मई दिवस और पापा

कल मज़दूर दिवस है. पहली मई के दिन पापा सुबह-सवेरे तैयार होकर मई दिवस के कार्यक्रमों में जाते थे. पापा ठेकेदार थे. लोगों के घर बनाते थे. छोटी-बड़ी इमारतें बनाते थे. उनके पास हमेशा कमज़ोर और बूढ़े मिस्त्री-मज़दूर हुआ करते थे. हमने पापा से पूछा कि लोग ताक़तवर और जवानों को रखना पसंद करते हैं, फिर आप कमज़ोर और बूढ़े लोगों को काम पर क्यों रखते हैं. पापा जवाब देते कि इसीलिए तो इन्हें रखता हूं, क्योंकि सबको जवान और ताक़तवर मिस्त्री-मज़दूर चाहिए. ऐसे में कमज़ोर और बूढ़े लोग कहां जाएंगे. अगर इन्हें काम नहीं मिलेगा, तो इनका और इनके परिवार का क्या होगा.

हमें अपने पापा पर फ़ख़्र है. उन्होंने कभी किसी का शोषण नहीं किया. किसी से तयशुदा घंटों से ज़्यादा काम नहीं करवाया, बल्कि कभी-कभार वक़्त से पहले ही उन्हें छोड़ दिया करते थे. अगर कोई मज़दूर भूखा होता, तो उसे अपना खाना खिला दिया करते थे. फिर ख़ुद शाम को जल्दी आकर खाना खाते. पापा ने न कभी कमीशन लिया और न ही किसी से एक पैसा ज़्यादा लिया. इसीलिए हमेशा नुक़सान में रहते. अपने बच्चों के लिए न तो दौलत जोड़ पाए और न ही कोई जायदाद नहीं बना पाए.

हमें इस बात पर फ़ख़्र है कि पापा ने हलाल की कमाई से अपने बच्चों की परवरिश की.
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

मेहनतकशों को मज़दूर दिवस की मुबारकबाद 
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मज़दूर दिवस


कल मज़दूर दिवस है... यानी हमारा दिन... हम भी तो मज़दूर ही हैं... हमें अपने मज़दूर होने पर फ़ख़्र है... हमारे काम के घंटे तय नहीं हैं.... सुबह से लेकर देर रात तक कितने ही काम करने पड़ते हैं... यह बात अलग है कि हमारा काम लिखने-पढ़ने का है... इसके अलावा हम घर का काम भी कर लेते हैं... घर की साफ़-सफ़ाई, कपड़े-बर्तन धोना, खाना बनाना जैसे काम भी अकसर करने पड़ते हैं... किसी का ख़ून चूसकर अपनी तिजोरियां भरकर 'अमीर’ कहलाने से कहीं बेहतर है 'मज़दूर’ हो जाना...

सभी मेहनतकशों से कहना चाहेंगे कि अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाते रहना.. हक़ सिर्फ़ मांगने से नहीं मिलता, उसे हासिल किया जाता है... मेहनत कभी ज़ाया नहीं जाती...
बक़ौल साहिर लुधियानवी-
वो सुबह कभी तो आएगी
इन काली सदियों के सर से, जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर झलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा, जब धरती नगमे गाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी...
-फ़िरदौस ख़ान 



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उस रोज़ हम भी महिला दिवस मनाएंगे...


