आख़िर आग और राई के दानों का रहस्य क्या था


फ़िरदौस ख़ान
विज्ञान और तर्कों के परे भी बहुत कुछ ऐसा है, जिस पर हम तब तक यक़ीन नहीं करते, जब तक अपनी आंखों से न देख लें...
बात हमारे बचपन की है... घर के पास एक बेकरी थी... हमारे यहां ब्रेड, समौसे और बिस्किट वहीं से आया करते थे... एक रोज़ बेकरी वाले ने पापा से कहा कि वह बहुत परेशान है... दो दिन से उसने कई मन लकड़ियां भट्ठी में फूंक दीं, इसके बावजूद भट्ठी में इतनी भी आंच नहीं हो पा रही है कि बिस्किट तक सिक सकें... उसने भट्ठी में बहुत सी लकड़ियां डालीं, आग की लपटें उठने लगीं, कोयले दहक के अंगारा बन गए... बिस्किट का पतरा भट्ठी के अंदर रखा गया, कुछ देर बाद उसे बाहर निकाला, तो बिस्किट कच्चे के कच्चे... उन्हें ज़रा भी आंच नहीं लगी...
फिर एक सयाने को बुलाया गया... उसने हाथ में राई के कुछ दाने लिए, कुछ पढ़ा और दानों पर दम करके भट्ठी में झोंक दिया... फिर बिस्किट का पतरा भट्ठी में रखा गया... पतरा बाहर आया, तो सभी बिस्किट सिके हुए थे...

भट्ठी में इतनी ढेर सारी लकड़ियां फूंक देने के बावजूद उसमें इतनी भी आंच क्यों नहीं हो पा रही थी कि बिस्किट सिक जाएं...
आख़िर राई के उन दानों पर ऐसा क्या पढ़कर फूंका गया था कि उनके भट्ठी में डालते ही इतनी आंच हो गई कि बिस्किट सिक गए...

आख़िर ये क्या रहस्य है... ?

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रहें न रहें हम, महका करेंगे…


फ़िरदौस ख़ान
मशहूर शायर एवं गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी का असली नाम असरारुल हसन ख़ान था. उनका जन्म एक अक्टूबर, 1919 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जनपद में हुआ था. उनके पिता पुलिस विभाग में उपनिरीक्षक थे. मजरूह ने दरसे-निज़ामी का कोर्स किया. इसके बाद उन्होंने लखनऊ के तकमील उल तिब कॉलेज से यूनानी पद्धति की डॉक्टरी की डिग्री हासिल की. फिर वह हकीम के तौर पर काम करने लगे, मगर उन्हें यह काम रास नहीं आया, क्योंकि बचपन से ही उनकी दिलचस्पी शेरो-शायरी में थी. जब भी मौक़ा मिलता, वह मुशायरों में शिरकत करते. उन्होंने अपना तख़ल्लुस मजरूह रख लिया. शायरी से उन्हें ख़ासी शोहरत मिली. वह मजरूह सुल्तानपुरी के नाम से विख्यात हुए.

