मुहब्बत का मुजस्समा


मुहब्बत क्या होती है... इसे बेशक लफ़्ज़ों में बयां नहीं किया जा सकता... सिर्फ़ महसूस ही किया जा सकता है... लेकिन कुछ लम्हे ऐसे भी हुआ करते हैं, जब मुहब्बत मुजस्समा बनकर सामने आ खड़ी होती है... और हम उसे देखते ही रह जाते हैं...
कई बरस पहले की बात है... जून का गरम महीना था... तपती दोपहरी ढल रही थी... मगर सूरज अब भी आग बरसा रहा था... लड़का गांव की एक पगडंडी के पास खड़ा था... लड़की उसके पास जाकर खड़ी हो गई... उसने बात शुरू ही की थी कि अचानक लड़के ने अपना रुख़ बदल लिया... इसलिए लड़की को भी मुड़ना पड़ा... लड़के ने ऐसा क्यों किया... वो ये समझ पाती कि लड़का हल्के से मुस्करा उठा... अब उसका साया लड़की पर पड़ रहा था... उसने लड़की को अपने साये में कर लिया था... सूरज की तपती धूप से कुछ हद तक उसे बचा लिया था...
उस वक़्त लड़के की आंखों में जो चमक थी, उसे कभी बयां नहीं किया जा सकता... लड़की को लगा कि वो मुहब्बत ही तो हैं... मुहब्बत का एक मुजस्समा, जिसकी पूजा करने को जी चाहता है...
(ज़िन्दगी की कहानी का एक वर्क़)
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हिन्दू शायर ने लिखा था पाक का क़ौमी तराना


फ़िरदौस ख़ान
पाकिस्तान में इन दिनों वहां के पहले क़ौमी तराने (राष्ट्रगान) बहस का मुद्दा बना हुआ है. पाक के अंग्रेजी अखबार ‘डान’ में सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका बीना सरवर ने इस बारे में लिखा है, ‘जिन्ना के विचारों से पीछा छुड़ाने की सोच के तहत ही आज़ाद की नज़्म को तुच्छ मान लिया गया था, लेकिन अपने प्रतीकों की वजह से वह नज़्म क़ाबिले-गौर है. इसे फिर से स्थापित किया जाए और कम से कम राष्ट्रीय गीत का दर्जा देकर सम्मान दिया जाए, ताकि हमारे बच्चे इससे सीख सकें. क्योंकि भारतीय बच्चे इक़बाल की कृति... सारे जहां से अच्छा... से सीख रहे हैं.’

ग़ौरतलब है कि 1950 में हाफ़िज़ जालंधरी की नज़्म को क़ौमी तराने का दर्जा देने से पहले जिस शायर को यह सम्मान दिया गया था उनका नाम था जगन्नाथ आज़ाद. पाकिस्तान के क़ायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्नाह ने लाहौर में रहने वाले उर्दू के शायर तिलोक चंद के बेटे जगन्नाथ आज़ाद को 1947 में देश के रूप में अलग होने से कुछ ही दिनों पहले पाकिस्तान का राष्ट्रगान लिखने का ज़िम्मा सौंपा था.

नया देश बनने के साथ ही देश के लिए विभिन्न चिन्ह और प्रतीक चुनने का काम भी शुरू हुआ. देश का झंडा पहले ही तैयार हो चुका था, लेकिन क़ौमी तराना नहीं बना था. आज़ादी के वक़्त पाकिस्तान के पास कोई क़ौमी तराना नहीं था. इसलिए जब भी परचम फहराया जाता तो " पाकिस्तान ज़िन्दाबाद, आज़ादी पैन्दाबाद" के नारे लगते थे.

क़ायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्नाह को यह मंज़ूर नही था. वे चाहते थे कि पाकिस्तान के क़ौमी तराने को रचने का काम जल्द से जल्द पूरा हो. उनके सलाहकारों ने उन्हें कई जानेमाने उर्दू शायरों के नामों पर गौर करने को कहा, लेकिन जो बेहतरीन क़ौमी तराना रच सकते थे, लेकिन जिन्नाह दुनिया के सामने पाकिस्तान की धर्मनिरपेक्ष छवि स्थापित करना चाहते थे. इसलिए उन्होंने लाहौर के उर्दू शायर जगन्नाथ आज़ाद से कहा ''मैं आपको पांच दिन का ही वक़्त दे सकता हूं, आप पाकिस्तान के लिए क़ौमी तराना लिखें". हालांकि पाकिस्तान के कई नेताओं को इससे जिन्नाह का यह क़दम अच्छा नहीं लगा, लेकिन जिन्नाह की मर्ज़ी के सामने किसी का नहीं चली. वे बेबस थे.

आखिरकार जगन्नाथ आज़ाद ने पांच दिनों के अंदर क़ौमी तराना तैयार कर लिया जो जिन्नाह को बहुत पसंद आया. क़ौमी तराना के बोल थे-

ऐ सरज़मीं ए पाक ज़र्रे तेरे हैं आज सितारों से तबनक रोशन है कहकशां से कहीं आज तेरी खाक़...