कल महिला दिवस है... एक तरफ़ देशभर में कार्यक्रम होंगे और महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर लंबे-चौड़े भाषण दिए जाएंगे... और दूसरी तरफ़ महिला दिवस से अनजान करोड़ों ग़रीब महिलाएं हर रोज़ की तरह सूरज निकलने से पहले उठेंगी... घर का काम-काज करेंगी... दोपहर के लिए रोटी बांधेंगी और फिर मज़दूरी के लिए निकल पड़ेंगी... कोई अपने दूधमुंहे बच्चे को पीठ से बांधकर ईंटें, मिट्टी, रेत, क्रैसर ढोएगी, तो कोई सड़क पर ही अपने बच्चे को बिठाकर पत्थर तोड़ेगी... फिर शाम को दिहाड़ी के पैसों से आटा, दाल, सब्ज़ी ख़रीदेगी और घर जाकर चूल्हा-चौका संभाल लेगी... दिन-रात के चौबीस घंटों में से अट्ठारह घंटे उसे काम करना है... वो भी एक दिन, एक हफ़्ता, एक महीना या एक साल नहीं, बल्कि ज़िंदगी भर... यानी जब तक उसके जिस्म में जान है, उसे काम करना है...
बहुत क़रीब से देखा है, इन मेहनतकश महिलाओं को... जिस रोज़ ऐसी एक भी मेहनतकश महिला के लिए कुछ कर पाएंगे, यक़ीनन उस, रोज़ हम भी महिला दिवस मनाएंगे...

चित्र : गूगल से साभार
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होलिया में उड़े रे गुलाल...