उन्होंने अपना हकीमी का काम छोड़ दिया. एक मुशायरे में उनकी मुलाक़ात मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी से हुई. 1945 में वह एक मुशायरे में शिरकत करने मुंबई गए, जहां उनकी मुलाक़ात फ़िल्म निर्माता ए आर कारदार से हुई. कारदार उनकी शायरी पर फ़िदा थे. उन्होंने मजरूह सुल्तानपुरी से अपनी फ़िल्म में गीत लिखने की पेशकश की, लेकिन मजरूह ने इससे इंकार कर दिया, क्योंकि वह फ़िल्मों के लिए गीत लिखने को अच्छा नहीं मानते थे. जब मजरूह ने जिगर मुरादाबादी को यह बात बताई, तो उन्होंने सलाह दी कि वह फ़िल्मों के लिए गीत लिखें, इससे उन्हें शोहरत के साथ-साथ दौलत भी हासिल होगी. मजरूह सुल्तानपुरी को जिगर मुरादाबादी की बात पसंद आ गई और फिर उन्होंने फ़िल्मों में गीत लिखना शुरू कर दिया. मशहूर संगीतकार नौशाद ने मजरूह सुल्तानपुरी को एक धुन सुनाई और उनसे उस धुन पर एक गीत लिखने को कहा. मजरूह ने उस धुन पर गेसू बिखराए, बादल आए झूम के, गीत लिखा. इससे नौशाद ख़ासे प्रभावित हुए और उन्होंने उन्हें अपनी नई फ़िल्म शाहजहां के लिए गीत लिखने की पेशकश कर दी. मजरूह ने हर दौर के संगीतकारों के साथ काम किया. वह वामपंथी विचारधारा से ख़ासे प्रभावित थे. वह प्रगतिशील लेखक आंदोलन से भी जुड़ गए थे. उन्होंने 1940 के दशक में मुंबई में एक नज़्म माज़-ए-साथी जाने न पाए, पढ़ी थी. तत्कालीन सरकार ने इसे सत्ता विरोधी क़रार दिया था. सरकार की तरफ़ से उन्हें माफ़ी मांगने को कहा गया, लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया. नतीजतन, उन्हें डेढ़ साल मुंबई की ऑर्थर रोड जेल में बिताने पड़े. उनका कहना था-
मैं अकेला ही चला था जानिबे-मंज़िल मगर
लोग आते गए और कारवां बनता गया

मजरूह भले ही फ़िल्मों के लिए गीत लिखते रहे, लेकिन उनका पहला प्यार ग़ज़ल ही रही-
मिली जब उनसे नज़र बस रहा था एक जहां
हटी निगाह तो चारों तरफ़ थे वीराने

उन्होंने शायरी को महज़ मोहब्बत के जज़्बे तक सीमित न रखकर उसमें ज़िंदगी की जद्दोजहद को भी शामिल किया. उन्होंने ज़िंदगी को आम आदमी की नज़र से भी देखा और एक दार्शनिक के नज़रिये से भी. जेल में रहने के दौरान 1949 में लिखा उनका फ़िल्मी गीत-एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल… ज़िंदगी की सच्चाई को बयान करता है. बक़ौल बेकल उत्साही, मजरूह एक ऐसे शायर थे, जिनके कलाम में समाज का दर्द झलकता था. उन्हें एक हद तक प्रयोगवादी शायर और गीतकार भी कहा जा सकता है. उन्होंने अवध के लोकगीतों का रस भी अपनी रचनाओं में घोला था. इससे पहले शायरी की किसी और रचना में ऐसा नहीं देखा गया था. उन्होंने फ़िल्मी गीतों को साहित्य की बुलंदियों पर पहुंचाने में अहम किरदार निभाया. 1965 में प्रदर्शित फ़िल्म ऊंचे लोग का यह गीत इस बात की तस्दीक करता है-
एक परी कुछ शाद सी, नाशाद-सी
बैठी हुई शबनम में तेरी याद की
भीग रही होगी कहीं कली-सी गुलज़ार की
जाग दिल-ए-दीवाना

1993 में उन्हें सिनेमा जगत के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाज़ा गया. यह पुरस्कार पाने वाले वह पहले गीतकार थे. इसके अलावा 1965 में वह फ़िल्म दोस्ती में अपने गीत-चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे… के लिए फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए. मजरूह सुल्तानपुरी ने चार दशकों से भी ज़्यादा अरसे तक क़रीब तीन सौ फ़िल्मों के लिए तक़रीबन चार हज़ार गीत लिखे. मजरूह ने 24 मई, 2000 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी शायरी ने उन्हें अमर बना दिया. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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राजीव गांधी जी से वाबस्ता यादें


