महबूब और चाँद


लोग न जाने क्यों चांद में महबूब का अक्स तलाशते हैं. हक़ीक़त में महबूब का अक्स दहकते सूरज में अया होता है, जो पूरे वजूद को फ़ना कर डालता है. इश्क़ में फ़ना होना ही तो इश्क़ की इंतेहा है.
फ़िरदौस ख़ान
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महबूब से वाबस्ता हर चीज़ें


महबूब से वाबस्ता हर चीज़ अज़ीज़ हुआ करती है. फिर वो ज़मीन क्यूं न अज़ीज़ हो, जिस ज़मीन पर महबूब के क़दम रखे गए हों. जिसकी फ़िज़ाओं में उसकी सांसों की महक शामिल हो. जहां की हवायें उसके जिस्म को छूकर गुज़री हों. फिर क्यूं न उस ज़मीन का हर ज़र्रा क़ाबिले-एहतराम हो.
फ़िरदौस ख़ान
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दो रिश्ते


दुनिया में दो रिश्ते ऐसे हैं, जिनमें ख़ुद को क़ुर्बान कर देने में ही ख़ुशी मिला करती है. पहला मां का रिश्ता. मां अपनी औलाद के लिए हर दर्द ख़ुशी-ख़ुशी सह जाती है. दूसरा रिश्ता इश्क़ का है. इंसान अपने महबूब के लिए ख़ुद को फ़ना कर देता है. ख़ुद को मिटा देने में ही उसे सुकून मिलता है. 
फ़िरदौस ख़ान
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चमेली के फूल



मेरे महबूब ! 
चमेली के सफ़ेद फूलों से आंगन महक रहा है. रोज़ रात में चमेली के फूल खिलते हैं और अपनी ख़ुशबू से रूह तक को महका देते हैं. अल सुबह हम चमेली के फूल अपने दामन में इकट्ठे करते हैं और सोचते हैं कि काश ! तुम पास होते, तो ये फूल तुम्हारे क़दमों में चढ़ा देते. ये फूल हमारी अक़ीदत के फूल हैं, जिन्हें हम आपके क़दमों में बिखेर देना चाहते हैं.
फ़िरदौस
 
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सिक्कों की दुनिया की सैर


फ़िरदौस ख़ान
जबसे मुद्रा का विकास हुआ है, तभी से यह हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग रही है. इसके बिना जीवन की कल्पना तक संभव नहीं है. हाल में राजकमल प्रकाशन की एक किताब भारतीय सिक्कों का इतिहास प़ढने का मौक़ा मिला. कुछ वक़्त पहले जब चवन्नी का चलन बंद हुआ था, तबसे ही भारतीय मुद्रा के बारे में जानने की जिज्ञासा थी. लेखक गुणाकर मुले ने इस किताब के लिए काफ़ी शोध किया है. इस किताब को कई अध्यायों में बांटा गया है, जैसे सिक्कों की शुरुआत, भारत के सबसे पुराने पंचमार्क सिक्के, मौर्यकाल के पंचमार्क सिक्के, हिन्द-यवन शासकों के सिक्के, शक पह्लव शासकों के सिक्के, कुषाणों के सिक्के, पश्चिमी क्षत्रपों के सिक्के, गणराज्यों और जनपदों के सिक्के, भारत में रोमन सिक्के, सात वाहनों के सिक्के, गुप्त सम्राटों के सिक्के, हेफतालों के सिक्के, मध्यकालीन उत्तर भारतीय मुद्राएं, दक्षिण भारत के सिक्के, पांड्य, चोल और चेर शासकों के सिक्के, इस्लामी शासकों के सिक्के, दिल्ली सल्तनत के सिक्के, सल्तनत कालीन प्रांतीय राज्यों के सिक्के, मुग़ल शासकों के सिक्के, मुग़ल कालीन प्रादेशिक राज्यों के सिक्के, यूरोप की व्यापारी कंपनियों के सिक्के, भारत में अंग्रेजी राज के सिक्के, सिक्कों की लिपियां और भाषा आदि.