फ़िरदौस ख़ान
मेरे महबूब !
होली
मुझे बहुत अज़ीज़ है
क्योंकि
इसके इंद्रधनुषी रंगों में
तुम्हारे इश्क़ का रंग भी शामिल है...
हिन्दुस्तानी त्यौहार हमें बचपन से ही आकर्षित करते रहे हैं, क्योंकि ये त्यौहार मौसम से जुड़े होते हैं, प्रकृति से जुड़े होते हैं. हर त्यौहार का अपना ही रंग है, बिल्कुल मन को रंग देने वाला. बसंत पंचमी के बाद रंगों के त्यौहार होली का उल्लास वातावरण को उमंग से भर देता है. होली से कई दिन पहले बाज़ारों, गलियों और हाटों में रंग, पिचकारियां सजने लगती हैं. छोटे क़स्बों और गांवों में होली का उल्लास देखते ही बनता है. महिलाएं कई दिन पहले से ही होलिका दहन के लिए भरभोलिये बनाने लगती हैं. भरभोलिये गाय के गोबर से बने उन उपलों को कहा जाता है, जिनके बीच में छेद होता है. इन भरभेलियों को मूंज की रस्सी में पिरोकर माला बनाई जाती है. हर माला में सात भरभोलिये होते हैं. इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घुमाने के बाद होलिका दहन में डाल दिया जाता है. होली का सबसे पहला काम झंडा लगाना है. यह झंडा उस जगह लगाया जाता है, जहां होलिका दहन होना होता है. मर्द और बच्चों चैराहों पर लकड़िया इकट्ठी करते हैं. होलिका दहन के दिन दोपहर में विधिवत रूप से इसकी पूजा-अर्चना की जाती है. महिलाएं पारम्परिक गीत गाते हुए घरों में पकवानों का भोग लगाती हैं. रात में मुहूर्त के समय होलिका दहन किया जाता है. किसान गेहूं और चने की अपनी फ़सल की बालियों को इस आग में भूनते हैं. देर रात तक होली के गीत गाये जाते हैं और लोग नाचकर अपनी ख़ुशी का इज़हार करते हैं.
होली के अगले दिन को फाग, दुलहंदी और धूलिवंदन आदि नामों से पुकारा जाता है. हर राज्य में इस दिन को अलग नाम से जाना जाता है. बिहार में होली को फगुआ या फागुन पूर्णिमा कहते हैं. फगु का मतलब होता है, लाल रंग और पूरा चांद. पूर्णिमा का चांद पूरा ही होता है. हरित प्रदेश हरियाणा में इसे धुलैंडी कहा जाता है. इस दिन महिलाएं अपने पल्लू में ईंट आदि बांधकर अपने देवरों को पीटती हैं. यह सब हंसी-मज़ाक़ का ही एक हिस्सा होता है. महाराष्ट्र में होली को रंगपंचमी और शिमगो के नाम से जाना जाता है. यहां के आम बाशिन्दे जहां रंग खेलकर होली मनाते हैं, वहीं मछुआरे नाच के कार्यक्रमों का आयोजन कर शिमगो मनाते हैं. पश्चिम बंगाल में होली को दोल जात्रा के नाम से पुकारा जाता है. इस दिन श्रीकृष्ण और राधा की मूर्तियों का मनोहारी श्रृंगार कर शोभा यात्रा निकाली जाती है. शोभा यात्रा में शामिल लोग नाचते-गाते और रंग उड़ाते चलते हैं. तमिलनाडु में होली को कामान पंडिगई के नाम से पुकारा जाता है. इस दिन कामदेव की पूजा की जाती है. किवदंती है कि शिवजी के क्रोध के कारण कामदेव जलकर भस्म हो गए थे और उनकी पत्नी रति की प्रार्थना पर उन्हें दोबारा जीवनदान मिला.
इस दिन सुबह से ही लोग रंगों से खेलना शुरू कर देते हैं. बच्चे-बड़े सब अपनी-अपनी टोलियां बनाकर निकल पड़ते हैं. ये टोलियां नाचते-गाते रंग उड़ाते चलती हैं. रास्ते जो मिल जाए, उसे रंग से सराबोर कर दिया जाता है. महिलाएं भी अपने आस पड़ोस की महिलाओं के साथ इस दिन का भरपूर लुत्फ़ उठाती हैं. इस दिन दही की मटकियां ऊंचाई पर लटका दी जाती हैं और मटकी तोड़ने वाले को आकर्षक इनाम दिया जाता है. इसलिए युवक इसमें बढ़-चढ़कर शिरकत करते हैं.
रंग का यह कार्यक्रम सिर्फ़ दोपहर तक ही चलता है. रंग खेलने के बाद लोग नहाते हैं और भोजन आदि के बाद कुछ देर विश्राम करने के बाद शाम को फिर से निकल पड़ते हैं. मगर अब कार्यक्रम होता है, गाने-बजाने का और प्रीति भोज का. अब तो होली से पहले ही स्कूल, कॊलेजों व अन्य संस्थानों में होली के उपलक्ष्य में समारोहों का आयोजन किया जाता है. होली के दिन घरों में कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं, जिनमें खीर, पूरी और गुझिया शामिल है. गुझिया होली का ख़ास पकवान है. पेय में ठंडाई और भांग का विशेष स्थान है.
होली एक ऐसा त्यौहार है, जिसने मुग़ल शासकों को भी प्रभावित किया. अकबर और जहांगीर भी होली खेलते थे. शाहजहां के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी और आब-ए-पाशी के नाम से पुकारा जाता था. पानी की बौछार को आब-ए-पाशी कहते हैं. आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र भी होली मनाते थे. इस दिन मंत्री बादशाह को रंग लगाकर होली की शुभकामनाएं देते थे. पर्यटक अलबरूनी ने अपने ऐतिहासिक सफ़रनामे मे होली का ख़ास तौर पर ज़िक्र किया है. हिन्दू साहित्यकारों ही नहीं मुस्लिम सूफ़ियों ने भी होली को लेकर अनेक कालजयी रचनाएं रची हैं. अमीर ख़ुसरो साहब कहते हैं-
मोहे अपने ही रंग में रंग दे
तू तो साहिब मेरा महबूब ऐ इलाही
हमारी चुनरिया पिया की पयरिया वो तो दोनों बसंती रंग दे
जो तो मांगे रंग की रंगाई मोरा जोबन गिरबी रख ले
आन परी दरबार तिहारे
मोरी लाज शर्म सब ले
मोहे अपने ही रंग में रंग दे...
होली के दिन कुछ लोग पक्के रंगों का भी इस्तेमाल करते हैं, जिसके कारण जहां उसे हटाने में कड़ी मशक़्क़त करनी पड़ती है, वहीं इससे एलर्जी होने का ख़तरा भी बना रहता है. हम और हमारे सभी परिचित हर्बल रंगों से ही होली खेलते हैं. इन चटक़ रंगों में गुलाबों की महक भी शामिल होती है. इन दिनों पलाश खिले हैं. इस बार भी इनके फूलों के रंग से ही होली खेलने का मन है.
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आज प्रॉमिस डे है


