार परस्तिश की जिसकी
इस दिल में सलामत है अब तक
वो गर्द-ए-अलम वो दीदा-ए-नम
हम जिसमें छुपाकर रखते हैं
तस्वीर बिखरती यादों की
ज़ंजीर पिघलते वादों की
पूंजी नाकाम इरादों की
ऐ तेज़ हवा नाराज़ न हो
इस दिल में सलामत है अब तक
सामान बिछड़ते साथ का
कुछ टुकड़े गरम दोपहरों के
कुछ रेज़े नरम सवालों के
कुछ ढेर अनमोल ख़्यालों के
एक सच्चा रूप हक़ीक़त का
एक झूठा लफ़्ज़ मुहब्बत का...
(हमारी डायरी से)
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

शरारे बनके बरसते हैं अब इंतज़ार के फूल...फ़िरदौस ख़ान


सिसकती वादियां कहती हैं देवदारों से
शरारे बनके बरसते हैं अब इंतज़ार के फूल... (नामालूम)

सच...इंतज़ार की भी अपनी ही ख़ुशी और अपना ही ग़म होता है...यह ख़ुशी और ग़म... इस बात पर निर्भर करता है कि इंतज़ार किसका किया जा रहा है... ? फ़िलहाल एक गुज़ारिश पर अपनी ग़ज़ल पेश कर रहे हैं... अनुराग मुस्कान साहब की एक तस्वीर के साथ, जो कई बरस पहले उन्होंने हमारी एक नज़्म के लिए भेजी थी...
 
ग़ज़ल
लुत्फ़ जब भी किसी मंज़र का उठाया हमने
दिल को बेचैन-सा वीरान सा पाया हमने

आज फिर याद किया धूप में जलकर उसको
आज फिर छत पे वही ख़्वाब बुलाया हमने

हादसा आज अचानक वही फिर याद आया
कितनी मुश्किल से जिसे दिल से भुलाया हमने

नर्म झोंके की तरह दिल को जो छूकर गुज़रा
ग़म उसी शख़्स का ताउम्र उठाया हमने

जिसको ठुकरा दिया 'फ़िरदौस' जहां ने, उसको
अपने गीतों में सदा ख़ूब सजाया हमने
-फ़िरदौस ख़ान

तस्वीर : अनुराग मुस्कान  
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

इश्क़ की नज़्म...


मैं
उम्र के काग़ज़ पर
इश्क़ की नज़्म लिखती रही
और
वक़्त गुज़रता गया
मौसम-दर-मौसम
ज़िन्दगी की तरह...
-फ़िरदौस ख़ान


  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

फूल तुमने जो कभी मुझको दिए थे ख़त में...फ़िरदौस ख़ान



अर्चना चावजी की मधुर आवाज़ में सुनिए...

ग़ज़ल
चांदनी रात में कुछ भीगे ख़्यालों की तरह
मैंने चाहा है तुम्हें दिन के उजालों की तरह

साथ तेरे जो गुज़ारे थे कभी कुछ लम्हें
मेरी यादों में चमकते हैं मशालों की तरह

इक तेरा साथ क्या छूटा हयातभर के लिए
मैं भटकती रही बेचैन ग़ज़ालों की तरह

फूल तुमने जो कभी मुझको दिए थे ख़त में
वो किताबों में सुलगते हैं सवालों की तरह

तेरे आने की ख़बर लाई हवा जब भी कभी
धूप छाई मेरे आंगन में दुशालों की तरह

कोई सहरा भी नहीं, कोई समंदर भी नहीं
अश्क आंखों में हैं वीरान शिवालों की तरह

पलटे औराक़ कभी हमने गुज़श्ता पल के
दूर होते गए ख़्वाबों से मिसालों की तरह
-फ़िरदौस ख़ान
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

विश्व पुस्तक मेले में हमारी किताब...




विश्व पुस्तक मेले में प्रभात प्रकाशन के स्टॉल पर हमारी किताब
यूं तो पुस्तक प्रेमियों को हमेशा ही विश्व पुस्तक मेले का बेसब्री से इंतज़ार रहता है...लेकिन इस बार बात अलग थी...क्योंकि हमारी किताब भी विश्व पुस्तक मेले में प्रदर्शित होने वाली थी...वो दिन भी आया जब राजधानी दिल्ली के प्रगति मैदान में लगे पुस्तक मेले में हमारी किताब 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' भी छाई रही... इसे ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह) ने शाया किया है. अपनी किताब को यहां देखकर बेहद ख़ुशी हुई...जैसा नाम से ही ज़ाहिर होता है...हमारी किताब गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ में 55 संतों और फ़क़ीरों  की वाणी एवं जीवन-दर्शन को प्रस्‍तुत किया गया है...