फ़िरदौस ख़ान
कुछ लोगों से ऐसा रिश्ता बन जाता है, जिसे लफ़्ज़ों में बयान नहीं किया जा सकता... राजीव गांधी जी से भी कुछ ऐसा ही रिश्ता था... हमारी अम्मी जान की फूफी जान को राजीव गांधी जी बहुत अच्छे लगते थे... टीवी पर राजीव गांधी जी को देखकर वो बहुत ख़ुश होती थीं... वो ख़बरों का बेसब्री से इंतज़ार करती थीं कि कब ख़बरें शुरू हों और उन्हें राजीव गांधी जी नज़र आएं...
पापा को भी राजीव गांधी जी बहुत पसंद थे... राजीव गांधी जी हमारी अम्मी के भी प्रिय नेता रहे हैं...
राजीव जी की बरसी पर बचपन का वो वाक़िया भी याद आ जाता है, जब राजीव गांधी जी की मौत की ख़बर सुनी थी... बात 25 साल पहले की है... आज ही के दिन यानी 21 मई को दस-बारह साल का एक तमिल लड़का भागा-भागा गया और उसने अम्मी जान से कहा- राजीव गांधी की मौत हो गई... अम्मी ने उसे बहुत डांटा और कहा कि ऐसा नहीं कहते... उस वक़्त अम्मी बहुत ग़ुस्से में थीं... लेकिन जब रेडियो और टीवी पर ये ख़बर सुनी और देखी, तो हमारे घर में उदासी छा गई...
आज भी जब हम उस वाक़िये को याद करते हैं, तो रूह कांप उठती है... सोचते हैं कि जब हमें इतनी तकलीफ़ होती है, तो तब सोनिया गांधी जी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी पर क्या गुज़री होगी और अब क्या गुज़रती होगी...
बच्चों के लिए उसके पापा का जाना बहुत तकलीफ़देह होता है... हमें भी आज अपने पापा की बहुत याद आती है... और उन्हें याद करके आंखें नम हो जाती हैं...
कुछ लोग ज़मीन पर राज करते हैं और कु्छ लोग दिलों पर. मरहूम राजीव गांधी एक ऐसी शख़्सियत थे, जिन्होंने ज़मीन पर ही नहीं, बल्कि दिलों पर भी हुकूमत की. वह भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हमारे दिलों में आज भी ज़िंदा हैं और हमेशा ज़िन्दा रहेंगे...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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इक राह तो वो होगी, तुम तक जो पहुंचती है...


मेरे महबूब !
मुझे हर उस शय से मुहब्बत है, जो तुम से वाबस्ता है... हमेशा से मुझे सफ़ेद रंग अच्छा लगता है... बाद में जाना कि ऐसा क्यों था...तुम्हें जब भी देखा सफ़ेद दूधिया लिबास में देखा... लोगों के हुजूम में तुम्हें देखकर ऐसा लगता है, जैसे चांद ख़ुद ज़मीं पर उतर आया हो... सच तुम इस ज़मीं का चांद ही तो हो, जिससे मेरी ज़िन्दगी में उजाला बिखरा है...

जब तुम परदेस में होते हो तो अपना देस भी बेगाना लगने लगता है...हर पल तुम्हारे लौटने का इंतज़ार रहता है...कभी ऐसा भी होता है कि परदेस ही अपना सा लगने लगता है, क्योंकि तुम वहां जो हो...सच मुहब्बत भी क्या शय है, जो ख़ुदा के क़रीब पहुंचा देती है... जबसे तुम्हारी परस्तिश की है, तब से ख़ुदा को पहचाना है... हर वक़्त तुम्हीं को क़रीब पाया है... सावन में जब आसमां पर काली घटाएं छा जातीं हैं और फिर बारिश की बूंदें प्यासी धरती की प्यास बुझाती हैं... जाड़ों में कोहरे से घिरी सुबह क्यारियों में महकते गुलाब फ़िज़ां में भीनी-भीनी ख़ुशबू बिखेर देते हैं...और गर्मियों  की तपती दोपहरों और सुलगती रातों में भी हर सिम्त तुम ही तुम नज़र आते हो...
तुम्हारे बग़ैर कुछ भी अच्छा नहीं लगता...

ख़्वाजा मुहम्मद ख़ां ताहिर साहब ने सच ही तो कहा है-
फिर ज़ुलैख़ा न नींद भर सोई
जबसे यूसुफ़ को ख़्वाब में देखा...