इस किताब में सिक्कों के बारे में बेहद रोचक और ज्ञानवर्द्धक जानकारी मिलती है. इस्लाम में सिक्कों पर प्रतिमांकन कराने की प्रथा नहीं थी, इसलिए कुछ अपवादों को छोड़कर भारत के इस्लामी शासकों के सिक्कों के दोनों तरफ़ केवल मुद्रालेख ही देखने को मिलते हैं. प्राचीन भारत के शासकों की ही तरह इस्लामी शासकों में भी सिंहासन संभालते ही नये सिक्के जारी करने की प्रथा रही है. प्राचीन भारत के सिक्कों को देखकर यह नहीं बताया जा सकता कि वे किस टकसाल में तैयार किए गए थे, लेकिन इस्लामी शासकों ने सिक्कों पर टकसाल की जगह का नाम अंकित कराने की प्रथा शुरू की. इतना ही नहीं, इन टकसालों को कुछ विशिष्ट नाम भी दिए गए, जैसे दिल्ली को देहली हज़रत, दारुल ख़िलाफ़त, दारुल मुल्क, दारुल इस्लाम. दिल्ली के सुल्तानों ने दौलताबाद में भी टकसाल स्थापित की थी. शेरशाह के वक़्त (1540-1545) में टकसालों की तादाद 23 तक पहुंच गई थी. अकबर के शासनकाल (1556-1605) में देश में 76 टकसालें थीं. सिक्कों पर टकसालों के उल्लेख से उन स्थानों के शासकीय महत्व और राज्य की सीमाओं के बारे में जानकारी मिलती है. ज़्यादातर मुस्लिम शासकों के सिक्के शुद्ध धातु और प्रामाणिक तौल के हैं. अकबर के शासनकाल में कोई भी व्यक्ति अपना सोना या अपनी चांदी टकसाल में ले जाकर उसके सिक्के तैयार करा सकता था. चांदी के रुपये बनवाने के लिए उसे कुल मुद्रांकित धातु का क़रीब 5.6 फ़ीसदी मुद्रा निर्माण के लिए देनी होती थी. मुग़ल बादशाहों में जहांगीर (1605-1627) के सिक्के सबसे सुंदर हैं. उसे नये-नये सिक्के बनवाने का शौक़ था. बाबर और हुमायूं के चांदी के दिरहम मध्य एशियाई शैली के हैं और तैमूरी वंश के शासक शाहरुख़ के नाम पर शाहरुख़ीकहलाते हैं. क़रीब 72 ग्रेन के इन सिक्कों के पुरोभाग पर कलमा और ख़लीफ़ाओं के नाम तथा पृष्ठभाग पर बादशाह का नाम है. शेरशाह सूरी ने अपने चंद सालों के शासन के दौरान भारतीय मुद्रा प्रणाली को एक नई दिशा दी थी. उसने मिश्र धातु का इस्तेमाल बंद करवा दिया और शुद्ध चांदी के मानक रुपये को चलाया. अकबर ने सोना, चांदी और तांबे के अपने सिक्कों के लिए सूरी शैली, तौल और बनावट को अपनाया. बुनियादी सिक्का चांदी का रुपया था, जिसका तौल 11.5 माशा या 178 ग्रेन के बराबर था. अकबर के पूरे राज्य में एक ही तौल के रुपये का प्रचलन था और उसकी चांदी की मुद्राओं में चार फ़ीसद से ज़्यादा मिलावट कभी नहीं रही. टीपू सुल्तान ने अपने 17 सालों (1782-1799) के शासनकाल में तरह-तरह के की मुद्राएं जारी कीं. टीपू सुल्तान ने न केवल सोने के पगोद, पणम, चांदी के रुपये और दोहरे रुपये आदि जारी किए, बल्कि तांबे के भी विविध तौल के सिक्के जारी किए. इन सिक्कों को नाम दिए गए. चौथाई मुहर को फ़ारुख़ी, एक रुपये को अहमदी, दोहरे रुपये को हैदरी आदि. ये सब इस्लाम से संबंधित नाम हैं. कुछ सिक्कों के नाम ग्रहों और नक्षत्रों के नाम पर भी रखे गए. 

