दहकते लम्हों का मौसम...


मेरे महबूब !
ये दहकते लम्हों का मौसम है...
जिसकी सुबह
दहकती हैं
दहकते पलाश के
सुर्ख़ फूलों की तरह...
जिसकी दोपहरें
दहकती हैं
तपते सहरा की
गरम रेत की तरह...
जिसकी फ़िज़ाओं में
आंधियां चलती हैं
और
हर सिम्त
धूल के ग़ुबार उड़ते हैं
वीरान सड़कों पर
ख़ामोशी-सी बिछ जाती है...
मेरे महबूब
ये दहकते लम्हों का मौसम है...
जिसकी शामें
सुलगती हैं
चंदन की अगरबत्तियों की तरह
और
फ़िज़ा में भीनी महक छोड़ जाती हैं...
जिसकी रातें
पिघलती हैं
फ़ानूस में लगी
सफ़ेद मोमबत्तियों की तरह
और
इसी तरह
दहकते, सुलगते
उम्र का एक और दिन
ग़र्क़ हो जाता है
वक़्त के अलाव में...
सच
ये दहकते लम्हों का मौसम है...
-फ़िरदौस ख़ान

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ज़ाफ़रान के फूल…


फ़िरदौस ख़ान
जब भी घर का ज़िक्र आता है तो आंखों के सामने क्यारियों में खिले ज़ाफ़रान के फूल महकने लगते हैं. बरसों पहले अब्बू ज़ाफ़रान के पौधे लाए थे. अब अब्बू इस दुनिया में नहीं हैं, बस उनकी यादगार के तौर पर ज़ाफ़रान के पौधे हैं, उनके फूल हैं, और अब्बू की नसीहतों से महकती उनकी यादें हैं. हमारे यहां बरसों से ग़ुलाम मुहम्मद रहे हैं. हर साल सर्दियों में हम उन्हीं से गर्म कपड़े और शालें ख़रीदते हैं. उन्हें भी ज़ाफ़रान के पौधे बहुत अज़ीज़ हैं, कहते हैं कि इन्हें देखकर अपने वतन की याद जाती है. 

ज़मीं की जन्नत माने जाने वाले कश्मीर की ख़ूबसूरत वादियों में महकते ज़ाफ़रान के फूल फ़ारसी से इस शेअर की याद दिला देते हैं-   
गर फ़िरदौस बररू-- ज़मीं अस्त हमीं अस्तो हमीं अस्तो हमीं अस्त
यानी अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है यहीं है यहीं है...

सदियों से कश्मीर में ज़ाफ़रान की खेती हो रही है. कहा जाता है कि क़रीब आठ सौ साल पहले ख्वाजा मसूद और हज़रत शे़ख शरी़फ़ुद्दीन मध्य-पूर्वी एशिया से ज़ाफ़रान का पौधा अपने साथ लाए थे. यहां आकर वे बीमार हो गए और तब एक हकीम ने उनका इलाज किया. इस पर ख़ुश होकर उन्होंने ज़ाफ़रान का पौधा हकीम को दे दिया. इसलिए ज़ाफ़रान की पैदावार के वक़्त पंपोर की इन सूफ़ियों के मक़बरे वाली मस्जिद में नमाज़ भी अदा की जाती है. हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि यहां ज़ाफ़रान की खेती का सिलसिला दो हज़ार साल से भी ज़्यादा पुराना है.  

ज़ाफ़रान को केसर भी कहा जाता है. इसका मूल स्थान दक्षिण यूरोप है. हालांकि दुनिया के कई देशों में इसकी खेती होती है. इनमें भारत, चीन, तुर्किस्तान, ईरान, ग्रीस, स्पेन, इटली फ्रांस, जर्मनी, जापान, रूस, आस्ट्रिया और  स्विटज़रलैंड शामिल हैं. स्पेन दुनिया का सबसे बड़ा ज़ाफ़रान उत्पादक देश है, जबकि  ईरान दूसरे दर्जे पर है. इन दोनों देशों में सालाना क़रीब तीन सौ टन ज़ाफ़रान का उपादान होता है, जो  कुल उत्पादन का 80 फ़ीसदी है. भारत में इसकी खेती जम्मू-कश्मीर में होती है. जम्मू कश्मीर के कृषि मंत्री ग़ुलाम हसन के मुताबिक़ 2009-2010 के दौरान प्रदेश में 83 क्विंटल ज़ाफ़रान का उत्पादन हुआ. इसमें से 80 क्विंटल का उत्पादन जम्मू डिवीजन के पम्पोर में और 3.60 क्विंटल का उत्पादन कश्मीर के किस्तवार ज़िले में हुआ. ज़ाफ़रान की खेती का रक़बा भी साल 2000 के 2931 हेक्टेर के मुक़ाबले 2010-11 में ब़ढकर 3785 हो गया है. 

