अल्लाह तू ही तू...


मेरे मौला
मुझे तेरी दोज़ख़ का ख़ौफ़ नहीं
और ना ही
तेरी जन्नत की कोई ख़्वाहिश है
मैं सिर्फ़ तेरी इबादत ही नहीं करती
तुझसे मुहब्बत भी करती हूं
मुझे फ़िरदौस नहीं, मालिके-फ़िरदौस चाहिए
क्यूंकि
मेरे लिए तू ही काफ़ी है
अल्लाह तू ही तू...
-फ़िरदौस ख़ान

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2 Response to "अल्लाह तू ही तू..."

  1. संजय भास्‍कर says:
    4 अप्रैल 2015 को 10:16 am

    कविता ने मन को बाँध लिया .. क्या खूब लिखा है .. अंतिम पंक्तियों ने जादू कर दिया है :)
    क्यूंकि
    मेरे लिए तू ही काफ़ी है
    अल्लाह तू ही तू...

  2. Kavita Rawat says:
    4 अप्रैल 2015 को 7:24 pm

    बहुत खूब!

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