शरारे बनके बरसते हैं अब इंतज़ार के फूल...फ़िरदौस ख़ान


सिसकती वादियां कहती हैं देवदारों से
शरारे बनके बरसते हैं अब इंतज़ार के फूल...

सच...इंतज़ार की भी अपनी ही ख़ुशी और अपना ही ग़म होता है...यह ख़ुशी और ग़म... इस बात पर निर्भर करता है कि इंतज़ार किसका किया जा रहा है... ? फ़िलहाल एक गुज़ारिश पर अपनी ग़ज़ल पेश कर रहे हैं... अनुराग मुस्कान साहब की एक तस्वीर के साथ, जो कई बरस पहले उन्होंने हमारी एक नज़्म के लिए भेजी थी...
 
ग़ज़ल
लुत्फ़ जब भी किसी मंज़र का उठाया हमने
दिल को बेचैन-सा वीरान सा पाया हमने

आज फिर याद किया धूप में जलकर उसको
आज फिर छत पे वही ख़्वाब बुलाया हमने

हादसा आज अचानक वही फिर याद आया
कितनी मुश्किल से जिसे दिल से भुलाया हमने

नर्म झोंके की तरह दिल को जो छूकर गुज़रा
ग़म उसी शख्स का ताउम्र उठाया हमने

जिसको ठुकरा दिया 'फ़िरदौस' जहां ने, उसको
अपने गीतों में सदा ख़ूब सजाया हमने
-फ़िरदौस ख़ान

तस्वीर : अनुराग मुस्कान  
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36 Response to "शरारे बनके बरसते हैं अब इंतज़ार के फूल...फ़िरदौस ख़ान"

  1. वन्दना says:
    24 नवम्बर 2010 4:33 pm

    लुत्फ़ जब भी किसी मंज़र का उठाया हमने
    दिल को बेचैन-सा वीरान सा पाया हमने


    आह!!!क्या खूब कहा है


    आज फिर याद किया धूप में जलकर उसको
    आज फिर छत पे वही ख़्वाब बुलाया हमने


    एक मंज़र जैसे आंखों मे उतर आया हो


    नर्म झोंके की तरह दिल को जो छूकर गुज़रा
    ग़म उसी शख्स का ताउम्र उठाया हमने

    उफ़!दर्द से लबरेज़ अल्फ़ाज़ दिल मे चुभ गये।

  2. फ़िरदौस ख़ान says:
    24 नवम्बर 2010 4:40 pm

    शुक्रिया वन्दना जी!
    एक दर्द का रिश्ता ही ऐसा होता है, जो हमेशा साथ निभाता है...आप खुद निभाना चाहें या न चाहें...

  3. sada says:
    24 नवम्बर 2010 4:47 pm

    नर्म झोंके की तरह दिल को जो छूकर गुज़रा
    ग़म उसी शख्स का ताउम्र उठाया हमने ।


    बहुत ही सुन्‍दरता से व्‍यक्‍त किया है हर शब्‍द में हर भाव को ।

  4. jay says:
    24 नवम्बर 2010 4:48 pm

    जिसको ठुकरा दिया 'फ़िरदौस' जहां ने, उसको
    अपने गीतों में सदा ख़ूब सजाया हमने...........अब इस दर्द के निहितार्थ तो मुझे नहीं मालूम...लेकिन फ़िर भी यह कहना चाहूँगा शायरा को कि 'एक चेहरे की नाराजगी से दर्पण नहीं मरा करता है'....इंतज़ार ज़रूर कीजिये, तवीयत से कीजिये, लेकिन इंतज़ार करते रहने लायक खुद को बनाये रखने की ऊर्जा भी यूं ही नहीं मिल जाती. उसके लिए भी जीना ही पड़ता है. हो सकता है कि शायर किसी दुसरे का इंतज़ार खत्म करवा कर अपने लिए इंतज़ार करते रहने लायक ऊर्जा प्राप्त करती रहे...बहरहाल.
    बहुत अच्छे अलफ़ाज़...दर्द के समंदर को पार कर लिखा गया कलाम....बहोऊत खूब....बधाई.