साल के अगस्त-सितंबर माह में इसके कंद रोपे जाते हैं. अक्टूबर-दिसंबर तक इसमें पत्तियां जाती हैं और फूल खिलने लगते हैं, जो अपनी भीनी-भीनी महक से माहौल को ख़ुशनुमा बना देते हैं. ज़ाफ़रान की खेती के लिए समुद्रतल से क़रीब  दो हज़ार मीटर ऊंचे पहाड़ी इलाक़े और शीतोष्ण सूखी जलवायु की ज़रूरत होती है. पौधे के लिए दोमट मिट्टी अच्छी रहती है. ज़ाफ़रान का पौधा बहुवर्षीय होता है और यह 15 से 25 सेमी ऊंचा होता है. पत्तियां घास तरह लंबी, पतली और नोकदार होती हैं. इसमें बैगनी रंग की फूल खिलते हैं. फूल में ज़ाफ़रान के तंतु होते हैं. इसके बीज आयताकार, तीन कोणों वाले होते हैं. ज़ाफ़रान के फूलों को चुनकर छायादार जगह पर बिछा दिया जाता हैसूख जाने पर फूलों से ज़ाफ़रान को अलग कर लिया जाता है. ज़ाफ़रान के रंग और आकार के हिसाब से उन्हें मागरा, लच्छी, गुच्छी आदि हिस्सों में बांट दिया जाता है. क़रीब डेढ़ लाख फूलों से एक किलो ज़ाफ़रान मिलता है, जिसकी क़ीमत डेढ़ लाख रुपये से ज़्यादा है.

ग़ुलाम मुहम्मद बताते हैं कि ज़ाफ़रान के पौधे का हर हिस्सा इस्तेमाल में लाया जाता है. ज़ाफ़रान की पंखड़ियों की सब्ज़ी बनाई जाती है. इसके डंठल जानवरों को खाने के लिए दे दिए जाते हैं. वह कहते हैं कि ज़ाफ़रान के फूल खिलने के दौरान यहां के बाशिंदों की ज़िन्दगी में काफी बदलाव जाता है. फ़िज़ां में बिखरी ज़ाफ़रान की ख़ुशबू, और हर जगह ज़ाफ़रान की ही बातें. इस दौरान तो भिखारी भी ज़ाफ़रान के फूलों का ही सवाल करते हैं. बाग़बां भी ज़ायक़ेदर फलों के बदले ज़ाफ़रान के महकते फूल ही लेना पसंद करते हैं.

ज़ाफ़रान एक औषधीय पौधा है और दवाओं में इसका इस्तेमाल होता है. वैज्ञानिकों के मुताबिक़ ज़ाफ़रान में तेल 1.37 फ़ीसदी आर्द्रता 12 फ़ीसदी, पिक्रोसीन नामक तिक्त द्रव्य, शर्करा, मोम, प्रोटीन, भस्म और तीन रंग द्रव्य पाएं जाते हैं. अनेक खाद्य पदार्थों ख़ासकर मिठाइयों में ज़ाफ़रान का इस्तेमाल किया जाता है.
इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ एल अकीला और ऑस्ट्रेलिया की सिडनी यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक शोध में कहा गया है कि बुढ़ापे में ज़ाफ़रान की मदद से अंधेपन को रोका जा सकता है. हर रोज़ ज़ाफ़रान खाने से बीमारियों के ख़िलाफ़ आंखों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. शोध दल के प्रमुख प्रोफेसर सिलविया बिस्ती का कहना है कि केसर में कई गुण होते हैं जो रोशनी के लिए रक्षक का काम करते हैं.