मुझे वो सड़क भी बेहद अज़ीज़ है, जो तुम्हारे शहर तक जाती है...वैसे मैं जहां रहती हूं, वहां से कई सड़कें तुम्हारे शहर तक जाती हैं...पर आज तक यह नहीं समझ पाई कि मैं किस राह पर अपना क़दम रखूं कि तुम तक पहुंच जाऊं...लेकिन दिल को एक तसल्ली ज़रूर है कि इन अनजान राहों में इक राह तो वो होगी, तुम तक जो पहुंचती है...
-फ़िरदौस ख़ान

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उस लड़के का मिलना...




बात बचपन की है...उस वक़्त हमारी उम्र सात साल के आसपास रही होगी...गर्मियों की छुट्टियों में पूरा परिवार उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर में गया था...हम सब बच्चे सुबह के क़रीब दस बजे आम के बाग़ में चले गए...खेल-खेल में हम बाग़ के क़रीब बने तालाब का पास पहुंच गए...पानी में उतरने का मन हुआ...तालाब कच्चा था...टांगें मिट्टी में धंस गईं...हम रोने लगे...तभी हमने देखा कि एक लड़का दौड़ता हुआ हमारे पास आया और उसने हमें पानी से बाहर निकाला...हम ज़ार-ज़ार रो रहे थे...उसने हमें चुप कराया...हमें डर लग रहा था कि घर पर डांट पड़ेगी...हालांकि कभी डांट नहीं पड़ती थी, लेकिन डर तो लगता ही था... हमारी गहरे आसमानी रंग की फ्राक कमर तक भीग गई थी...और कपड़ों पर मिट्टी भी लगी थी...उस लड़के ने अपनी हथेलियों में पानी भर-भरकर हमारी फ्राक धोई...अब फ्राक पूरी तरह साफ़ हो चुकी थी...
अब हम चहक रहे थे... हम दौड़कर अपने साथ खेल रहे बच्चों के पास गए...इस दौरान हमने कई बार पीछे मुड़कर देखा...वो लड़का वहीं तालाब के किनारे खड़ा हमें देख रहा था...

बचपन के इस वाक़िये को हम कभी नहीं भूल पाए...कहते हैं कि इंसान ज़िन्दगी में दो चीज़ें कभी नहीं भूलता...एक ख़ुशी देने वाली बात और दूसरी तकलीफ़ देने वाला हादसा...लेकिन यादों के संदूक़ में हम सिर्फ़ सुकून देने वाले लम्हों को ही सहेजकर रखते हैं...इसलिए तकलीफ़ देने वाली बातें कुछ वक़्त बात बेमानी हो जाती हैं...

कुछ वक़्त पहले हमें पता चला कि वो लड़का मुल्क की एक बहुत बड़ी हस्ती है...कई बार उससे मिलना हुआ... उसने बताया कि हमें तालाब से बाहर उसी ने निकाला था...वह अपने पापा के साथ वहां आया हुआ था...
उसने यह भी कहा कि जबसे उसने हमें गहरे आसमानी रंग की फ्राक में देखा था, तबसे उसे आसमान ज़्यादा ख़ूबसूरत लगने लगा था...

अजीब इत्तेफ़ाक़ है...हमें गहरा आसमानी रंग बहुत पसंद है...हमेशा हमारे पास गहरे आसमानी रंग के लिबास रहते हैं...बचपन में पापा गहरे आसमानी रंग की कई-कई फ्राकें दिलाकर लाते थे...स्कूल में इसी रंग की वर्दी थी...आधा दिन गहरे आसमानी रंग की वर्दी पहनने के बावजूद हम घर में भी इसी शोख़ रंग का लिबास पहनते थे... कुछ रोज़ पहले हमारे एक पाकिस्तानी दोस्त, जो हमारे रिश्तेदार भी हैं, जब जापान गए तो वहां से हमारे लिए गहरे आसमानी रंग का लिबास लेकर आए... गहरे आसमानी रंग की ज़मीन पर रंग-बिरंगे फूल...
ज़िन्दगी में बहुत-कुछ ऐसा भी होता है, जो किसी परी कथा सा लगता है... बचपन में उस लड़के का मिलना, हमारी मदद करना और फिर उम्र के इस मोड़ पर मिलना...सच कितना भला लगता है...वाक़ई ज़िन्दगी बहुत ख़ूबसूरत है...
-फ़िरदौस ख़ान
 