देश के आज़ाद होने के बाद जो सिक्के ढाले गए, वे 1947 से 1950 के दौर के थे. एक अप्रैल, 1957 को भारतीय मुद्रा अधिनियम लागू हुआ तो सिक्कों में बदलाव आया. इससे पहले आना प्रणाली के सिक्कों का चलन था. इसमें एक रुपया 16 आने के बराबर था. भारतीय मुद्रा अधिनियम के बाद दशमलव प्रणाली आई. रुपये का चलन वैसा ही था, लेकिन आना के बजाय उसकी क़ीमत 100 पैसे के बराबर हो गई. जनता में रुपया नया पैसा के नाम से प्रचलित हुआ. 60 के दशक में तांबे एवं निकल के सिक्के बने. इनमें षटकोण वाले 3 पैसे का सिक्का, लहरियेदार किनारे वाला 20 पैसे का सिक्का प्रचलित था. 70 के दशक में एक, दो एवं तीन पैसे का चलन लगभग ख़त्म होने लगा और उस वक़्त स्टील के 10, 25 और 50 पैसे को शामिल किया गया. बाद में विभिन्न विशेष अवसरों पर सिक्कों का प्रचलन शुरू हुआ, जिन पर नहर, हल जोतने और फ़सल काटते किसान आदि अंकित होते थे. कई सिक्कों पर एक तरफ़ भारत गणराज्य का राज्य चिन्ह एवं सत्यमेव जयते और दूसरी तरफ़ महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी आदि की तस्वीरें या राष्ट्रीय इमारतें अंकित थीं. साल 1972 में 50 पैसे और 10 रुपये के सिक्कों पर सर्वप्रथम संसद भवन का अंकन हुआ था. भारत में चार सरकारी टकसालें हैं. ये महाराष्ट्र में मुंबई, पश्चिम बंगाल में कोलकाता, आंध्रप्रदेश में हैदराबाद और उत्तर प्रदेश के नोएडा शहर में हैं. भारतीय सरकार पर पर सिक्कों को बनाने की ज़िम्मेदारी है और ये सभी भारतीय टकसालों से भारतीय रिज़र्व बैंक पहुंचते हैं. बहरहाल, इतिहास और पुरातत्व में दिलचस्पी रखने वालों के लिए यह किताब बेहद उपयोगी है. 

समीक्ष्य कृति : भारतीय सिक्कों का इतिहास 
लेखक : गुणाकर मुले 
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, दिल्ली 
मूल्य : 350 रुपये    
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टपकती छतें...


बारिश में टपकती छतें 
भिगो देती हैं 
घर का हर छोटा-बड़ा सामान 
न कोई कपड़ा सूखा रहता है 
और न ही चूल्हा-चौका 
ऐसे में
घर के सामान को बचाने की जद्दोजहद में
इंसान ख़ुद भी भीग जाता है 
सबसे ज़्यादा मुश्किल होता है 
बच्चों को भीगने से बचाना 
भूखे बच्चों को खाना पकाकर खिलाना 
वाक़ई बहुत दुश्वार होता है 
कमरे में बरसती बारिश से ख़ुद को बचाना
बेशक बारिश रहमत है
लेकिन
ग़ुरबत के मारे ग़रीबों के लिए
बारिशें किसी आफ़त कहां कम हैं...
-फ़िरदौस ख़ान
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एक दुआ, उनके लिए...


मेरे मौला !
अपने महबूब हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सदक़े में मेरे महबूब को सलामत रखना, आमीन 🌹
-फ़िरदौस ख़ान
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सालगिरह का दुआओं से लबरेज़ तोहफ़ा...