बाज़ार में नक़ली ज़ाफ़रान की भी भरमार है. इसलिए असली ज़ाफ़रान की पहचान ज़रूरी है. असली ज़ाफ़रान पानी में पूरी तरह घुल जाता है. ज़ाफ़रान को पानी में भिगोकर कपड़े पर रगड़ने से अगर ज़ाफ़रानी रंग निकले तो उसे असली ज़ाफ़रान समझना चाहिए और और पहले लाल रंग निकले और बाद में पीला पड़ जाए तो वह नक़ली ज़ाफ़रान होगा.

बहरहाल, राजधानी दिल्ली में हम ज़ाफ़रान के पौधे तलाश रहे हैं. शायद कहीं मिल जाएं...   
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ख़ुशी...


ख़ुश रहना भी एक कला है... और बच्चे इस कला में माहिर हुआ करते हैं... वे जानते हैं कि कैसे ख़ुश रहा जाता है...  कल ख़ुशी नाम की एक बच्ची ने हमसे कहा कि दीदी परसो यही सूट पहनना... हमने पूछा, परसो क्या है...? उसने कहा कि परसो मेरा बर्थ डे है... हमने कहा कि पिछले हफ़्ते ही तो तुम्हारा बर्थ डे था... कहने लगी, तो क्या हुआ... परसो भी मेरा बर्थ डे है... हमने कहा, ठीक है... लेकिन यह सूट क्यों पहनें... कहने लगी, मुझे यह कपड़े बहुत अच्छे लगते हैं... सुर्ख़ और हरे रंग का महीन काम वाला यह सूट हमारे एक रिश्तेदार कराची से लाए थे... पिछली ईद पर हमने इसे पहना था... पहली क्लास में पढ़ने वाली ख़ुशी को यह सूट बहुत पसंद है... शायद इसका चटक़ रंग और सुनहरा काम... उसे भाता है... ख़ैर, ख़ुशी की ख़ुशी के लिए कल हम यही सूट पहनकर उसके पास जाएंगे... आख़िर कल उसका बर्थ डे है... यानी वीकली बर्थ डे... :)

तस्वीर : गूगल से साभार

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पवित्र बाइबल...


गुज़श्ता दिनों हमने अपनी पढ़ी हुई अंग्रेज़ी की दस किताबों की पहली फ़ेहरिस्त लिखी थी... आज दूसरी फ़ेहरिस्त की बारी है... आज हम सिर्फ़ एक ही किताब का ज़िक्र करेंगे... वह किताब हमारे दिल के बेहद क़रीब है... और उस पाक किताब का नाम है The Bible यानी पवित्र बाइबल... यह ऐसी किताब है, जो सीधा दिल पर असर करती है... इसके लफ़्ज़ रूह की गहराई में उतर जाते हैं...
बाइबल हमें बताती है-
जब हम परमेश्वर के प्रेम को दूसरों के साथ बांटते हैं, तब हम उसके प्रति अपना प्रेम दिखाते हैं...

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गुलाब और बेला-चमेली के सफ़ेद फूलों वाली चादर...


फ़िरदौस ख़ान
छोटी-छोटी चीज़ें ज़िन्दगी में बहुत अहम हुआ करती हैं... हमें किसी चीज़ से प्यार सिर्फ़ इसलिए नहीं होता कि वह चीज़ अच्छी है, बल्कि इसलिए होता है, क्योंकि उससे हमारे जज़्बात वाबस्ता होते हैं... जैसे हमारी चादर... सुर्ख़ गुलाब और बेला-चमेली के फूलों वाली चादर... हमें ऐसी चादरें बहुत अच्छी लगती हैं, जिन पर गुलाब के फूल बने हों... जिन पर बेला-चमेली के सफ़ेद फूल बने हों... जवाज़ यह है कि उन्हें गुलाब के सुर्ख़ फूल अच्छे लगते हैं और हमें बेला-चमेली के सफ़ेद फूल पसंद हैं... हमारे पास एक चादर है, बादामी बॊर्डर वाली, जिसकी कत्थई ज़मीन पर गुलाब के फूल बने हैं... और गुलाब के फूलों के साथ ही उस पर चमेली के सफ़ेद फूल भी हैं... उसे बिछाने पर ऐसा लगता है, जैसे गुलाब और चमेली की सेज सजी हो...
ख़ास मौक़ों पर हम उसे बिछाते हैं... हमें ऐसी ही और चादरों की तलाश है, जिन पर गुलाब और बेला-चमेली के सफ़ेद फूल हों... बस, एक दिन भाभी के साथ बाज़ार जाएंगे और एक साथ कई चादरें ख़रीद लेंगे... गुलाब और बेला-चमेली के सफ़ेद फूलों वाली...
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हाथ की लकीरें...