  5. jay says:
    24 नवम्बर 2010 4:48 pm

    जिसको ठुकरा दिया 'फ़िरदौस' जहां ने, उसको
    अपने गीतों में सदा ख़ूब सजाया हमने...........अब इस दर्द के निहितार्थ तो मुझे नहीं मालूम...लेकिन फ़िर भी यह कहना चाहूँगा शायरा को कि 'एक चेहरे की नाराजगी से दर्पण नहीं मरा करता है'....इंतज़ार ज़रूर कीजिये, तवीयत से कीजिये, लेकिन इंतज़ार करते रहने लायक खुद को बनाये रखने की ऊर्जा भी यूं ही नहीं मिल जाती. उसके लिए भी जीना ही पड़ता है. हो सकता है कि शायर किसी दुसरे का इंतज़ार खत्म करवा कर अपने लिए इंतज़ार करते रहने लायक ऊर्जा प्राप्त करती रहे...बहरहाल.
    बहुत अच्छे अलफ़ाज़...दर्द के समंदर को पार कर लिखा गया कलाम....बहोऊत खूब....बधाई.

  6. jay says:
    24 नवम्बर 2010 4:48 pm

    जिसको ठुकरा दिया 'फ़िरदौस' जहां ने, उसको
    अपने गीतों में सदा ख़ूब सजाया हमने...........अब इस दर्द के निहितार्थ तो मुझे नहीं मालूम...लेकिन फ़िर भी यह कहना चाहूँगा शायरा को कि 'एक चेहरे की नाराजगी से दर्पण नहीं मरा करता है'....इंतज़ार ज़रूर कीजिये, तवीयत से कीजिये, लेकिन इंतज़ार करते रहने लायक खुद को बनाये रखने की ऊर्जा भी यूं ही नहीं मिल जाती. उसके लिए भी जीना ही पड़ता है. हो सकता है कि शायर किसी दुसरे का इंतज़ार खत्म करवा कर अपने लिए इंतज़ार करते रहने लायक ऊर्जा प्राप्त करती रहे...बहरहाल.
    बहुत अच्छे अलफ़ाज़...दर्द के समंदर को पार कर लिखा गया कलाम....बहोऊत खूब....बधाई.

  7. jay says:
    24 नवम्बर 2010 4:49 pm

    जिसको ठुकरा दिया 'फ़िरदौस' जहां ने, उसको
    अपने गीतों में सदा ख़ूब सजाया हमने...........अब इस दर्द के निहितार्थ तो मुझे नहीं मालूम...लेकिन फ़िर भी यह कहना चाहूँगा शायरा को कि 'एक चेहरे की नाराजगी से दर्पण नहीं मरा करता है'....इंतज़ार ज़रूर कीजिये, तवीयत से कीजिये, लेकिन इंतज़ार करते रहने लायक खुद को बनाये रखने की ऊर्जा भी यूं ही नहीं मिल जाती. उसके लिए भी जीना ही पड़ता है. हो सकता है कि शायर किसी दुसरे का इंतज़ार खत्म करवा कर अपने लिए इंतज़ार करते रहने लायक ऊर्जा प्राप्त करती रहे...बहरहाल.
    बहुत अच्छे अलफ़ाज़...दर्द के समंदर को पार कर लिखा गया कलाम....बहुत खूब....बधाई.

  8. jay says:
    24 नवम्बर 2010 4:50 pm

    जिसको ठुकरा दिया 'फ़िरदौस' जहां ने, उसको
    अपने गीतों में सदा ख़ूब सजाया हमने...........अब इस दर्द के निहितार्थ तो मुझे नहीं मालूम...लेकिन फ़िर भी यह कहना चाहूँगा शायरा को कि 'एक चेहरे की नाराजगी से दर्पण नहीं मरा करता है'....इंतज़ार ज़रूर कीजिये, तवीयत से कीजिये, लेकिन इंतज़ार करते रहने लायक खुद को बनाये रखने की ऊर्जा भी यूं ही नहीं मिल जाती. उसके लिए भी जीना ही पड़ता है. हो सकता है कि शायर किसी दुसरे का इंतज़ार खत्म करवा कर अपने लिए इंतज़ार करते रहने लायक ऊर्जा प्राप्त करती रहे...बहरहाल.
    बहुत अच्छे अलफ़ाज़...दर्द के समंदर को पार कर लिखा गया कलाम....बहुत खूब....बधाई.