आज प्रॉमिस डे है, यानी वादों का दिन. एक-दूजे से वादा करने का दिन.
लेकिन हम मानते हैं कि सबके अपने-अपने प्रॉमिस डे हुआ करते हैं, जो किसी भी माह के किसी भी दिन, किसी भी तारीख़ को हो सकते हैं. बहरहाल, इसी बहाने कुछ गुज़श्ता लम्हे सामने आकर खड़े हो गए.
बात कई बरस पुरानी है. वो अपनी अम्मी के साथ खड़े थे. हम भी वहां थे. न जाने क्यों मन बहुत उदास था, इतना उदास कि बयान से बाहर. बाज़ दफ़ा ऐसा होता है कि मन बहुत उदास होता है, लेकिन हमें उदासी की वजह ख़ुद मालूम नहीं होती. शायद हम इस बारे में सोचते ही नहीं हैं कि हम उदास क्यों हैं. इसी तरह कई मर्तबा दिल बहुत ख़ुश होता है. इतना ख़ुश कि हवाओं में उड़ने को दिल चाहता है.

ख़ैर, उनकी नज़र हम पर पड़ी और वो हमारे क़रीब आ गए. उन्होंने हमसे ’कुछ’ कहा. कुछ ऐसा कि हम उन अल्फ़ाज़ को कभी भूल ही नहीं सकते. उनका एक-एक लफ़्ज़ हमारी रूह पर लिखा गया. मुहब्बत की शिद्दत के रंग इतने गहरे थे कि हमारी रूह ही नहीं, हमारा तन-मन भी उन रंगों में रंग गया.
वो शायर नहीं हैं, लेखक नहीं हैं, कोई फ़नकार भी नहीं हैं. जिस पेशे से वो ताल्लुक़ रखते हैं, उसके मद्देनज़र हम सोच भी नहीं सकते थे कि वो मुहब्बत के जज़्बे से सराबोर रूहानी अल्फ़ाज़ का इस तरह से इस्तेमाल भी कर सकते हैं. किसी शायर ने भी शायद ही अपनी महबूबा से इन अल्फ़ाज़ में अपनी मुहब्बत का इक़रार किया होगा, उससे कोई वादा किया होगा.

वाक़ई मुहब्बत इंसान को किस बुलंदी पर पहुंचा देती है. शायद इसीलिए मुहब्बत में एक बादशाह तक अपनी महबूबा की ग़ुलामी दिल से क़ुबूल कर लेता है.
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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पैग़ाम-ए-मादर-ए-वतन का लोकार्पण


मेरठ में 14 मई 2008 को मासिक पैग़ाम-ए-मादर-ए-वतन का लोकार्पण करते राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राजनीतिज्ञ गुरु इन्देश कुमार व अन्य जानेमाने गण. साथ में हैं पत्रिका की सम्पादक फ़िरदौस ख़ान


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डालडा का डिब्बा हो


हमें बचपन की यादों से वाबस्ता हर चीज़ से निस्बत है, भले ही वह डालडा का डिब्बा हो. उस वक़्त ज़िन्दगी कितनी ख़ुशहाल थी. सर पर वालिदैन का साया जो था. 
-फ़िरदौस ख़ान
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बरसात का मौसम...

नज़्म
गर्मियों का मौसम भी
बिलकुल
ज़िन्दगी के मौसम-सा लगता है...
भटकते बंजारे से
दहकते आवारा दिन
और
विरह में तड़पती जोगन-सी
सुलगती लम्बी रातें...
काश!
कभी ज़िन्दगी के आंगन में
आकर ठहर जाए
बरसात का मौसम...
-फ़िरदौस ख़ान
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ख़ानज़ादा : एक संग्रहणीय दस्तावेज़