मेरे महबूब
कितने पहर
मैं ढूंढती रही
तुम्हारे हाथ की लकीरों में
अपना वजूद...
जब कुछ समझ न पाई
तब
मुझे उदास पाकर
तुमने कहा था-
तुम मेरे हाथ की लकीरों में
हो या नहीं
मैं नहीं जानता
लेकिन
इतना ज़रूर जानता हूं
तुम मेरे दिल में रहती हो
मेरी रूह में बसती हो
तुम्हीं तो मेरी धड़कन हो
मेरी ज़िन्दगी हो
मेरी मुहब्बत हो...
और
तब से मैंने ख़ुद को
कभी नहीं ढूंढा
तुम्हारे हाथ की लकीरों में...
क्योंकि
जो रूह में बस जाते हैं
फिर उन्हें
हाथ की लकीरों में नहीं ढूंढा जाता...
-फ़िरदौस ख़ान
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ज़िन्दगी से रूबरू कराती एक किताब


फ़िरदौस ख़ान  
अभिनेता अनुपम खेर किसी परिचय के मोहताज नहीं है. उन्होंने सा़ढे चार सौ से ज़्यादा फ़िल्मों में अनेक किरदार निभाए हैं. प्रभात प्रकाशन समूह के प्रभात पेपरबैक्स द्वारा उनकी एक किताब प्रकाशित की गई है, जिसका नाम है आप ख़ुद ही बेस्ट हैं. अपने नाम के मुताबिक़ ही यह किताब इंसान का ख़ुद से बेहतर तरीक़े से परिचय कराती है. उसे बताती है कि वह दुखी क्यों है, और वह सुख को किस तरह हासिल कर सकता है. दरअसल, सुख और दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. दुख या सुख का संबंध व्यक्ति के अपने मन, अपने विचारों और अपने कार्यों से ही होता है. एक जैसे हालात में कोई व्यक्ति ख़ुद को सुखी, तो कोई ख़ुद को दुखी महसूस करता है. यह कहना ग़लत न होगा कि इच्छाएं ही दुख की असल वजह हैं. जिस व्यक्ति की जितनी ज़्यादा आकांक्षाएं होंगी, उसके दुखी होने की उतनी ही ज़्यादा संभावना रहती है. इस किताब में भी अनुपम खेर ने यही बताने की कोशिश की है. यह किताब उनकी ज़िंदगी के खट्टे-मीठे अनुभव का निचो़ड़ है.

