अमरुद का पेड़


सच... बचपन बहुत ही प्यारा होता है. बचपन में छोटी-छोटी बातों में भी हम बहुत ख़ुश हो जाते हैं. हमारा ददिहाल वाला घर बहुत बड़ा था. उसमें बड़े-बड़े कमरे, बड़ा दालान और एक बड़ा आँगन था. आँगन में नल लगा हुआ था. क्यारी थी, जिसमें रंग-बिरंगे फूल खिले रहते थे. आँगन में तीन अमरुद के पेड़ लगे हुए थे. हम सुबह उठकर सबसे पहले ये देखते थे कि कितने अमरुद पके हैं. जब कोई पका अमरुद दिख जाता तो उसे तोड़कर खा लेते. जब कई दिन इंतज़ार करने के बाद पका अमरुद नज़र नहीं आता, तो गदरा या कच्चा अमरुद ही तोड़ लिया जाता. अमरुद के लिए बचपन की ये दीवानगी याद आती, तो चेहरे पर ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है.

अब फ़्रिज में फल रखे रहते हैं, लेकिन उन्हें खाने की वो दीवानगी नहीं है. आज भी अमरूदों को देखकर बचपन के दिन याद आ जाते हैं. दरअसल, ख़ुशियां तो छोटी-छोटी चीज़ों में ही छुपी होती हैं, लेकिन हम बड़ी-बड़ी ख़ुशियों में तलाशते रहते हैं, जो हमें कभी नहीं मिलतीं या तब मिलती हैं, जब हमारी ज़िन्दगी में उनकी कोई अहमियत ही नहीं रहती.
डॉ  फ़िरदौस ख़ान       
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