फ़िरदौस ख़ान 
पिछले दिनों राजकमल प्रकाशन की तरफ़ से एक उपन्यास मिला, जिसका नाम था ख़ानज़ादा. यह भगवानदास मोरवाल का उपन्यास है. यह मेवात की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित है. दरअसल यह फ़िरोज़शाह तुग़लक़, सादात, इब्राहीम लोदी और मुग़ल बादशाहों से मुक़ाबला करने वाले मेवात के वीरों की गाथा है. ये उन मेवातियों की गाथा है, जिन्होंने बादशाहों के सामने घुटने नहीं टेके और उनसे जमकर लोहा लिया.  इन्हीं में से एक थे हसन ख़ां मेवाती. फ़िरोज़शाह तुग़लक ने राजा नाहर ख़ान को मेवात का आधिपत्य सौंपा था. उन्होंने मेवात रियासत क़ायम की. राजा नाहर ख़ान को कोटला के राजा समरपाल के नाम से भी जाना जाता है. वे ख़ानज़ादा राजपूतों के पूर्वज थे. उनके ख़ानदान ने मेवात पर दो सौ सालों तक हुकूमत की. हसन ख़ां मेवाती इसी ख़ानदान के आख़िरी हुकुमरान थे. उन्होंने अपनी जान क़ुर्बान कर दी, लेकिन किसी विदेशी हमलावर का साथ नहीं दिया.   

दरअसल मेवात एक अंचल का नाम है, जो उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान की सीमाओं में फैला हुआ है. प्राचीन काल में इस इलाक़े को मत्स्य प्रदेश के नाम से जाना जाता था. इसका धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से बहुत महत्व है. वेद और पुराणों में ब्रज की चौरासी कोस की परिक्रमा का उल्लेख मिलता है. इस परिक्रमा में होडल, मधुवन, तालवन, बहुलावन, शांतनु कुंड, राधाकुंड, कुसुम सरोवर, जतीपुरा, डीग, कामवन, बरसाना, नंदगांव, कोकिलायन, जाप, कोटवन, पैगांव, शेरगढ़, चीरभाट, बड़गांव, वृंदावन, लोहवन, गोकुल और मथुरा भी आता है. इस परिकमा में श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़े स्थल, सरोवर, वन, मन्दिर और कुंड आदि का भ्रमण किया जाता है. इस दौरान कृष्ण भक्त भजन-कीर्तन एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठान करते हुए परिक्रमा पूरी करते हैं. वे इसे मोक्षदायिनी मानते हैं. 

मेवात का भव्य एवं गौरवशाली इतिहास रहा है. इस उपन्यास के ज़रिये लेखक ने मेवात के इतिहास के साथ-साथ यहां की लोक संस्कृति को भी बख़ूबी पेश किया है. उपन्यास की भाषा सरल और सहज है. इसे पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है कि चलचित्र की मानिन्द सबकुछ आंखों के सामने ही घटित हो रहा है. उपन्यास की भाषा शैली पाठक को बांधे रखती है. बानगी देखें-
“चौदहवीं सदी का उत्तरार्द्ध. अरावली के शिखर पर बना परकोटा. एक ऐसा परकोटा जिसमें चूने का कोई अता-पता नहीं, मगर फिर भी यह कहलाया गया क़िला. एक ऐसा दुर्गम क़िला कि ऊपर पहुंचते-पहुंचते सांस फूलने लग जाए. यहां से चारों तरफ़ जहां तक नज़र जाती, इसके स्याह पत्थरों की दरारों के बीच बबूल. कीकर, बेर और दूसरी कंटीली झाड़ियों के बीच विशाल बरगद, पीपल सहित दूर तक बिछी हरियाली की चादर दिखाई देती. एकदम सीधे खड़े इस पहाड़ पर चढ़ने की यहां के स्थानीय लोगों की भी हिम्मत नहीं होती.“           