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सदक़ा


मेरे महबूब !
सोचती हूं
तुम्हारे सदक़े में
किसी साइल को
क्या दूं...
अगर मेरे हिस्से में जन्नत हो
तो वो उसके कांसे में डाल दूं...
और
तुम्हारी जान के सदक़े में
अपनी जान निसार कर दूं...
-फ़िरदौस ख़ान

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तुम्हारे नाम की चूड़ियां


मेरे महबूब !
तुम
हमेशा सलामत रहो...
मेरी कलाइयों में
तुम्हारे नाम की
हरे कांच की चूड़ियां
हमेशा खनकती रहें...
हथेलियों पर
तुम्हारे नाम की मेहंदी
रचती रहे...
और
बालों में
बेला के गजरे
तुम्हारे लम्स से
महकते रहें...
-फ़िरदौस ख़ान
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उन्हें अपनी पनाह में रखना


मेरे मौला !
उन्हें
हमेशा अपनी पनाह में रखना
जिनके नाम का कलमा
मेरी ज़बान पर रहता है
और
मेरी सांसें
जिनके नाम की
तस्बीह करती हैं...
-फ़िरदौस ख़ान
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दुआ, उन्हें दें


जब कोई हमें लंबी उम्र की दुआ देता है, तो दिल चाहता है कि उससे कह दें-
हमारे अज़ीज़ ! हमें लंबी उम्र की दुआ मत दो, क्योंकि हमारे होने या न होने से दुनिया को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा... फ़र्क़ पड़ेगा, तो सिर्फ़ हमारे घरवालों और कुछ अपनों को...
लंबी उम्र की दुआ देनी है, तो उसे दो, जिसके होने न होने से एक दुनिया को बहुत फ़र्क़ पड़ता है... बहुतों की उम्मीदें उससे वाबस्ता हैं...
कुछ लोगों को ख़ुदा ने इतनी ताक़त बख़्शी है कि वे करोड़ों लोगों की ज़िन्दगी को बेहतर बना सकते हैं...

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एक असाधारण सृजनशील कलाकार रबीन्द्रनाथ ठाकुर


फ़िरदौस ख़ान
रबीन्द्रनाथ ठाकुर को आधुनिक भारत का असाधारण सृजनशील कलाकार माना जाता है. वे बांग्ला कवि, कहानीकार, गीतकार, संगीतकार, नाटककार, निबंधकार और चित्रकार थे. वे एशिया के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता हैं, जिन्हें 1913 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इतना ही नहीं, वे एकमात्र ऐसे कवि हैं, जिनकी दो रचनाएं दो देशों का राष्ट्रगान बनीं. भारत का राष्ट्रगान जन गण मन और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान आमार सोनार बांग्ला गुरुदेव की ही रचनाएं हैं. ग़ौरतलब है कि उनका जन्म 7 मई, 1861 को कोलकाता के जो़डासांको ठाकुरबा़डी में हुआ था. उनकी शुरुआती शिक्षा सेंट ज़ेवियर स्कूल में हुई. इसके बाद 1878 में उन्होंने इंग्लैंड के ब्रिजटोन पब्लिक स्कूल में दाख़िला ले लिया. फिर उन्होंने लंदन कॉलेज विश्वविद्यालय में क़ानून का अध्ययन किया, लेकिन 1880 में बिना डिग्री हासिल किए ही वापस आ गए. दरअसल, बहुमुखी प्रतिभा के धनी रबीन्द्रनाथ का बचपन से ही कला के प्रति रुझान था और कविताएं और कहानियां लिखना उन्हें बेहद पसंद था. हालांकि उनके पिता देबेंद्रनाथ ठाकुर यही चाहते थे कि उनका बेटा पढ़-लिखकर वकील बने, लेकिन रबीन्द्रनाथ का मन कला और साहित्य को कब का समर्पित हो चुका था. आख़िरकार पिता को बेटे की ज़िद के आगे झुकना ही पड़ा और उन्होंने रबीन्द्रनाथ पर घर-परिवार की ज़िम्मेदारियां डाल दीं. 1883 में मृणालिनी देवी से उनका विवाह हुआ.

