कितना भला लगता है पतझड़ भी कभी-कभी

कितना लुभावना होता है
पतझड़ भी कभी-कभी
बागों में
ज़मीं पे बिखरे
सूखे ज़र्द पत्तों पर
चलना
कितना भला लगता है कभी-कभी

माहौल को रूमानी बनातीं
दरख्तों की, वीरान डालों पर
चहकते परिंदों की आवाज़ें
कितनी भली लगती हैं कभी-कभी

क्यारियों में लगे
गेंदे और गुलाब के
खिलते फूलों की
भीनी-भीनी खुशबू
आंगन में कच्ची दीवारों पर, चढ़ती धूप
कितनी भली लगती है, कभी-कभी

सच! पतझड़ का भी
अपना ही रंग
बसंत और बरसात की तरह...
-फ़िरदौस ख़ान

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5 Response to "कितना भला लगता है पतझड़ भी कभी-कभी"

  1. paras says:
    17 सितंबर 2008 को 8:48 am

    aap ne to mrityuatma ko apni bani ke dwara ivit kar dia hai.

  2. pallavi trivedi says:
    17 सितंबर 2008 को 12:40 pm

    sundar kavita...sundar tasweer.

  3. मौसम says:
    17 सितंबर 2008 को 2:09 pm

    क्यारियों में लगे
    गेंदे और गुलाब के
    खिलते फूलों की
    भीनी-भीनी खुशबू
    आंगन में कच्ची दीवारों पर, चढ़ती धूप
    कितनी भली लगती है, कभी-कभी
    सच! पतझड़ का भी
    अपना ही रंग
    बसंत और बरसात की तरह...

    अब पतझड़ को नए नज़रिए से देखेंगे...बहुत शानदार नज़्म है...आपके अल्फाज़ ने पतझड़ को और भी खूबसूरत बना दिया है...

  4. दीपक says:
    17 सितंबर 2008 को 4:26 pm

    बहुत सुंदर चित्रण किया है आपने ।

  5. paras says:
    18 सितंबर 2008 को 3:24 am

    aap ke alfaz ne to patajhar me ek nai jaan dal di hai. Firdaus ji aap ke alfaz to khuda ki di hui ek mahtvapurn tofa hai. khuda hafiz

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