इतिहास के बारे में लिखना कोई आसान काम नहीं है. इसमें लेखक का ईमानदार होना निहायत ही ज़रूरी है, जो बिना किसी पक्षपात और भेदभाव के पूरी निष्ठा के साथ अपने काम को अंजाम दे. पिछले कुछ अरसे से जिस तरह पाठ्य पुस्तकों से इतिहास से वाबस्ता अध्याय हटाए जा रहे हैं, इससे विद्यार्थी इनसे अनजान ही रहेंगे. लेकिन भला हो उन इतिहासकारों और लेखकों का जो अपनी लेखनी के ज़रिये इतिहास और ऐतिहासिक किरदारों को ज़िन्दा रखे हुए हैं.  
लेखक भगवानदास मोरवाल कहते हैं- “कोई बात नहीं मुग़ल इतिहास संबंधी अध्याय ही तो पाठ्यक्रमों से हटाए जा रहे हैं, पुस्तकें तो ख़त्म नहीं हो जाएंगी. इसलिए यदि आपको यह नहीं पता कि बाबर को इस देश में कौन-से हिन्दू राजा ने बुलाया था और उसके आने के बाद खानवा के दूसरे युद्ध से पहले हसन ख़ां मेवाती ने बाबर की पेशकश क्या कहते हुए ठुकरा दी थी, तो यह जानने के लिए यह उपन्यास आपका इंतज़ार कर रहा है.”
लेखक ने सही कहा है. पाठक इस उपन्यास के ज़रिये मेवात के इतिहास को भली-भांति जान पाएंगे. 


क़ाबिले- ग़ौर है कि पाकिस्तान के लाहौर के मशहूर प्रकाशन गृह फ़िक्शन हाउस और नई दिल्ली के एमआर पब्लिकेशन्स ने ख़ानज़ादा का उर्दू संस्करण प्रकाशित किया है. इससे उर्दू भाषी लोग इस ऐतिहासिक उपन्यास को पढ़ पा रहे हैं.  


बहरहाल, यह उपन्यास मेवात के उन नायकों से पाठकों को रूबरू करवाता है, जिनके बारे में बहुत कम लिखा गया है. यह एक ऐतिहासक और संग्रहणीय दस्तावेज़ है, जो इतिहास के छात्रों के लिए बहुत ही उपयोगी साबित होगा. 

समीक्ष्य कृति : ख़ानज़ादा
लेखक : भगवानदास मोरवाल   
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
पृष्ठ : 392
मूल्य : 399 रुपये


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दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात-दिन...


फ़िरदौस ख़ान
भारतीय सिनेमा में कई ऐसी हस्तियां हुई हैं, जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है. इन्हीं में से एक हैं गुलज़ार. गीतकार से लेकर, पटकथा लेखन, संवाद लेखन और फिल्म निर्देशन तक के अपने लंबे स़फर में उन्होंने शानदार कामयाबी हासिल की. मृदुभाषी और सादगी पसंद गुलज़ार का व्यक्तित्व उनके लेखन में सा़फ झलकता है. आज वह जिस मुक़ाम पर हैं, उस तक पहुंचने के लिए उन्हें संघर्ष के कई पड़ावों को पार करना पड़ा.

गुलज़ार का असली नाम संपूर्ण सिंह कालरा है. उनका जन्म 18 अगस्त, 1936 को पाकिस्तान के झेलम ज़िले के दीना में हुआ. उन्होंने देश के विभाजन की त्रासदी को झेला. उनके परिवार को हिंदुस्तान आना प़डा. उनका बचपन दिल्ली की सब्ज़ी मंडी में बीता. उनके परिवार की माली हालत अच्छी नहीं थी. उनके आठ भाई-बहन थे. उनके पिता ने उन्हें पढ़ाने से इंकार कर दिया, लेकिन वह पढ़ना चाहते थे. पढ़ाई का ख़र्च निकालने के लिए उन्होंने पेट्रोल पंप पर नौकरी कर ली. इसी दौरान उन्होंने अपने ख्यालात और अपने जज़्बात को शब्दों में ढालना भी शुरू कर दिया. उन्होंने कई भाषाएं सीखीं, जिनमें उर्दू, फ़ारसी और बांग्ला शामिल थी. फिर उन्होंने अनुवाद का काम शुरू कर दिया. वह रवींद्रनाथ ठाकुर और शरत चंद्र की रचनाओं का उर्दू अनुवाद करने लगे. बाद में वह मुंबई चले आए. उनका यहां शायरों, साहित्यकारों और नाटककारों की महफ़िल में उठना-बैठना शुरू हो गया. एक दिन वह गीतकार शैलेंद्र के पास गए और उनसे काम के सिलसिले में बातचीत की. उन दिनों संगीतकार सचिनदेव बर्मन फ़िल्म बंदिनी के गीतों को सुरबद्ध कर रहे थे. शैलेंद्र की सिफ़ारिश पर सचिन दा ने गुलज़ार को एक गीत लिखने को कहा. गुलज़ार ने उन्हें गीत लिखकर दिया, जिसके बोल थे-मोरा गोरा अंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे. सचिन दा को गीत बहुत पसंद आया. उन्होंने अपनी आवाज़ में गाकर बिमल राय को सुनाया. गुलज़ार के बांग्ला ज्ञान से मुतासिर होकर बिमल राय ने उनके सामने अपने होम प्रोडक्शन में स्थायी तौर पर काम करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन उन्होंने इसे विनम्रता से अस्वीकार कर दिया. गुलज़ार की मंज़िल इससे आगे थी, बहुत आगे. उन्हें महज़ एक गीतकार बनकर रहना मंज़ूर नहीं था. उन्होंने आगे चलकर अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा भी किया.

