एक कप चाय...


बात उन दिनों की है, जब हम दसवीं में पढ़ रहे थे... इम्तिहान नज़दीक थे... इसलिए सुबह चार बजे उठकर पढ़ा करते थे... घर दो मंज़िला और काफ़ी बड़ा था... एक कमरा और एक रसोई किराये पर दे दी थी... किरायेदार एक विधवा महिला थीं... नाम था संतो देवी... उनके दो बच्चे उनके साथ रहते थे और एक बड़ा दस साल का बेटा उनके जेठ के पास रहता था... हम उन्हें आंटी कहा करते थे... वह किसी गांव में सरकारी स्कूल में चपरासी थीं... यह नौकरी उन्हें उनके पति की मौत के बाद मिली थी... पहले उनके पति इस पद पर कार्यरत थे... गांव काफ़ी दूर था... उन्हें बस से जाना होता था... इसलिए वह सुबह साढ़े तीन बजे उठ जाया करती थीं और बच्चों के लिए दोपहर का खाना बनाकर रख दिया करती थीं...
उनके घर गौशाला से गाय का दूध आता था... आंटी हमें पढ़ते हुए देखतीं, तो एक कप चाय हमारी मेज़ पर रख जाया करती थीं... कहती कुछ नहीं थीं... क्योंकि वह कभी पढ़ते वक़्त हमें टोकती नहीं थीं... हमें गाय का दूध कभी अच्छा नहीं लगा... हालांकि गाय का दूध बहुत फ़ायदेमंद होता है... आंटी की चाय क्या होती थी, निरा दूध ही होता था चाय पत्ती डला हुआ... हम लिहाज़ में चाय पी लेते... सोचते कि वो इतने प्यार से लाई हैं, क्यों मना करके उनका दिल दुखाएं... रफ़्ता-रफ़्ता हमें गाय के दूध की चाय की आदत पड़ गई... यह सिलसिला काफ़ी वक़्त तक चला... बाद में हमने दूसरा घर ले लिया और आंटी भी कहीं और चली गईं... आज भी जब कभी चाय का ज़िक्र होता है, तो गाय के दूध की चाय याद आ जाती है... और आंटी का स्नेह भी... 
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1 Response to "एक कप चाय..."

  1. Neetu Singhal says:
    5 जनवरी 2014 को 4:11 pm

    जब पाठशाला में मेरा प्रवेश हुवा तब एक जुड़वा लडकियां भी में सहपाठी एवं मित्र थीं धीरे धीरे हैम सातवीं कशा में पहुँच गए । एक दिन जब हैम पाठ्य पूसक में एक हिंदी कविता का अध्ययन कर रहे थे तब उनमें से एक ने खा ये कवी मेरे दादा जी हैं, मैने कहा अच्छा ? उसने कहा हमारे ही साथ रहते हैं मैने कहा अच्छा अच्छा !! फि उसने खा चाहो तो शिक्षक से पूछ लो ।
    जब मैने शिक्षक से पूछा तो उनहोंने खा हाँ ये कवी इनके दादा जी हैं तब मैने उससे कहा चलो उनको देखके आते हैं देखा ! वे सुपसिद्ध विख्यात कवि मुकुटधर पाण्डे थे.....

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