नारी का मन...
फ़िरदौस ख़ान
एक नारी का मन
प्रेमियों के बिना शायद स्थिर नहीं रह पाता...क्या यह सच है...? क्या नारी का मन सचमुच इतना चंचल होता है
कि उसे स्थिर रखने के लिए एक पुरुष की ज़रूरत पड़ती है... क्या नारी बंधन में ही सुख पाती है...बंधन
भी ऐसा जिसमें वह ख़ुद अपनी मर्ज़ी से बंधती है...या फिर वह किसी पुरुष को बांधे
रखना चाहती है...
प्रसिद्ध
इतालवी लेखक रोबर्तो
कलासो की किताब 'क
भारतीय मानस और देवताओं की कहानियां' में अर्जुन के एक साल के अज्ञातवास का ज़िक्र करते हुए रोबर्तो कलासो लिखते हैं- "एक वर्ष कठिनाई भरा, संघर्ष पूर्ण, बुरी तरह थका देने वाला, लेकिन आवेगपूर्ण था. संध्या समय कन्याओं का
एक छोटा समूह उन्हें घेरकर बैठ जाता और वह दैत्यों, राजाओं, राज कन्याओं और योद्धाओं की मनोरंजक कथाएं सुनाते.
लड़कियां उन्हें सारा समय घेरे रहतीं और उनका नृत्य मुद्राओं तथा हाव-भाव का अनुसरण
करतीं. दिन का समय प्राय: नृत्यशाला में बीतता था. विराट एक समृद्ध राज्य का राजा
था, किंतु समस्याएं भी
अनेक थीं. सबसे बड़ी समस्या तो बेटी उत्तरा स्वयं थी. अर्जुन ने मन ही मन प्रण किया
कि वह उत्तरा को स्पर्श तक नहीं करेंगे, लेकिन न जाने क्या बात थी, दोनों का समय अधिकतर साथ-साथ ही बीतता था.
अर्जुन ने अपने मन को बस इतना ही अधिकार दिया था कि वह उत्तरा को लेकर कल्पना का
ताना-बाना बुन सकते थे. उत्तरा के लिए तो स्थिति और भी दारुण थी. अभी तक वह बहुत
छोटी थी-किसी बच्ची जैसी, जो
अपने अदृश्य प्रेमी
के घेरे से बाहर आ रही थी धीरे-धीरे. सर्वप्रथम उसे प्राप्त करने वालों में था
सोम. फिर आया गंधर्व. तीसरे अदृश्य पति थे अग्नि और चौथा एक मनुष्य हो सकता था. एक
नारी का मन प्रेमियों के बिना शायद स्थिर नहीं रह पाता. वह पहले सोम के साथ रहती
रही, फिर गंधर्व और फिर
अग्नि के साथ. अब एक मानव प्रेमी की प्रतीक्षा कर रही थी. वह कोई भी हो सकता था.
उस मनुष्य की खोज अर्जुन में पूरी हो गई जो उत्तरा को नृत्य-संगीत की शिक्षा दे
रहे थे. लेकिन अर्जुन के लिए इतना ही पर्याप्त था, इससे अधिक कुछ नहीं. वह उत्तरा की अति निकटता के बचकर
चलते थे. उत्तरा ने दुख भरे स्वर में कहा, आप तो किसी गंधर्व से भी दुर्लभ हैं और देवताओं से भी
अधिक अप्राप्य. आप भले ही मुझसे दूर-दूर रहें, मैं तो आप में समाई हूं...कहते-कहते वह रो पड़ी. इस
रूदन में दुख नहीं, गहन
आनंद की अनुभूति बोल रही थी. अर्जुन अब समझ सके कि उर्वशी ने उनसे कैसा भयानक प्रतिशोध लिया है.
क्योंकि उन्होंने उर्वशी को अपनी मां समझते हुए ठुकरा दिया था. इसलिए उन्हें उत्तरा को भी अस्वीकार करना था, अपनी बेटी मानकर."
बंधन...आख़िर बंधन ही होता है... भले वह प्रेम का ही क्यों न हो... मन तो चंचल
है...और वो अरमानों के पंखों के साथ सपनों के आसमान में उड़ान भरने को आतुर रहता है...