साल 2012 की एक जून को हमारी सालगिरह थी...उस रोज़ हम अपने घर में थे...अपनी अम्मी, भाइयों, भाभी, बहन और दीगर रिश्तेदारों के साथ...जब हम घर होते हैं, तब इंटरनेट से दूर ही रहना पसंद करते हैं...आख़िर कुछ वक़्त घरवालों के लिए भी तो होना ही चाहिए न...

आपकी सबकी तरफ़ से हमें सालगिरह की शुभकामनाएं मिलीं...हमारे फ़ेसबुक की वाल, मैसेज बॉक्स आप सबकी दुआओं से भरा हुआ है... इसी तरह हमारे मेल के इनबॉक्स भी दुआओं से लबरेज़ हैं... सच कितना अपनापन है यहां भी...कौन क़ुर्बान न हो जाए इस ख़ुलूस और मुहब्बत पर...यही तो सरमाया हुआ करता है उम्रभर का ...जिसे हम हमेशा संभाल कर रख लेना चाहते हैं अपनी ज़िन्दगी की किताब में...

हर साल हमें सालगिरह के तोहफ़े में कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर मिलता है, जो हमारी उम्र का सरमाया बन जाता है...इस बार भी ऐसा एक तोहफ़ा मिला, जो आज से पहले शायद ही किसी भाई ने अपनी बहन को दिया हो... यह अल्लाह का हम पर बहुत बड़ा करम रहा है कि हमें भाई बहुत अच्छे मिले...वो सगे भाई हों या फिर मुंहबोले भाई... हम जिस तोहफ़े का ज़िक्र कर रहे हैं, वो हमें दिया है हमारे मुंहबोले भाई मन्नान रज़ा रिज़वी ने...मन्नान हमें बहुत अज़ीज़ हैं...यह तोहफ़ा दुआओं से लबरेज़ एक नज़्म की सूरत में है...जिसे पढ़कर अहसास हुआ कि किस तरह मुहब्बत ज़र्रे को भी आफ़ताब बना देती है...हमारे भाई मन्नान ने भी तो यही सब किया है...हमें अर्श से उठाकर आसमां की बुलंदियों पर पहुंचा दिया है...

मन्नान से क्या कहें...? हमारे जज़्बात के आगे अल्फ़ाज़ भी कम पड़ गए हैं... एक दुआ है कि अल्लाह हमारे भाई को हमेशा सलामत और ख़ुश रखे...और ऐसा भाई दुनिया की हर बहन को मिले...आमीन...       
हम अपने भाई का ख़त और नज़्म पोस्ट कर रहे हैं...

ख़त
अस्सलामु अलैकुम व  रहमतुल्लाही व बरकतुह
उम्मीद है मिज़ाज अक़द्दस बख़ैर होंगे... आपकी ख़ैरियत ख़ुदावंद करीम से नेक मतलूब है...
प्यारी बाजी... आपके योम-ए-पैदाइश के मौक़े पर हम क़लब की इन्तहाई गहराइयों से आपको मुबारकबाद पेश करते हैं...हमारी दुआ है कि  ये दिन आपकी ज़िन्दगी में हर बार नई ख़ुशियों के साथ आए...
ख़ुदा आपके तमाम मक़ासिद हक़ा में कामयाबी अता करते हुए आपकी मसरूफ़ियत में कमी और मक़बूलियत में इज़ाफ़ा फ़रमाये... और हमेशा नज़र-ए-बद से महफ़ूज़ रखे...आमीन...
फ़क़्त ख़ैर अंदेश
मन्नान रज़ा रिज़वी 

नज़्म
बयां हो अज़म आख़िर किस तरह से आपका फ़िरदौस
क़लम की जान हैं, फ़ख्र-ए-सहाफ़त साहिबा फ़िरदौस
शुक्रिया फ़िरदौस बेहद शुक्रिया फ़िरदौस...

