मौसम दहक रहा है...
मौसम दहक रहा है...
आसमान से
आग बरसाती
सूरज की तेज़ किरणें...
बदन को
और झुलसाते
लू के गरम झोंके...
गुलमोहर की
शाखों पर दहकते
फूलों के सुर्ख़ गुच्छे...
सूनी गलियों में
बंजारन ख्वाहिशों-सी
भटकती आवारा दोपहरें...
दूधिया चांदनी में
मोगरा-सी महकती
सुलगती रातें...
मौसम दहक रहा है...
-फ़िरदौस ख़ान
आसमान से
आग बरसाती
सूरज की तेज़ किरणें...
बदन को
और झुलसाते
लू के गरम झोंके...
गुलमोहर की
शाखों पर दहकते
फूलों के सुर्ख़ गुच्छे...
सूनी गलियों में
बंजारन ख्वाहिशों-सी
भटकती आवारा दोपहरें...
दूधिया चांदनी में
मोगरा-सी महकती
सुलगती रातें...
मौसम दहक रहा है...
-फ़िरदौस ख़ान










16 अप्रैल 2010 8:04 pm
मौसम वाकई दहक रहा है
सूरज की गर्मी से कम पर ---
सुन्दर रचना
16 अप्रैल 2010 8:22 pm
सुंदर कविता है।
पर इस दहकते मौसम में और भी बहुत कुछ है जो छूट गया है।
16 अप्रैल 2010 8:33 pm
bahut achchhe shabd chitra
16 अप्रैल 2010 9:13 pm
bahut achi nazm hai likhte raho
16 अप्रैल 2010 9:25 pm
फ़िरदौस.....यह कविता बहुत अच्छी लगी..... आपने शब्दों से बहुत अच्छे से गूंथा है.....
16 अप्रैल 2010 9:28 pm
nice
16 अप्रैल 2010 9:33 pm
hamesha kee tarah ek aur sunder rachana..............
16 अप्रैल 2010 9:33 pm
dudhiya chaandni me
mogra si mehkati
sulagti raate,
or
mosam bhi dahak raha hai!
garmi ke siwaay bahut kuchh or bhi bataati aap ki ye rachna!
kunwar ji,
16 अप्रैल 2010 10:33 pm
सूनी गलियों में...बजारन ख़्वाहिशों सी
भटकती आवारा दोपहरें.............
बहुत खूब.....
बस ऐसे ही लिखते रहें......
16 अप्रैल 2010 10:39 pm
बहुत खूब फिरदौस जी ! बहुत ही सुन्दर भाव और बहुत ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति ! आपकी शैली मन मोह गयी !
http://sudhinama.blogspot.com
http://sadhanavaid.blogspot.com
17 अप्रैल 2010 7:14 am
लू , गुलमोहर , सूनी सड़के ...सुलगती रातें ...
मौसम के दहकने का और क्या प्रमाण चाहिए ...!!
सुन्दर अभिव्यक्ति ...!!
17 अप्रैल 2010 12:24 pm
मौसम में तो लग रहा है कि दावानल उतर आया है। मनुष्य का सारा गुस्सा ही सूरज में समा गया है। अच्छी कविता, बधाई।
17 अप्रैल 2010 3:45 pm
बहुत सुन्दर भाव पिरोये हैं।
17 अप्रैल 2010 4:31 pm
nice abhivykti..