क्या प्रेम
सिर्फ़ एक बार ही होता है...या फिर बार-बार हो सकता है...उत्तरा ने कई बार प्रेम
किया...अलग-अलग पुरुषों से...सभी के साथ वह संतुष्ट रही... क्या कोई महिला अपने
प्रेमी या साथी के बिछड़ने पर उम्रभर उसका शोक मनाती रहे...या उसे भी नया प्रेमी या साथी तलाश लेना चाहिए...
अपने सहकर्मी
पुरुष के एक सवाल के जवाब में एक लड़की ने जवाब दिया-मैं बॉय फ्रेंड नहीं पालती...
एक दूसरी लड़की का कहना था कि बॉय फ्रेंड परेशानी का सबब बन जाते हैं...यानी
रोक-टोक लगाना... इससे न मिलो, उससे
बात न करो...ख़ुद भी कोई काम नहीं करके देंगे...और किसी दूसरे से काम कराने पर
उसमें हज़ार ऐब निकाल देंगे... इसलिए बॉय फ्रेंड रखकर कौन मुसीबत मोल ले... एक और लड़की कहती है-जब तक
किसी के साथ संबंध मधुर है, तब
तक तो ठीक है...लेकिन जैसे ही रिश्ते में कटुता आने लगे तो बेहतर है कि ऐसे रिश्ते
को तोड़ दिया जाए...
मेरी एक दोस्त की खाला को किसी लड़के से प्रेम हो गया... लड़के के घरवालों को रिश्ता
मंज़ूर नहीं था...वजह लड़की उनकी ज़ात की नहीं थी... कुछ वक़्त बाद लड़के ने अपने
घरवालों की पसंद से शादी कर ली, लेकिन
खाला ने शादी नहीं की...
उस लड़के का आज भरा पूरा परिवार है...बीवी है, बच्चे हैं... वह लड़का तो अपनी नई ज़िन्दगी में मस्त हो
गया...लेकिन उम्र के आख़िरी पड़ाव में वो अकेले ही दिन गुज़ार रही हैं... आख़िर इस प्यार ने उन्हें क्या दिया...?
अगर वह भी अपना नया साथी चुन लेतीं
तो शायद आज उनकी ज़िन्दगी इतनी वीरान नहीं होती... आख़िर नारी का मन ऐसा क्यों होता
है...?
क़रीब दो साल पहले मेरी दोस्त की शादी हुई
है...उसे भी एक लड़के से प्रेम था...दोनों की ज़ात अलग थी... लड़के में इतनी हिम्मत
नहीं थी कि वो समाज की ज़ात-बिरादरी की दीवार तोड़ कर उसे अपना पाता... मेरी दोस्त
बहुत रोती थी, इसलिए कि उसे
बुज़दिल लड़के से प्रेम हुआ...आख़िर वह रोती भी कितने दिन... उसने अपने घरवालों की
मर्ज़ी से शादी कर ली...
सोचती हूं कि कौन
सही है...? किसी के बिछड़ने
पर उम्रभर उसके ग़म में डूबी रहने वाली खाला या नया साथी चुनकर ज़िन्दगी के रास्ते पर आगे बढ़ जाने वाली दोस्त... बेशक, दोस्त ही सही है...क्योंकि ज़िन्दगी तो एक
बार ही मिलती है...फिर उसे किसी ऐसे व्यक्ति के लिए क्यों बर्बाद किया जाए,
जो या तो तुम्हें छोड़कर चला गया
है...या वो कभी तुम्हारा हो ही नहीं सकता...
तस्वीर : गूगल से साभार








26 नवम्बर 2011 1:34 pm
रिश्तों में बंधने के बाद ही प्रेम की परीक्षा होती है ..सार्थक चिंतन और गहन विश्लेषण ..
4 दिसम्बर 2011 3:40 pm
पता नहीं यह प्रेम कैसा तत्व है। कई बार सच्चा लगता है, असल लगता है और कई बार केवल छलावा, भौतिक आकर्षण।
वैसे मैं दूसरी स्थिति से सहमत हूँ कि यदि कोई साथ न दे तो दूसरा साथी चुन लेना चाहिये। तन्हाई में जीने से क्या मिलेगा।
16 दिसम्बर 2011 9:10 pm
तन्हाई से अच्छा है कि साथी तलाश करे....सुंदर पोस्ट ..