सहाफ़त के जज़ीरे से ये वो शहज़ादी आई है
मिली हर लफ़्ज़ को जिसके मुहब्बत की गवाही है
हर एक तहरीर पे जिनकी फ़साहत नाज़ करती है
सहाफ़त पर वो और उन पर सहाफ़त नाज़ करती है
वो हैं शहज़ादी-ए-अल्फ़ाज़ यानी साहिबा फ़िरदौस
शुक्रिया फ़िरदौस बेहद शुक्रिया फ़िरदौस...

क़लम जब भी उठा हक़ व सदाक़त की ज़बां बनकर
बयान फिर राज़ दुनिया के किए राज़दां बनकर
मियान-ए-हक़ व बातिल फ़र्क़ यूं वाज़ा किया तुमने
तकल्लुफ़ बर तरफ़ क़ातिल को है क़ातिल लिखा तुमने
तेरा हर लफ़्ज़ बातिल के लिए है आईना फ़िरदौस
शुक्रिया फ़िरदौस बेहद शुक्रिया फ़िरदौस...

कभी मज़मून में पिन्हा किया है दर्दे-मिल्लत को
कभी अल्फ़ाज़ का जामा दिया अंदाज़-ए-उल्फ़त को
यक़ीं महकम, अमल पैहम, मुहब्बत फ़ातहा आलम
सफ़र इस सिम्त में जारी रहा है आपका हर दम
अदा हक़ सहाफ़त आपने यूं है किया फ़िरदौस
शुक्रिया फ़िरदौस बेहद शुक्रिया फ़िरदौस...

हर इक लब रहे जारी कुछ ऐसा साज़ बन जाए
ख़िलाफ़-ए-ज़ुल्म तुम मज़लूम की आवाज़ बन जाओ
हों चर्चे हर ज़बां पर आम इक दिन तेरी शौहरत के
हर  इक तहरीर मरहम सी लगे ज़ख्मों पे मिल्लत के
तुम्हारे हक़ में करते हैं अनस ये ही दुआ फ़िरदौस
शुक्रिया फ़िरदौस बेहद शुक्रिया फ़िरदौस...
-मन्नान रज़ा रिज़वी


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ईश प्रीत की छलकन है यह पुस्तक


सूफ़ी-संतों पर आधारित पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ फ़िरदौस ख़ान की ईश प्रीत की छलकन है. ऋषि सत्ताओं की विस्मृत वाणी को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ को कैसे संत व फ़क़ीर जीते हैं, उसी को पुनः स्मृति में लाने का प्रयास है यह पुस्तक.

जैसे श्रीमद्भगवद्गीता पुनः अर्जुन के बहाने संसार को मिल रहा है, जबकि योगेश्वर कहते हैं कि सबसे पहले यह ज्ञान सूर्य को दिया था, जो काल के खेल में विलुप्त हो गया था.
ऋषि सत्ताओं ने धर्म की जगह विशेष के समूह को जीवन जीने का तरीक़ा दिया और ऋषियों, सूफ़ी, संतों व फ़क़ीरों ने उस जीवन जीने के तरीक़ों के उद्देश्य को जिया अर्थात आध्यात्मिक जीवन को प्राप्त होना, अर्थात उस प्रकाश को पाना है जिससे यह कायनात है. अखिल ब्रह्मांड है, भीड़ और समूह सीढ़ियां छोड़ नहीं पाती हैं, जिससे भेद बना रहता है, बसा रहता है. मंज़िल पानी थी, न कि सिर पर सीढ़ियां लादे घूमना था. फ़क़ीरों-संतों का जीवन चीख़-चीख़ कर घोषणा करता है- ढाई आखर प्रेम का, पढ़या सो पंडित होय.
पहुंचना प्रीत सागर में है. सारी की सारी नदियों का गंतब्य क्या है, समुद्र.

