यक़ीन...


यक़ीन एक ऐसी चीज़ है, अगर डाकू पर कर लिया जाए, तो वो भी मुहाफ़िज़ नज़र आता है... और यक़ीन न हो, तो मुहाफ़िज़ पर भी शुबा होता है...
बच्चे को हवा में उछालो, तो वो चीख़ने-चिल्लाने की बजाय खिलखिलाकर हंसता है, क्योंकि उसे यक़ीन होता है कि उसे उछालने वाला उसे गिरने नहीं देगा, उसे थाम लेगा...
इंसान की बातें यक़ीन पैदा करती हैं, और यक़ीन को ख़त्म भी कर देती हैं... किसी के दिल में अपने लिए यक़ीन पैदा करना बड़ी बात है...
(हमारी एक कहानी से)

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1 Response to "यक़ीन..."

  1. राजेंद्र कुमार says:
    14 मई 2015 को 9:34 am

    आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (15.05.2015) को "दिल खोलकर हँसिए"(चर्चा अंक-1976) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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