हमारे विचारों का ताल्लुक़ हमारी ज़िंदगी से है. ये विचार ही तो हैं, जो हमारी ज़िंदगी को प्रभावित करते हैं. बक़ौल लेखक, एक अनुमान के मुताबिक़ औसतन 60 हज़ार विचार हमारे दिमाग़ से गुज़रते हैं. हम में से अधिकतर का अपने विचारों पर कोई नियंत्रण नहीं होता. विचार पारे की तरह होते हैं, जिन्हें पकड़ा नहीं जा सकता है. लेकिन हमें अपने विचारों पर कुछ नियंत्रण ज़रूर होना चाहिए, वरना हम उनके दास बन जाते हैं. विचार किस प्रकार से हमारी क़िस्मत को आकार देते हैं, इसकी सबसे तार्किक व्याख्या मैंने हिज होलीनेस 14वें दलाई दामा की पढ़ी है. वह कहते हैं-अपने विचारों पर ध्यान दें, क्योंकि वे शब्द बनते हैं. अपने शब्दों पर ध्यान दें, क्योंकि वे कार्य बन जाएंगे हैं. अपने कार्यों पर ध्यान दें, क्योंकि वे आदत बन जाएंगे. अपनी आदतों पर ध्यान दें, क्योंकि वे आपका चरित्र बनाएंगे. अपने चरित्र पर ध्यान दें, क्योंकि वह आपकी क़िस्मत बनाएगा. आपकी क़िस्मत आपका जीवन होगी.
अनुपम खेर वर्तमान में जीने में यक़ीन रखते हैं. वह लिखते हैं-दुख का एक मुख्य कारण यह है कि हम में से अधिकतर लोग अतीत या भविष्य के बारे में चिंतित रहते हैं या उसके बारे में सोचते रहते हैं. हम वर्तमान में जीते हुए उसका अधिकांश लाभ नहीं उठाना चाहते. हम ऐसी बीती घटनाओं को याद करते रहते हैं, जिन्होंने हमारे जीवन को प्रभावित किया, अधिकांश ने नकारात्मक रूप में और फिर लगातार ख़ुद से कहते रहते हैं-अगर ऐसा होता, तो कैसा होता. यदि हम अतीत को प्रेमपूर्वक याद नहीं करते, तो हम अपने साथ घटी घटनाओं के लिए दूसरों को दोषी ठहराने की कोशिश करते हैं. मुझे बहुत से ऐसे लोग मिले हैं, जो अतीत को स्वीकार नहीं कर पाए, चाहे वह टूटे संबंध में हो या गए धन के बारे में. दुर्भाग्यवश, वे अपने वर्तमान के लिए कुछ ख़ास नहीं कर पाते, क्योंकि उनका अतीत हमेशा उसमें दख़ल देता है. ऐसे लोगों के दिमाग़ में अवसाद आसानी से घर बना लेता है. और फिर स्थितियां बिगड़ती जाती हैं. कृपया याद रखें कि अतीत बदला नहीं जा सकता और भविष्य अनिश्चित होता है. हमारे पास सिर्फ़ वर्तमान होता है. और वर्तमान ही भविष्य को बदलने में मदद कर सकता है. इसलिए बेहतर यह है कि हम एकाग्र रूप से जीते हुए अपने पास उपलब्ध हर पल का लाभ उठाएं. जीवन में किसी अनुभव से बचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, हमें उसे जीना चाहिए. उदाहरण के लिए, हम बचपन को छोड़कर सीधे जवानी में प्रवेश नहीं कर सकते. बच्चे का जीवन जीना और डर, वैर-भाव और दिवास्वप्नों से गुज़रना ज़रूरी है. मैं अपने अनुभव से आपको बता सकता हूं कि जो बाल कलाकार अपना सामान्य बचपन नहीं बिता पाए, वे हमेशा महसूस करते हैं कि उन्होंने अपने मासूमियत के दिन खो दिए. इसलिए याद आप लिख रहे हैं, जो कि इस क्षण मैं कर रहा हूं, तो लेखन में ख़ुद को डुबो दें. यदि आप नृत्य कर रहे हैं, तो उसमें खो जाएं. और यदि बारिश हो रही है, जो वर्षा के मौसम में होती है, तो बाहर जाकर उसका आनंद लें. हर पल को इस तरह जिएं और उसका मज़ा लें, जैसे कि वह आपका आख़िरी पल हो. अंग्रेजी में एक कथन है कि यदि आप सिक्कों का ध्यान रखेंगे, तो पाउंड अपना ध्यान ख़ुद रख लेंगे. इसी प्रकार मैं मानता हूं कि यदि हम अपने पलों को जिएं, तो हमारा जीवन अपने आप ख़ुशगवार हो जाएगा. प्रेरणादायी और आत्मनिर्भरता पर लिखने वाले दुनिया के सबसे अधिक पढ़े जाने वाले लेखकों में एक ओग मेंडिनो, जिन्होंने जीवन की चुनौतियों से जूझ रहे लोगों को उम्मीद की किरण दिखाई है, को उद्‌धृत करना चाहता हूं- इस दिन को ऐसे जिएं मानो यह आपका आख़िरी दिन है. याद रखिए कि आपको आने वाला कल सिर्फ़ मूर्खों के कैलेंडर पर मिलेगा. बीते हुए कल की पराजय को भूल जाएं और आने वाले कल की समस्याओं को अनदेखा कर दें. यह क़यामत का दिन है, जो आपके पास है. इसे वर्ष का बेहतरीन दिन बनाएं. आप जो सबसे दुखद शब्द बोल सकते हैं, वह है-यदि मुझे एक और ज़िंदगी मिल जाती. अभी कमर कस लें. और दौ़ड पड़े यह आपका दिन है.