जिन्नाह ने इसे क़ौमी तराने के रूप मे मान्यता दी और उनकी मौत तक यही गीत क़ौमी तराना बना रहा. सितंबर 1948 में जिन्ना की मौत के महज़ छह माह बाद ही इस क़ौमी तराने की मान्यता भी ख़त्म कर दी गई. किस्तान सरकार ने एक राष्ट्र-गीत कमेटी बनाई और जाने माने शायरों से क़ौमी तराने के नमूने मंगवाए, लेकिन कोई भी गीत क़ौमी तराने के लायक़ नहीं बन पा रहा था. आखिरकार पाकिस्तान सरकार ने 1950 मे अहमद चागला द्वारा रचित धुन को राष्ट्रीय धुन के तौर पर मान्यता दी. उसी वक़्त ईरान के शाह पाकिस्तान की यात्रा पर आए और उन्हें यह धुन बेहद पसंद आई. यह धुन पाश्चात्य ज़्यादा लगती थी, लेकिन राष्ट्र-गीत कमेटी का मानना था कि इसका यह स्वरूप पाश्चात्य समाज में ज़्यादा पसंद किया जाएगा.

सन 1954 में उर्दू के मशहूर शायर हाफ़िज़ जालंधरी ने इस धुन के आधार पर एक गीत की रचना की. यह गीत राष्ट्र-गीत कमेटी के सदस्यों को पसंद भी आया. और आखिरकार हाफ़िज़ जालंधरी का लिखा गीत पाकिस्तान का क़ौमी तराना बन गया. इस क़ौमी तराने के बोल हैं-

पाक सरज़मी शाद बाद, किश्वरे हसीँ शाद बाद, तु निशाने अज़्मे आलीशान अर्ज़े पाकिस्तान मर्कज़े हसीं शाद बाद...
हाफ़िज़ जालंधरी के इस क़ौमी तराने के बाद जगन्नाथ आज़ाद का गीत भुला दिया गया. बाद में जगन्नाथ आज़ाद बाद में भारत चले आए थे.

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हीरे की लौंग


ईद मिलादुन नबी और क्रिसमस साथ-साथ... ईद मिलादुन नबी हमारे लिए ज़ाती तौर पर भी बहुत ख़ास है... इस दिन उन्होंने हमें हीरे की लौंग दी थी... वो जानते हैं कि हमें लौंग बहुत पसंद है और हमारे पास बहुत-सी लौंगें रहती हैं... अगर लौंग गुम हो जाए, तो हम फ़ौरन दूसरी पहन लेते हैं... दो दिन पहले रात को उनकी दी हुई हीरे की लौंग हमसे खो गई... मन उदास हो गया... हम इसलिए उदास हुए हों कि वो लौंग हीरे की थी, क़ीमती थी, ऐसा नहीं था... सबसे बड़ी बात थी कि वो लौंग उन्होंने हमें दी थी... ख़ुदा का शुक्र है कि अगले दिन सुबह लौंग हमें मिल गई... उसे पाकर ऐसा लगा, न जाने हमने क्या पा लिया हो...
क्रिसमस तो है ही हमारा पसंदीदा त्यौहार... दोनों ही दिनों की ख़ास तैयारियां करनी हैं... क्रिसमस के दिन चर्च में बहुत से आशना मिल जाते हैं... बाज़ार में क्रिसमस की चीज़ों की रौनक़ है... आज बाज़ार भी जाना है...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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रिश्ते सर के बालों की तरह हुआ करते हैं


रिश्ते सर के बालों की तरह हुआ करते हैं... जब तक वो सर पर रहते हैं... आप उनकी देखभाल करते हैं, उन्हें सजाते-संवारते हैं... लेकिन जैसे ही वो सर से उतरे उनकी फ़िक्र भी ख़त्म हो जाती है... वो उड़कर कहां जाते हैं, कहां नहीं... आप उसके बारे में कभी सोचते तक नहीं...
क्या किसी ने कभी उन बालों के बारे में सोचा है, जो उसके सर से उतर चुके हों...?
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नीले और सुनहरे रंग का स्वेटर...