हुआ यूं कि बिमल राय की मौत के बाद संगीतकार हेमंत कुमार ने उनकी यूनिट के काफ़ी लोगों को अपने प्रोडक्शन में नौकरी पर रख लिया. गुलज़ार ने हेमंत कुमार की फिल्म बीवी और मकान, राहगीर और ख़ामोशी के लिए गीत लिखे थे. ऋषिकेश मुखर्जी ने बिमल राय की फिल्म का संपादन और सह-निर्देशन किया था. वह भी स्वतंत्र फ़िल्म निर्देशक बन गए और आशीर्वाद फ़िल्म के संवाद के साथ-साथ गीत भी गुलज़ार को ही लिखने पड़े, क्योंकि उन दिनों शैलेंद्र के पास बहुत काम था. गुलज़ार ने बिमल दा के साथ आनंद, गुड्‌डी, बावर्ची और नमक हराम जैसी कामयाब फ़िल्मों में काम किया. गुलज़ार के फ़िल्म निर्माता एनसी सिप्पी से भी अच्छे रिश्ते बन गए. नतीजतन, सिप्पी-गुलज़ार ने मिलकर कई बेहतरीन फ़िल्में बनाईं. गुलज़ार के मीना कुमारी से भी अच्छे रिश्ते थे. मीना कुमारी ने मौत से पहले अपनी तमाम नज़्में उन्हें सौंप दी थीं, जिन्हें बाद में उन्होंने शाया कराया. जब गुलज़ार स्वतंत्र फिल्म निर्देशक बने तो उन्होंने फ़िल्म मेरे अपने की मुख्य भूमिका मीना को ही थी. 1971 में बनी यह फ़िल्म मीना कुमारी की मौत के बाद रिलीज़ हुई थी. इसके बाद गुलज़ार ने एक से बढ़कर एक कई फ़िल्में बनाईं. बतौर निर्देशक गुलज़ार ने 1971 में मेरे अपने, 1972 में परिचय और कोशिश, 1973 में अचानक, 1974 में ख़ुशबू, 1975 में आंधी, 1976 में मौसम, 1977 में किनारा, 1978 में किताब, 1980 में अंगूर, 1981 में नमकीन और मीरा, 1986 में इजाज़त, 1990 में लेकिन, 1993 में लिबास, 1996 में माचिस और 1999 में हु तू तू बनाई. उन्होंने अपनी फ़िल्मों में ज़िंदगी के विभिन्न रंगों को बख़ूबी पेश किया, भले ही वह रंग दुख का हो या फिर इंद्रधनुषी सपनों को समेटे ख़ुशियों का रंग हो. फ़िल्म आंधी में इंदिरा गांधी की झलक मिलती है. इसलिए इसे इंदिरा गांधी की ज़िंदगी पर आधारित बताया जाता है.