कोई भी अच्छी बात ज़िंदगी को बदल सकती है. अपनुपम खेर भी यही मानते हैं कि एक अच्छी कहानी हमारा जीवन बदल सकती है. वह लिखते हैं-बाइबिल का एक प्रसिद्ध कथन है, अपनी रौशनी को छुपाकर न रखें. यहां रौशनी का मतलब आपकी प्रतिभा या क्षमता से है. वास्तव में, बाइबिल के ज़माने से, आपको ऐसे लोग मिलेंगे, जो अपने और अपनी उपलब्धियों के बारे में शोर मचाने में विश्वास नहीं रखते. उन्हें विश्वास होता है कि उनका काम ख़ुद ही अपने बारे में बोलेगा. वाक़ई यह महान लोगों की विशेषता रही है, क्योंकि उन्होंने अपनी प्रतिभा या आविष्कारों को प्रचारित करने के लिए कोई मुनादी नहीं करवाई. क्या आप विलियम शेक्सपियर की कल्पना अपने नाटको का विज्ञापन करते हुए कर सकते हैं? या वुल्फगेंग अमेडस मोजार्ट की अपने संगीत का प्रचार करते हुए? या लियोनार्डो दा विंची की अपनी प्रतिभा के बारे में बताते हुए? बेशक, आपका जवाब नहीं होगा.
अनुपम खेर ने पचास अध्यायों में अपनी ज़िंदगी के अनुभवों के आधार पर विचार प्रस्तुत किए हैं. उन्होंने अपनी बात रखते वक़्त कई उदाहरणों को शामिल किया है, ताकि समझने वाला बेहतर तरीक़े से उनके विचारों की गहराई तक पहुंच सके. किताब की भाषा शैली सरल है. पेपर बैक्स होने की वजह से इसकी क़ीमत भी वाजिब ही है. बहरहाल, यह किताब पाठकों को पसंद आएगी. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

समीक्ष्य कृति : आप ख़ुद ही बेस्ट हैं
लेखक : अनुपम खेर
प्रकाशक : प्रभात पेपरबैक्स

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सालगिरह या बर्थ डे...


फ़िरदौस ख़ान
सालगिरह... यानी बर्थ डे... क्या दोनों एक ही हैं... यानी एक ही चीज़ के दो नाम...? हालांकि लोग इसे एक ही चीज़ के दो नाम कहेंगे... लेकिन हमें ऐसा नहीं लगता... क्योंकि  हमने सालगिरह भी देखी है और बर्थ डे भी... हमारी एक सहेली का बर्थ डे था... उस दिन उसके लिए केक आया, हैप्पी बर्थ डे लिखा हुआ... केक पर उसका नाम भी था... केक पर रंग-बिरंगी मोमबत्तियां सजी थीं... रस्म के मुताबिक़ मोमबत्तियां बुझाई गईं... केक काटा गया... सबने केक खाया और कोल्ड ड्रिंक पी... उसे तोहफ़े दिए गए... मोबाइल से फ़ोटो ख़ींचे गए और फ़ेसबुक पर अपलोड किए गए... वह बहुत ख़ुश थी...

यह था बर्थ डे... अब बात करते हैं सालगिरह की... हमारे एक मुंह भोले भाई हैं, उनकी बेटी हमारी दोस्त है... उसकी सालगिरह थी... उस दिन शाम को भाई ने ख़ुद क़ीमा, मटन क़ौरमा और मटन बिरयानी बनाई... बाहर से नान मंगाए गए... मिठाई और फल भी मंगाए गए... रात के खाने के वक़्त दस्तरख़ान लगाया गया... दस्तरख़ान पर क़ीमा, मटन बिरयानी, मटन क़ौरमा, नान, मिठाई और फल रखे गए... सबने एक साथ खाना खाया...  खाने के कुछ देर बाद कॊफ़ी पी और साथ में नमकीन और मिठाई भी खाई... भाई ने अपनी बेटी को तोहफ़ा दिया... हमने और दूसरे लोगों ने भी उसे तोहफ़े दिए... वह बहुत ख़ुश थी... उसके साथ पूरा घर ख़ुश था... क्योंकि बहुत दिनों बाद सबने भाई के हाथ का बना खाना खाया था... भाई दोपहर से ही रात के खाने की तैयारी में जुटे हुए थे... कहीं कोई दिखावा नहीं था... हमें भी बहुत अच्छा लगा... अच्छा तो हमें बर्थ डे में भी लगा था, लेकिन जो अपनापन सालगिरह में था, वह बर्थ डे कहीं नज़र नहीं आया... शायद अल्फ़ाज़ के साथ उनसे वाबस्ता अहसास भी मुख़्तलिफ़ हो जाया करते हैं...
   