  9. महेन्द्र मिश्र says:
    24 नवम्बर 2010 4:52 pm

    आज फिर याद किया धूप में जलकर उसको
    आज फिर छत पे वही ख़्वाब बुलाया हमने


    बहुत सुन्दर गजल प्रस्तुति... आभार

  10. मौसम says:
    24 नवम्बर 2010 4:53 pm

    लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी को सलाम पेश करते हैं.
    आपको हुस्न व कलाम की मलिका कहना ज़्यादा मुनासिब रहेगा.
    इसी को कहते हैं-beauty with brains
    हमें आपका कलाम किसी आयतों की तरह याद है.
    बस यूं ही लिखती रहा करें. बेसब्री से आपके कलाम का इंतज़ार रहते है.

  11. मौसम says:
    24 नवम्बर 2010 4:59 pm

    इस दोस्त की एक गुज़ारिश है- किसी ऐसे इंसान का इंतज़ार मत कीजिएगा. जो आपके लायक़ ही न हो.
    बहरहाल आपके लिए तो कोई 7 जन्म भी इंतज़ार कर सकता है.

  12. संजय भास्कर says:
    24 नवम्बर 2010 5:14 pm

    आदरणीय फ़िरदौस ख़ान जी
    नमस्कार !
    बहुत सुन्दर गजल प्रस्तुति...... आभार
    कमाल की लेखनी है आपकी लेखनी को नमन बधाई

  13. shikha varshney says:
    24 नवम्बर 2010 6:01 pm

    आज फिर याद किया धूप में जलकर उसको
    आज फिर छत पे वही ख़्वाब बुलाया हमने
    बेहद खूबसूरत पंक्तियाँ है ..बहुत ही खूबसूरती से अहसासों को पिरोया है आपने.

  14. Tausif Hindustani says:
    24 नवम्बर 2010 6:12 pm

    हादसा आज अचानक वही फिर याद आया
    कितनी मुश्किल से जिसे दिल से भुलाया हमने

    सही मायने में आपने भूली बातों याद करा दिया
    dabirnews.blogspot.com

  15. Shah Nawaz says:
    24 नवम्बर 2010 6:28 pm

    लुत्फ़ जब भी किसी मंज़र का उठाया हमने
    दिल को बेचैन-सा वीरान सा पाया हमने

    बहुत ही बेहतरीन अश`आर.... बेहतरीन ग़ज़ल...

  16. Alok Mohan says:
    24 नवम्बर 2010 7:27 pm

    वाह जी बस दिल को छू गयी

  17. Dorothy says:
    24 नवम्बर 2010 8:06 pm

    हादसा आज अचानक वही फिर याद आया
    कितनी मुश्किल से जिसे दिल से भुलाया हमने

    दिल को छूने वाली, खूबसूरत और मर्मस्पर्शी प्रस्तुति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

  18. भारतीय नागरिक - Indian Citizen says:
    24 नवम्बर 2010 8:36 pm

    नर्म झोंके की तरह दिल को जो छूकर गुज़रा
    ग़म उसी शख्स का ताउम्र उठाया हमने
    bahut sundar panktiyan..

  19. 'साहिल' says:
    24 नवम्बर 2010 8:47 pm

    khoobsurat ghazal, ye do sher kuch khaas lage.