फ़िरदौस ख़ान
जाड़ो का मौसम शुरू हो चुका था... हम उनके लिए स्वेटर बुनना चाहते थे... बाज़ार गए और नीले और सुनहरे रंग की ऊन ख़रीदी... सलाइयां तो घर में रहती ही थीं... पतली सलाइयां, मोटी सलाइयां और दरमियानी सिलाइयां... अम्मी हमारे और बहन-भाइयों के लिए स्वेटर बुना करती थीं... इसलिए घर में तरह-तरह की सलाइयां थीं...
हम ऊन तो ले आए, लेकिन अब सवाल ये था कि स्वेटर में डिज़ाइन कौन-सा बुना जाए... कई डिज़ाइन देखे... आसपास जितनी भी हमसाई स्वेटर बुन रही थीं, सबके डिज़ाइन खंगाल डाले... आख़िर में एक डिज़ाइन पसंद आया... उसमें नाज़ुक सी बेल थी... डिज़ाइन को अच्छे से समझ लिया और फिर शुरू हुआ स्वेटर बुनने का काम... रात में देर तक जागकर स्वेटर बुनते... चन्द रोज़ में स्वेटर बुनकर तैयार हो गया...
हमने उन्हें स्वेटर भिजवा दिया... हम सोचते थे कि पता नहीं, वो हाथ का बुना स्वेटर पहनेंगे भी या नहीं... उनके पास एक से बढ़कर एक क़ीमती स्वेटर हैं, जो उन्होंने न जाने कौन-कौन से देशों से ख़रीदे होंगे... काफ़ी दिन बीत गए, एक दिन हमने उन्हें वही स्वेटर पहने देखा... उस वक़्त हमारी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था... हमने कहा कि तुमने इसे पहन लिया... उन्होंने एक शोख़ मुस्कराहट के साथ कहा- कैसे न पहनता... इसमें मुहब्बत जो बसी है...
इस एक पल में हमने जो ख़ुशी महसूस की, उसे अल्फ़ाज़ में बयां नहीं किया जा सकता... कुछ अहसास ऐसे हुआ करते हैं, जिन्हें सिर्फ़ आंखें ही बयां कर सकती हैं, उन्हें सिर्फ़ महसूस किया जाता है... उन्हें लिखा नहीं जाता... शायद लिखने से ये अहसास पराये हो जाते हैं...
हम अकसर ख़ामोश रहते हैं, वो भी बहुत कम बोलते हैं... उन्हे बोलने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती... क्योंकि उनकी आंखें वो सब कह देती हैं, जिसे हम सुनना चाहते हैं... वो भी हमारे बिना कुछ कहे, ये समझ लेते हैं कि हम उनसे क्या कहना चाहते हैं... रूह के रिश्ते ऐसे ही हुआ करते हैं...
उनकी दादी भी उनके लिए स्वेटर बुना करती थीं...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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नींदें


नींदें
आंखों से
कोसों दूर
न जाने
किस वीराने में
भटकती फिरती हैं...
-फ़िरदौस ख़ान
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मौत के क़रीब...


फ़िरदौस ख़ान
हमने अपनी ज़िन्दगी में कई बार मौत को बहुत क़रीब से देखा है... उन लम्हों में ज़ेहन काम करना बंद कर देता था, क्योंकि सोचने का वक़्त भी नहीं होता था, लेकिन अगले ही लम्हे में हम ज़िन्दगी में होते थे... एक बार की बात है, हम दफ़्तर से लौट रहे थे... रात के क़रीब तीन बजे थे... ड्राइवर ने घबराते हुए हमें बताया कि कार के ब्रेक फ़ेल हो गए हैं और स्टेयरिंग भी काम नहीं कर रहा है... जिस वक़्त उसने ये बात बताई, उस वक़्त कार टी प्वाइंट के क़रीब थी... हमें दाहिने मुड़ना था... अब कार न तो मुड़ सकती थी और न ही रुक सकती थी... सिर्फ़ सामने की दीवार से टकरा कर चकनाचूर हो सकती थी... उसे भी इस बात का अहसास था और हमें भी... ड्राइवर ने आंखें बंद करते हुए कहा- मैम अब तो गए...
हमारी आंखों के सामने उस सर्द अंधेरी रात में स्ट्रीट लाइट की रौशनी में चमकती वो दीवार थी, जिससे गाड़ी को टकरा जाना था... अचानक आंखों के सामने धुंध छा गई... और गाड़ी एक ज़ोर के झटके के साथ रुक गई... हमने देखा कि कार हमारे घर के पास एक ख़ाली पड़े प्लॊट में लगे रेत के ढेर में घुस चुकी थी... हमने चिल्लाए- बच गए... ड्राइवर ने आंखें खोलीं... कड़ाके की ठंड के बावजूद वो पसीने से तरबतर था...
हम गाड़ी से उतरे... इतने में पापा भी आ गए और उन्होंने ड्राइवर को अंदर बुला लिया... हमने सारा वाक़िया सुनाया... अम्मी ने अल्लाह का शुक्र अदा किया...
ड्राइवर जब ज़रा संभल गया, तो उसने फ़ोन करके दूसरी गाड़ी मंगवाई... सुबह को मैकेनिक भी आ गया और उसने बताया कि गाड़ी के ब्रेक फ़ेल हैं और स्टेयरिंग भी काम नहीं कर रहा है... ड्राइवर के साथ-साथ मैकेनिक भी इस बात पर हैरान था कि कार रेत के ढेर तक कैसे पहुंची...?
हम आज तक ये नहीं समझ पाए कि जब स्टेयरिंग काम नहीं कर रहा था, तो वो कार घर तक कैसे पहुंची... क्योंकि घर तक तक आने के लिए गाड़ी को दो बार मुड़ना था.
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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