नेशलन बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित 19वां विश्व पुस्तक मेला राजधानी दिल्ली के प्रगति मैदान में 30 जनवरी को शुरू हुआ. सात फ़रवरी तक चले इस पुस्तक मेले का उदघाटन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने किया. इस मौक़े पर उन्होंने कहा कि विश्व पुस्तक मेला एक संवृद्ध विरासत है. इस पुस्तक मेले का मक़सद हज़ारों किताबों  को ज़्यादा से ज़्यादा  लोगों तक पहुंचाना है. अपने एक संदेश में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल  ने कहा कि किताबें मानव ज्ञान का भंडार हैं और यह महत्वपूर्ण है कि देश के पाठकों के लिए सभी क्षेत्र से जुड़ी पुस्तकें उपलब्ध हों.
देश-विदेश के तक़रीबन 1,200 प्रकाशकों ने पुस्तक मेले में अपनी किताबों की प्रदर्शनी लगाई. तक़रीबन  4,200 वर्गमीटर में फैले इस मेला क्षेत्र में 2,400 बुक स्टॉल लगाए गए.  इस साल पिछले साल से ज़्यादा स्टॉल लगे.  हालत यह रही कि हॉल के बाहर भी काफ़ी जगह प्रकाशकों को दी गई . मेले में तक़रीबन 90  फ़ीसदी अंग्रेजी की किताबें थीं.  अमेरिका और ब्रिटेन के बाद हिन्दुस्तान अंग्रेजी किताबों के प्रकाशन का तीसरा सबसे बड़ा देश है. हिन्दुस्तान दुनिया के बड़े पुस्तक बाजारों में एक है और इसी वजह से दुनियाभर के प्रकाशकों ने हिन्दुस्तान का रुख़ किया है. साल 2006 के फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेले में दूसरी बार अथिति देश होना, साल 2009 के लंदन पुस्तक मेले का ‘मार्केट फोकस’ होना और 2009 के मास्को पुस्तक मेले में अथिति देश होना पुस्तक बाज़ार में हिन्दुस्तान के महत्व को रेखांकित करता है. अन्य भाषाओं का ज़िक्र करें तो यहां 18 से ज़्यादा भाषाओं में किताबें प्रकाशित होती हैं.  यहां विभिन्न भाषाओं के 12 हज़ार से ज़्यादा प्रकाशक हैं, जो हर साल तक़रीबन एक लाख किताबें प्रकाशित करते हैं. यहां सबसे ज़्यादा किताबें क्षेत्रीय भाषाओं में छपती हैं. इनमें हिंदी पहले स्थान पर है.

इस बार का मेला राष्ट्रकुल खेल को समर्पित किया गया था. इस पुस्तक मेले की विषय वस्तु ‘रीडिंग अवर कॉमनवेल्थ’ यानी ‘हमारे साझा वैभव का अध्ययन’ थी. राष्ट्रकुल खेल के नाम एक पूरा पवेलियन था, जिसमें खेल से जुड़ी दुनियाभर की किताबें थीं.  इसके लिए कैटलॉग भी बनाया गया था, ताकि बाद में भी उन किताबों के बारे में विस्तृत जानकारी हासिल की जा सके. देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू पर अलग से किताबें प्रदर्शित की गईं . इनमें नेहरू पर लिखी दुनियाभर की किताबों को शामिल किया गया. मेले में एक बाल पवेलियन भी था, जिसमें अनेक एनजीओ द्वारा बच्चों की रचनात्मकता को प्रोत्साहित करने वाली गतिविधियां शामिल थीं.