गौरतलब है कि रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने बहुत कम उम्र में लिखना शुरू कर दिया था. उन्होंने पहली कविता आठ साल की उम्र में लिखी थी और 1877 में महज़ सोलह साल की उम्र में उनकी लघुकथा प्रकाशित हुई थी. उनकी शुरुआती रचनाओं में बनफूल और कवि काहिनी उल्लेखनीय हैं. किड़ओ कोमल, प्रभात संगीत, छबि ओ गान, मानसी में उनकी काव्य शैली का विकास सा़फ़ झलकता है. इसी तरह सोनार तरी नामक काव्य संग्रह में विश्व जीवन की आनंद चेतना का पहला स्वर फूटता है, जो चित्रा में बुलंदी तक पहुंचता है. उसी वक़्त नैवेद्य काव्य संग्रह में भक्ति के प्रति उनकी व्याकुलता नज़र आती है, जो बाद में गीतांजलि में और भी तीव्र हो उठती है. ब्रिटिश सरकार ने 1913 में उन्हें नाइटहुड की उपाधि से सम्मानित किया था, लेकिन जलियांवाला बाग़ के नरसंहार से मर्माहत होकर उन्होंने यह उपाधि वापस कर दी. 1916 में उनका काव्य संग्रह श्लाका प्रकाशित हुआ. इसके बाद पलातक, पूरबी, प्रवाहिनी, शिशु भोलानाथ, महुआ, वनवाणी, परिशेष, पुनश्च, वीथिका, पत्रपुट, आरोग्य, शेषलेखा आदि काव्य संग्रह प्रकाशित हुए और ख़ूब सराहे भी गए. रबीन्द्रनाथ ठाकुर पारंपरिक बंधनों से मुक्त होकर सृजन करने में विश्वास करते थे. उन्होंने पद्य की तरह गद्य की रचना भी बचपन से ही शुरू कर दी थी. उनके निबंध उनके शिल्प कार्य केबेहतरीन उदाहरण हैं. इनमें विचारों की गंभीरता के साथ भाषा शैली भी उत्कृष्ट है. उनका श्रेष्ठ गद्य ग्रंथ जीवनस्मृति है, जिसमें जीवन के अनेक चित्र अंकित हैं. उन्होंने 1888 में आधुनिक बांग्ला साहित्य में छोटी कहानी का सृजन करके एक नई विधा की शुरुआत की, जिसे बाद में कई साहित्यकारों ने अपनाया.

1884 में उनका पहला उपन्यास करुणा प्रकाशित हुआ. उनके प्रसिद्ध उपन्यासों में चोखेर बाली, नौका डूबी, गोरा, घरे-बाइरे आदि उल्लेखनीय हैं. नाटक के क्षेत्र में भी उन्होंने बेहतरीन काम किया. बाल्मीकि प्रतिभा और मायेर खेला उनके शुरुआती गीतिनाट्य हैं. राजा ओ रानी, विसर्जन और चित्रांगदा में उनकी उत्कृष्ट नाट्य प्रतिभा के दर्शन होते हैं. उनका सांकेतिक नाटक रक्तकरबी उनकी श्रेष्ठ कृतियों में से एक है. काव्य, स्वर, नाट्य और नृत्य से सजा उनका नाटक नटीर पूजा, श्यामा आदि भी उनकी बहुमुखी प्रतिभा के उत्कृष्ट उदाहरण हैं. शारदोत्सव, राजा, अचलायतन और फाल्गुनी भी उनके प्रसिद्ध नाटकों में शामिल हैं. उन्होंने तक़रीबन 2230 गीतों की भी रचना की, जो रबीन्द्र संगीत के नाम से जाने जाते हैं. हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ठुमरी शैली से प्रभावित उनके ये गीत ज़िंदगी के विभिन्न रंगों को अपने में समेटे हुए हैं.