गंगा-जमुनी मेल क्या है, संस्कृति क्या है, चलें सागर की ओर, मिलकर. संगम पाकर और विशाल-विस्तृत होकर. विराट मिलन के पूर्व का मिलन उस महामिलन की मौज की मस्ती के स्वाद का पता दे देता है. इसका बड़ा अच्छा उदाहरण लेखिका व आलिमा फ़िरदौस ख़ान ने प्रस्तुत किया है. सूफ़ी हज़रत इब्राहिम बिन अदहम के जीवन से-
-कौन ?
- तेरा परिचित.
-क्या खोज रहे हो?
- ऊंट.
बकवास... इतने ऊपर हमारे महल में ऊंट कैसे आ सकता है? परिचित बोलते हैं कि जब तू राजमहल में मालिक को ढूंढ सकता है, तो यहां हमारा ऊंट क्यों नहीं आ सकता है?
अर्थात राजस में रहकर सात्विक से भी (त्रिगुण मयी माया) पार की ख़बर का नाटक करना ही है. आज के दौर में कितना प्रासंगिक है. राजस जीवन जीकर धर्म की व्याख्या करना, पतन की पराकाष्ठा ही है.
वहीं जब महल को पुनः सराय कहता है परिचित, तब बादशाह की आंख पूरी खुल जाती है. राजस आने जाने वाली फ़ानी बादशाहत छोड़कर फ़क़ीरी जीवन जीने लगते हैं.

और सूफ़ी, संत, फ़क़ीर ही असली बादशाह हैं. मालिक की गोद में बैठकर असली मौज लेते रामकृष्ण परमहंस भी दिखते हैं और माँ के आशीष से सिंचित कर्मयोगी शहनाई वादक बिस्मिल्लाह ख़ान साहेब भी क्या हज़रत इब्राहिम बिन अदहम की तरह फ़क़ीरी में बादशाह नहीं हैं.
चाहे कबीर हों, रसखान हों, दादू हों सभी उस नूर, उस रौशनी की चर्चा अपनी सधुक्कड़ी भाषा में कर रहे हैं. 
लेखिका फ़िरदौस ख़ान उस ईश्वरीय नूर को जी रही हैं और इस तरह ईश प्रीत की उस छलकन की पहली श्रृंखला है यह पुस्तक, जिसे ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह) ने प्रकाशित किया है.

शुभकामनाएं अपार!
नन्दलाल सिंह

लेखक का परिचय 
नन्दलाल सिंह लेखक एवं अनिभेता हैं. वह रंगमंच, हिन्दी फ़ीचर फ़िल्मों के लिए लेखन करते हैं. उनकी कहानियां, लेख, उपन्यास एवं गांधी दर्शन पर अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. वह महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, बनारस में भी नाट्य विभाग में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रहे हैं. वह महात्मा गांधी के विचार एवं दर्शन पर कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देते हैं. 
संपर्क : गोरेगांव (पश्चिम), मुम्बई- 400104 (महाराष्ट्र)
ईमेल : sundharanandlal@gmail.com
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एक मुबारक तारीख़


एक मुबारक तारीख़... एक रूहानी तारीख़, जिसे हम कभी नहीं भूल सकते... तआरुफ़ 
4 अप्रैल 2022 हिजरी 2 रमज़ान 1443

कितनी प्यारी दुआ है 

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم 
 إلهي كفى بي عِزًّا أن أكون لك عَبدًا، وكفى بي فخرًا أن تكون لي رَبًّا، أنت كما أُحب فاجعلني كما تُحب. 
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
इलाही कफ़ा बी इज़्ज़न, अन अकुना लका अबदन
वा कफ़ा बी फ़ख़रन, अन तकुना लि रब्बन 
अंता कमा उहिब्ब, फ़जअलनी कमा तोहिब
आमीन या रब्बुल आलेमीन 
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है.
ऐ मेरे रब ! मेरी इज़्ज़त के लिए यही काफ़ी है कि मैं तेरा बन्दा हूं. और मेरे फ़ख़्र करने के लिए ये काफ़ी है कि तू मेरा परवरदिगार है. तू वैसा ही है, जैसा मैं चाहता हूं. बस तू मुझे ऐसा बना दे, जैसा तू चाहता है.
आमीन या रब्बुल आलेमीन
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