ग़ौरतलब है कि मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय पुस्तक ट्रस्ट द्वारा हर दूसरे साल विश्व पुस्तक मेले का आयोजन किया जाता है. यह एक स्वायत्त संगठन है और इसका काम किताबों को बढ़ावा देना है. इसके अलावाब भारतीय व्यापार संवर्धन संगठन सह-संयोजक के तौर पर इस मेले में शामिल रहता है. यह भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के तत्वावधान में काम करता है. यह देश के व्यापार और उद्योगों के विकास के लिए काम करता है. विश्व  पुस्तक मेले के आयोजन का मक़सद जनमानस में किताबों के लिए दिलचस्पी  पैदा करना है.

नेशलन बुक ट्रस्ट द्वारा  द्विवार्षिक विश्व पुस्तक मेला पहली बार 1972 में दिल्ली के विंडसर पैलेस इलाक़े में लगा था. तक़रीबन 7780 वर्ग मीटर क्षेत्र में आयोजित इस मेले में 200 प्रकाशकों ने हिस्सा लिया था. अगली बार यानी 1976 में लगे दूसरे विश्व पुस्तक मेले में प्रकाशकों की तादाद बढ़कर 266 हो गई थी.  इस साल 42,839 वर्ग मीटर क्षेत्र में आयोजित 19वें विश्व पुस्तक मेले में 1234 प्रकाशकों ने शिरकत की. 2006 में आयोजित पुस्तक मेले में 10 लाख से ज़्यादा लोग आए थे, जबकि इस साल इनकी तादाद तक़रीबन 20 लाख तक पहुंच गई थी.

दुनियाभर के प्रकाशक सैकड़ों नई किताबें लेकर आए. प्रभात प्रकाशन के प्रमुख प्रभात कुमार ने बताया कि वे पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृषण आडवाणी की मेरा देश मेरा जीवन और फ़िरदौस ख़ान की किताब गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत के सहित कई अच्छी किताबें लेकर आए, जिन्हें बहुत सराहा गया. राजकमल प्रकाशन की किताबें भी मेले में छाई रहीं. किताब घर प्रकाशन के प्रमुख सत्यव्रत का कहना है कि वे 35 नईं किताबें लेकर आए. इनमें साहित्यिक पुस्तकों के अलावा ज्ञान-विज्ञान से संबंधित किताबें भी शामिल थीं. ओशियन बुक्स के निदेशक डॉ. पीयूष कुमार भी हिंदी और अंग्रेजी की सौ से ज़्यादा नई किताबें लाए., जिनमें हिंदी की किताबें ज़्यादा थीं. रॉली बुक्स और डायमंड बुक्स ने भी कई नई किताबें प्रदर्शित कीं.

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार कहते हैं- लेखिका चिन्तक है, सुधारवादी है, परिश्रमी है, निर्भय होकर सच्चाई के नेक मार्ग पर चलने की हिम्मत रखती है. विभिन्न समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में नानाविध विषयों पर उसके लेख छपते रहते हैं. ज़िंदगी में यह पुस्तक लेखिका को एवं समाज को ठीक मिशन के साथ मंज़िल की ओर बढ़ने का अवसर प्रदान करेगी. सफलताओं की शुभकामनाओं के साथ मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा उस पर उसकी कृपा सदैव बरसती रहे. मुझे विश्वास है कि प्रकाश स्तंभ जैसी यह पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ सभी देशवासियों को इस सच्ची राह पर चलने की हिम्मत प्रदान करेगी.




किताब का नाम : गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत 
लेखिका : फ़िरदौस ख़ान
पेज : 172
क़ीमत : 200 रुपये


प्रकाशक
ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह)
205 -सी, चावड़ी बाज़ार
दिल्ली-110006


प्रभात प्रकाशन 
4/19, आसफ़  अली रोड, दरियागंज
नई दिल्ली-110002
फ़ोन : 011 23289555

Ganga jamuni sanskriti ke agradoot written by Firdaus Khan





  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS

सरफ़रोशी के हम गीत गाते रहे...

मुस्कराते रहे, ग़म उठाते रहे
सरफ़रोशी के हम गीत गाते रहे

रोज़ बसते नहीं हसरतों के नगर
ख़्वाब आंखों में फिर भी सजाते रहे

रेगज़ारों में कटती रही ज़िन्दगी
ख़ार चुभते रहे, गुनगुनाते रहे

ज़िन्दगीभर उसी अजनबी के लिए
हम भी रस्मे-दहर को निभाते रहे
-फ़िरदौस ख़ान
  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • Twitter
  • RSS