फूल तुमने जो कभी मुझको दिए थे ख़त में


जीना मुहाल था जिसे देखे बिना कभी
उसके बगैर कितने ज़माने गुज़र गए

फूल तुमने जो कभी मुझको दिए थे ख़त में
वो किताबों में सुलगते हैं सवालों की तरह

मैं उस तरफ़ से अब भी गुज़रती तो हूं मगर
वो जुस्तजू, वो मोड़, वो संदल नहीं रहा

आप अगर यूं ही मुझे तकते रहे
नाम अपना आइना रख लूंगी मैं

रातभर दर्द के जंगल में घुमाती है मुझे
याद उस शख्स की हर रोज़ रुलाती है मुझे

देख लेना मेरी तक़दीर भी चमकेगी ज़रूर
मेरी आवाज़ से रौशन ये ज़माना होगा

जगह मिलती है हर इक को कहां फूलों के दामन
हर इक क़तरा मेरी जां कतरा-ए-शबनम नहीं होता

आज अपनी पसंद के चंद अशआर पोस्ट कर रही हूं...उम्मीद करती हूं पढ़ने वालों को पसंद आएंगे...
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17 Response to "फूल तुमने जो कभी मुझको दिए थे ख़त में"

  1. seema gupta says:
    15 अक्तूबर 2008 को 11:07 am

    रातभर दर्द के जंगल में घुमाती है मुझे
    याद उस शख्स की हर रोज़ रुलाती है मुझे
    " ye shabd mujhe dil se rula gye.."

    Regards

  2. neeshoo says:
    15 अक्तूबर 2008 को 11:09 am

    फिरदौस भाई , लाजवाब कविता । बहुत ही अच्छी लगी । क्या खूब लिख रहे हैं । आज जैसे ही ब्लागवानी पर आपइकी पोस्ट खोजने बैठा तुरंत ही ये दिख गयी । शुभ वर्तमान

  3. Dr. Nazar Mahmood says:
    15 अक्तूबर 2008 को 11:37 am

    जीना मुहाल था जिसे देखे बिना कभी
    उसके बगैर कितने ज़माने गुज़र गए


    waqai waqt aise hi guzar jata hai.
    congrats

  4. रौशन says:
    15 अक्तूबर 2008 को 11:53 am

    बहुत खूब

  5. ओमकार चौधरी says:
    15 अक्तूबर 2008 को 11:56 am

    रातभर दर्द के जंगल में घुमाती है मुझे
    याद उस शख्स की हर रोज़ रुलाती है मुझे

    बहुत अच्छी लाइनें हैं. फिरदौस बहुत अच्छा लिख रही हो. शुभ कामनाएं.
    मै आपके इस हुनर से नावाकिफ था. लिखती रहें.

  6. विवेक सिंह says:
    15 अक्तूबर 2008 को 1:09 pm

    अति सुन्दर !

  7. विवेक सिंह says:
    15 अक्तूबर 2008 को 1:15 pm

    neeshoo जी फिरदौस भाई नही़ं हैं . महिला हैं वह . उनको यथायोग्य भाभी जी या बहिन जी कह सकते हैं आप .

  8. श्यामल सुमन says:
    15 अक्तूबर 2008 को 5:14 pm

    फिरदौस जी,

    आप अगर यूं ही मुझे तकते रहे
    नाम अपना आइना रख लूंगी मैं

    बहुत खूब। वास्ती साहब कहते हैं कि-

    खुद अक्स उलट जाये तो क्या दोष है मेरा।
    मैं वक्त का आइना हूँ सच बोल रहा हूँ।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    www.manoramsuman.blogspot.com

  9. saleem akhter siddiqui says:
    15 अक्तूबर 2008 को 9:13 pm

    main blog ki duniya ka mahaz 8 din purana bashinda hoon. mujhe maloom nahin tha ki main ab tak aise khzane se mahroom hoon, jahan adab hi adab mojood hai. blog ki duniya waqai laajawab hai. omkar bhai ka shukriya, unhone hi mujhe is duniya se ru-ba-ru karya tha. shukriya omkar bhai. firdos aapki shyri acchi hai.

  10. शायदा says:
    15 अक्तूबर 2008 को 10:38 pm

    जीना मुहाल था जिसे देखे बिना कभी
    उसके बगैर कितने ज़माने गुज़र गए

    क्‍या ख़ूब कहा है...

  11. dr. ashok priyaranjan says:
    15 अक्तूबर 2008 को 10:54 pm

    firdausji,
    chand ashar mein aapney jindagi ki haqeekat aur falsafa vayan kar diya hai. bahut achcha likha hai aapney lekin ye panktyan to bemisal hain-
    जीना मुहाल था जिसे देखे बिना कभी
    उसके बगैर कितने ज़माने गुज़र गए

    आप अगर यूं ही मुझे तकते रहे
    नाम अपना आइना रख लूंगी मैं

    रातभर दर्द के जंगल में घुमाती है मुझे
    याद उस शख्स की हर रोज़ रुलाती है मुझे

  12. pallavi trivedi says:
    16 अक्तूबर 2008 को 12:45 am

    फूल तुमने जो कभी मुझको दिए थे ख़त में
    वो किताबों में सुलगते हैं सवालों की तरह

    bahut badhiya...ye sher sabse jyada pasand aaya.

  13. मौसम says:
    16 अक्तूबर 2008 को 11:20 am

    जीना मुहाल था जिसे देखे बिना कभी
    उसके बगैर कितने ज़माने गुज़र गए

    फूल तुमने जो कभी मुझको दिए थे ख़त में
    वो किताबों में सुलगते हैं सवालों की तरह

    मैं उस तरफ़ से अब भी गुज़रती तो हूं मगर
    वो जुस्तजू, वो मोड़, वो जंगल नहीं रहा

    हर शेअर...बेहतरीन...उम्दा...और दिल को छू जाने वाला...

  14. "Arsh" says:
    27 अक्तूबर 2008 को 8:00 pm

    bahot khub bahot sundar likha hai aapne ...



    arsh

  15. Yashwant Yash says:
    4 अक्तूबर 2014 को 12:49 pm

    कल 05/अक्तूबर/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

  16. गिरिजा कुलश्रेष्ठ says:
    5 अक्तूबर 2014 को 1:53 pm

    बहुत शानदार

  17. Lekhika 'Pari M Shlok' says:
    5 अक्तूबर 2014 को 4:53 pm

    Bahut sunder likha hai har ashaaar behatareen .....

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