    लुत्फ़ जब भी किसी मंज़र का उठाया हमने
    दिल को बेचैन-सा वीरान सा पाया हमने

    आज फिर याद किया धूप में जलकर उसको
    आज फिर छत पे वही ख़्वाब बुलाया हमने

  20. शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' says:
    24 नवम्बर 2010 9:41 pm

    आज फिर याद किया धूप में जलकर उसको
    आज फिर छत पे वही ख़्वाब बुलाया हमने
    बहुत खूबसूरत शेर...
    नर्म झोंके की तरह दिल को जो छूकर गुज़रा
    ग़म उसी शख्स का ताउम्र उठाया हमने
    क्या बात है...वाह
    पूरी ग़ज़ल उम्दा है.

  21. ZEAL says:
    25 नवम्बर 2010 6:40 am

    सुन्दर गजल !

  22. राजकुमार सोनी says:
    25 नवम्बर 2010 10:55 am

    बहुत ही कमाल की रचना लिखी है आपने
    आपको बधाई

  23. Javed says:
    25 नवम्बर 2010 11:51 am

    लफ़्ज़ों के जज़ीरे की शहज़ादी को सलाम पेश करते हैं.
    आपको हुस्न व कलाम की मलिका कहना ज़्यादा मुनासिब रहेगा.
    इसी को कहते हैं-beauty with brains
    हमें आपका कलाम किसी आयतों की तरह याद है.

    हमारा भी यही मानना है बस यूं ही लिखती रहा करें. बेसब्री से आपके कलाम का इंतज़ार रहते है.

  24. Javed says:
    25 नवम्बर 2010 11:53 am

    आज फिर याद किया धूप में जलकर उसको
    आज फिर छत पे वही ख़्वाब बुलाया हमने

    नर्म झोंके की तरह दिल को जो छूकर गुज़रा
    ग़म उसी शख्स का ताउम्र उठाया हमने
    बहुत खूबसूरत.......

  25. Girish Billore 'mukul' says:
    25 नवम्बर 2010 11:53 am

    छुटकी
    बहुतै उम्दा लिखी हो

  26. Javed says:
    25 नवम्बर 2010 11:54 am

    आप जितनी ख़ूबसूरत हैं.......आपका कलाम भी उतना ही ख़ूबसूरत है.......

  27. संगीता स्वरुप ( गीत ) says:
    25 नवम्बर 2010 12:44 pm

    नर्म झोंके की तरह दिल को जो छूकर गुज़रा
    ग़म उसी शख्स का ताउम्र उठाया हमने

    जिसको ठुकरा दिया 'फ़िरदौस' जहां ने, उसको
    अपने गीतों में सदा ख़ूब सजाया हमने

    बहुत खूबसूरती से एहसासों को सजाया है ...बहुत खूब ...दर्द भी कितना खूबसूरत होता है ..

  28. mridula pradhan says:
    26 नवम्बर 2010 1:27 pm

    gazab ka likha hai .wah.

  29. amar jeet says:
    27 नवम्बर 2010 11:38 am

    बहुत अच्छी उम्दा रचना !कहते है की इंतजार का फल मीठा होता है ................

  30. amar jeet says:
    27 नवम्बर 2010 11:45 am

    बहुत अच्छी उम्दा रचना !कहते है की इंतजार का फल मीठा होता है ................

  31. amar jeet says:
    29 नवम्बर 2010 9:25 am

    इस बार मेरे ब्लॉग में '''''''''महंगी होती शादिया .............

  32. जयकृष्ण राय तुषार says:
    2 दिसम्बर 2010 3:46 pm

    bahut hi khoobsorat gazal badhai

  33. MAHFUZ says:
    20 दिसम्बर 2010 3:35 pm

    लुत्फ़ जब भी किसी मंज़र का उठाया हमने
    दिल को बेचैन-सा वीरान सा पाया हमने

    Wonderful... kya baat hai !!!!!!!!

  34. "पलाश" says:
    22 दिसम्बर 2010 11:21 pm

    बेहद खूबसूरत गजल कही आपने

  35. shekhar Patil says:
    21 फरवरी 2012 9:05 am

    बहोत बढीया

  36. vedvyathit says:
    21 फरवरी 2012 2:59 pm

    sundr rchna bdhai

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