रबीन्द्रनाथ ठाकुर सियालदह और शजादपुर स्थित अपनी पैतृक संपत्ति की देखभाल के लिए 1891 में पूर्वी बंगाल (बांग्लादेश) आ गए और तक़रीबन दस साल तक यहीं रहे. उन्होंने यहां के जनमानस के सुख-दुख को बेहद क़रीब से देखा और अपनी रचनाओं में उसका मार्मिक वर्णन भी किया, जिसे उनकी कहनानियों दीन-हीनों और छोटे-मोटे दुख में महसूस किया जा सकता है. वे प्रकृति प्रेमी थे, इसलिए वे चाहते थे कि विद्यार्थी प्रकृति के बीच रहकर अध्ययन करें. इसी मक़सद से 1901 में उन्होंने सियालदह छोड़ दिया और उसी साल शांति निकेतन नामक एक विद्यालय की स्थापना की, जो 1921 में विश्व भारतीय विश्वविद्यालय बन गया. उनकी रचनाओं में आसमान, सूरज, चांद, सितारे, बरसात, बलखाती नदियां, पेड़ और लहलहाते खेतों का मनोहारी चित्रण मिलता है. उनकी रचनाओं का अंग्रेजी में अनुवाद भी हुआ और वे देश-विदेश में मशहूर हो गए. रबीन्द्रनाथ के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए. 1902 और 1907 के बीच उनकी पत्नी और उनके दो बच्चों की मौत हो गई. इस दुख से उबरने के लिए उन्होंने अपना सारा वक़्त काम में लगा दिया. एक वक़्त ऐसा भी आया, जब शांति निकेतन की आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब हो गई. धन संग्रह के लिए गुरुदेव ने नाटकों का मंचन शुरू कर दिया. उस वक़्त महात्मा गांधी ने उन्हें साठ हज़ार रुपये का चेक दिया था. कहा जाता है कि रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने ही गांधी जी को महात्मा का विशेषण दिया था. ज़िंदगी के आख़िरी वक़्त में उन्होंने चित्र बनाना शुरू किया. यहां भी उन्होंने ज़िंदगी के तमाम रंगों को कैनवास पर उकेरा. उनके चित्र भी उनकी अन्य कृतियों की तरह दुनिया भर में सराहे गए. हालांकि उन्होंने चित्रकला की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी, बावजूद इसके उन्होंने ब्रुश, रूई और अपनी उंगलियों को रंग में डुबोकर कैनवास पर मन के भावों को उकेर दिया.

रबीन्द्रनाथ ठाकुर की मौत 7 अगस्त, 1941 को कलकत्ता में हुई. भले ही आज यह महान कलाकार हमारे बीच नहीं है, लेकिन अपनी महान रचनाओं के कारण वे हमेशा याद किए जाते रहेंगे. वे कहा करते थे, विश्वास वह पक्षी है, जो प्रभात के पूर्व अंधकार में ही प्रकाश का अनुभव करता है और गाने लगता है. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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वो डूबने नहीं देगा


दूर-दूर तक सिर्फ़ पानी ही पानी था... लड़की पानी में उतर गई... हालांकि उसे तैरना नहीं आता था... वो जानती थी कि वो डूबेगी नहीं... उसका महबूब उसे डूबने नहीं देगा... वो उसका हाथ थाम लेगा... उसके महबूब को पानी से गहरा लगाव था... वो स्कूबा डाइविंग के लिए फ़िलीपींस तक चला जाता था...

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मई


मई... रोमन देवता मरकरी की मां 'मइया' के नाम पर मई महीने का नाम रखा गया... मई का तात्पर्य 'बड़े-बुज़ुर्ग रईस' हैं... मई नाम की उत्पत्ति लैटिन के मेजोरेस से भी मानी जाती है...

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