आपातकाल के दौरान इस फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया गया. यह फ़िल्म आपातकाल के बाद ही रिलीज़ हो सकी. दरअसल, कमलेश्वर द्वारा लिखी गई इस फ़िल्म की नायिका की ज़िंदगी इंदिरा गांधी की ज़िंदगी से मिलती जुलती है. नायिका आरती एक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ की बेटी है. वह होटल व्यवसायी जेके से प्रेम करती है. उसके पिता अपनी आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षा की वजह से बेटी को भी इसी राह पर ले जाना चाहते हैं. आरती और जेके की शादी हो जाती है, लेकिन पिता के दबाव और अपनी महत्वकांक्षा की वजह से वह सियासत में आ जाती है. वह पति का घर छोड़कर पिता के पास लौट आती है. बरसों बाद दोनों फिर मिलते हैं. लेकिन हालात ऐसे बनते हैं कि दोनों को फिर से अलग होना पड़ता है. गुलज़ार ने छोटे पर्दे के दर्शकों के लिए 1988 में मिर्ज़ा ग़ालिब और 1993 में किरदार नामक टीवी धारावाहिक बनाए, जिन्हें बहुत पसंद किया गया. इसके अलावा उन्हें 1983 में आरडी बर्मन और आशा भोसले के साथ दिल पड़ोसी है नामक एलबम निकाली. इसके बाद 1999 में जगजीत सिंह की आवाज़ में मरासिम, 2001 में ग़ुलाम अली की आवाज़ में विसाल और फिर 2003 में आबिदा सिंग्स कबीर एल्बम निकाली. फ़िल्म मौसम में दिल ढूंढता है फिर वही फ़ुर्सत के रात-दिन जैसे गीत लिखने वाले गुलज़ार आज भी कजरारे-कजरारे जैसे गीत लिख रहे हैं, जिन पर क़दम ख़ुद ब ख़ुद थिरकने लगते हैं. गुलज़ार त्रिवेणी छंद के सृजक हैं. उनके दो त्रिवेणी संग्रह त्रिवेणी और पुखराज नाम से प्रकाशित हो चुके हैं. उनकी अन्य कृतियों में चौरस रात, एक बूंद चांद, रावी पार, रात चांद और मैं, रात पश्मीने की, ख़राशें, कुछ और नज़्में, छैंया-छैंया, मेरा कुछ सामान और यार जुलाहे शामिल हैं. गुलज़ार को 2002 में साहित्य अकादमी अवॉर्ड दिया गया. इसके बाद 2004 में उन्हें पद्म भूषण से नवाज़ा गया. इसके अलावा उन्हें पांच राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और 19 फिल्म फेयर पुरस्कारों सहित अन्य कई और पुरस्कार भी मिल चुके हैं. गुलज़ार की निजी ज़िंदगी में कई उतार- चढ़ाव आए. 1973 में उन्होंने अभिनेत्री राखी से शादी की. वह नहीं चाहते थे कि राखी फ़िल्मों में काम करें. उनका रिश्ता लंबे अरसे तक नहीं चला. जब उनकी बेटी मेघना डेढ़ साल की थी, तभी वे अलग हो गए. मगर उन्होंने तलाक़ नहीं लिया. गुलज़ार मानते हैं कि कोई भी रिश्ता न तो कभी ख़त्म होता है, और न मरता है. शायद इसलिए ही उनका रिश्ता आज भी क़ायम है. वह कहते हैं:-
हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते…

राखी ने अपनी ज़िंदगी का ख़ालीपन भरने के लिए फ़िल्मों में काम शुरू कर दिया और गुलज़ार अपने काम में मसरूफ़ हो गए. गुलज़ार मानते हैं कि ज़िंदगी बरसों से नहीं, बल्कि लम्हों से बनती है. इसलिए इंसान को अपनी ज़िंदगी के हर लम्हे को भरपूर जीना चाहिए. उन्हें अपने अकेलेपन से भी कभी कोई शिकवा नहीं रहा. वह कहते हैं:-
जब भी यह दिल उदास होता है
जाने कौन आस-पास होता है
होंठ चुपचाप बोलते हों जब
सांस कुछ तेज़-तेज़ चलती हो
आंखें जब दे रही हों आवाज़ें
ठंडी आहों में सांस जलती हो… 
(स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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