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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हरे आलू...


फ़िरदौस ख़ान
आज सब्ज़ी वाले से बैंगन का भाव पूछा, तो कहने लगा बीस रुपये किलो हैं... हमने कहा- आधा किलो दे दो... उसने दो बाट रखे, एक पांच सौ ग्राम का और दूसरा सौ ग्राम का... हमने कहा-हमें तो आधा किलो ही चाहिए... वह कहने लगा- मैडमजी आपको दस रुपये में छह सौ ग्राम दे रहा हूं... हमने कहा कि जब हम दस रुपये में आधा किलो ले रहे हैं, तो फिर ज़्यादा क्यों...? वह बोला- मैं बैंगन में मुनाफ़ा कमा चुका हूं... फिर आप भी तो हमारे बारे में सोचते हो...
जाड़ो की बात है... एक दिन सब्ज़ी वाला बहुत उदास था... हमने पूछा-क्या हुआ...? वह कहने लगा-मैडमजी, आलू की दो बोरियां ख़रीदी थीं... बहुत से आलू हरे (ख़राब) आ गए... ऐसे में बहुत नुक़सान हो गया... आलू ज़्यादा क़ीमत पर भी नहीं बेच सकता... आज दिनभर घूमने के बाद भी नुक़सान पूरा नहीं हो सकेगा... फ़ायदा होना तो दूर की बात है...
हमने कहा कि जो भी ग्राहक आलू ख़रीदे, उसमें एक-दो हरे आलू डाल देना... शुरुआत हमसे कर लीजिए... हमें चार-पांच हरे आलू दे देना... इससे ग्राहक को कोई ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ेगा... और आपका नुक़सान होने से बच जाएगा... हमने ख़ुद ही तराज़ू में कुछ हरे आलू डाल दिए... वह हैरानी से देखने लगा... हमने ग़ौर किया, उसकी आंखों में एक उम्मीद नज़र आ रही थी...
हम जानते थे कि उसके नुक़सान की भरपाई के लिए कोई कुछ नहीं करेगा... ग़रीबों का कोई नहीं होता... कोई भी नहीं... बहुत से लोगों के लिए दो बोरी आलू की क़ीमत कुछ भी नहीं है... लेकिन एक ग़रीब आदमी के लिए, एक मेहनतकश के लिए यह एक बहुत बड़ी रक़म है...
अगले दिन सब्ज़ी वाले ने बताया कि आलू से उसे ज़्यादा फ़ायदा, तो नहीं हुआ, लेकिन उसका नुक़सान होने से ज़रूर बच गया...
हमने सही किया या ग़लत नहीं जानते... पर इतना ज़रूर है कि उसका नुक़सान होने से बच गया... इसकी हमें ख़ुशी है...
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वज़ीफ़ा...


बहुत से ख़ानदान ऐसे होंगे, जिनके बच्चे पढ़ाई में बहुत होशियार हैं और वे पढ़ना चाहते हैं... लेकिन वालदेन ग़रीबी की वजह से उन्हें अच्छी तालीम नहीं दिला सकते... अगर ऐसे बच्चों को वज़ीफ़ा मिल जाए, तो वे अच्छी तालीम हासिल करके अपनी और अपने ख़ानदान की ज़िन्दगी को बेहतर बना सकते हैं...
हम कुछ ऐसी वेबसाइटों के पते दे रहे हैं, जहां पर वज़ीफ़े के लिए राब्ता किया जा सकता है...

आपसे ग़ुज़ारिश है कि इस जानकारी को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाएं...
जज़ाक अल्लाह... 
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