तुम समझ लेना, मैं तुम्हें याद करती हूं...

जब सुबह सूरज की
चंचल किरनें
पेशानी को चूमें
और शोख़ हवाएं
बालों को सहलाएं
तब
तुम समझ लेना
मैं तुम्हें याद करती हूं...

जब
ज़मीन पर
चांदनी की चादर
बिछ जाए
और फूल
अपनी भीनी-भीनी महक से
माहौल को
रूमानी कर दें
हर सिम्त
मुहब्बत का मौसम
अंगड़ाइयां लेने लगे
तब
तुम समझ लेना
मैं तुम्हें याद करती हूं...
-फ़िरदौस ख़ान
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4 Response to "तुम समझ लेना, मैं तुम्हें याद करती हूं..."

  1. alex says:
    5 नवंबर 2008 को 3:25 pm

    क्या बात है!
    ऐसे अगर कोई याद करने वाला होता.....
    तो कोई तनहा क्यो होता कोई उदास क्यो होता.
    ऐसे शोख पैगाम के बाद और क्या तमन्ना होगी.

    काश........

  2. MANVINDER BHIMBER says:
    5 नवंबर 2008 को 3:31 pm

    जब
    ज़मीन पर
    चांदनी की चादर
    बिछ जाए
    और फूल
    अपनी भीनी-भीनी महक से
    माहौल को
    रूमानी कर दें
    हर सिम्त
    मुहब्बत का मौसम
    अंगड़ाइयां लेने लगे
    तब
    तुम समझ लेना
    मैं तुम्हें याद करती हूं...
    haai....fir wahi khoobsurat lahja

  3. dr. ashok priyaranjan says:
    11 नवंबर 2008 को 1:53 am

    komal bhavon ki prakhar abhivyakti

  4. संजय भास्कर says:
    25 मार्च 2010 को 8:23 am

    बहुत सुन्दर रचना । आभार
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    Sanjay kumar
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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