मन्नतों के पीले धागे


बस्ती से दूर
किसी ख़ामोश मक़ाम पर
बने दूधिया मज़ारों के पास खड़े
दरख्त की शाख़ों पर बंधे
मन्नतों के पीले धागे
कितने बीते लम्हों की
याद दिला जाते हैं...
-फ़िरदौस ख़ान
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10 Response to "मन्नतों के पीले धागे"

  1. परमजीत बाली says:
    14 दिसंबर 2009 को 3:13 pm

    यादों का एक सुन्दर एहसास।बहुत बढिया!!

  2. श्यामल सुमन says:
    14 दिसंबर 2009 को 4:11 pm

    छोटी रचना किन्तु अच्छे भाव फिरदौस जी।
    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

  3. अर्शिया says:
    14 दिसंबर 2009 को 4:36 pm

    बहुत ही खूबसूरत कविता। और उतना ही सुंदर चित्र भी लगाया है आपने। बधाई स्वीकारें।

  4. महेन्द्र मिश्र says:
    14 दिसंबर 2009 को 5:26 pm

    बहुत ही उम्दा दिल को छू लेने वाली प्रस्तुति .......

  5. महफूज़ अली says:
    14 दिसंबर 2009 को 5:55 pm

    सुंदर एहसास के साथ ...खूबसूरत अभिव्यक्ति.....

  6. शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' says:
    16 दिसंबर 2009 को 12:37 am

    फिरदौस साहिबा,
    यादों का न भूलने का अहसास
    बिल्कुल नये अंदाज़ में करा दिया आपने
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

  7. Rajey Sha says:
    16 दिसंबर 2009 को 6:49 pm

    आश्‍चर्यजनक शब्‍द साम्‍य देखा, हमारी इक गजल का शेर भी यही बयां करता है।


    वो जो मंदि‍रों-मजारों में धागे बंधे थे
    ,
    धागे नहीं मेरी यादों के लम्‍हें टंगे थे

  8. nadeem says:
    17 दिसंबर 2009 को 10:23 pm

    वाह!!!! इसके आगे मेरी बोलती बंद है!

  9. मौसम says:
    6 मार्च 2010 को 9:17 pm

    बस्ती से दूर
    किसी खामोश मक़ाम पर
    बने दूधिया मज़ारों के पास खड़े
    दरख्त की शाखों पर बंधे
    मन्नतों के पीले धागे
    कितने बीते लम्हों की
    याद दिला जाते हैं...

    अल्लाह आपकी मन्नतों को पूरा करे.......आमीन.......

  10. GGShaikh says:
    18 अप्रैल 2012 को 1:00 pm

    एक दूसरे को बेपह्चाने
    भागती-दौड्ती भीड़ में
    सिमेंट-कोंक्रेट के तपते इस जंगल में...
    एक शबनमी लम्हा... एक ठंडी बूँद
    टपकी...
    फिर यादों की लहर फैल-सी गई भीतर...
    और इन मसरूफियतों के बीच,
    दूधिया मज़ार और मन्नतों के धागे
    झिलमिलाए यादों में
    उस बहुत पीछे छूट गई दुनियाँ के...

    इन ताज़ा-ताज़ा एह्सासातों के लिए
    शुक्रिया फ़िरदौस जी...

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