मौसम दहक रहा है...

मौसम दहक रहा है...

आसमान से
आग बरसाती
सूरज की तेज़ किरणें...

बदन को
और झुलसाते
लू के गरम झोंके...

गुलमोहर की
शाखों पर दहकते
फूलों के सुर्ख़ गुच्छे...

सूनी गलियों में
बंजारन ख्वाहिशों-सी
भटकती आवारा दोपहरें...

दूधिया चांदनी में
मोगरा-सी महकती
सुलगती रातें...
मौसम दहक रहा है...
-फ़िरदौस ख़ान
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14 Response to "मौसम दहक रहा है..."

  1. M VERMA says:
    16 अप्रैल 2010 को 8:04 pm

    मौसम वाकई दहक रहा है
    सूरज की गर्मी से कम पर ---
    सुन्दर रचना

  2. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi says:
    16 अप्रैल 2010 को 8:22 pm

    सुंदर कविता है।
    पर इस दहकते मौसम में और भी बहुत कुछ है जो छूट गया है।

  3. bhartiya nagrick says:
    16 अप्रैल 2010 को 8:33 pm

    bahut achchhe shabd chitra

  4. mohd maqsud inamdar says:
    16 अप्रैल 2010 को 9:13 pm

    bahut achi nazm hai likhte raho

  5. महफूज़ अली says:
    16 अप्रैल 2010 को 9:25 pm

    फ़िरदौस.....यह कविता बहुत अच्छी लगी..... आपने शब्दों से बहुत अच्छे से गूंथा है.....

  6. Suman says:
    16 अप्रैल 2010 को 9:28 pm

    nice

  7. Apanatva says:
    16 अप्रैल 2010 को 9:33 pm

    hamesha kee tarah ek aur sunder rachana..............

  8. kunwarji's says:
    16 अप्रैल 2010 को 9:33 pm

    dudhiya chaandni me
    mogra si mehkati
    sulagti raate,
    or
    mosam bhi dahak raha hai!
    garmi ke siwaay bahut kuchh or bhi bataati aap ki ye rachna!

    kunwar ji,

  9. शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' says:
    16 अप्रैल 2010 को 10:33 pm

    सूनी गलियों में...बजारन ख़्वाहिशों सी
    भटकती आवारा दोपहरें.............
    बहुत खूब.....
    बस ऐसे ही लिखते रहें......

  10. Sadhana Vaid says:
    16 अप्रैल 2010 को 10:39 pm

    बहुत खूब फिरदौस जी ! बहुत ही सुन्दर भाव और बहुत ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति ! आपकी शैली मन मोह गयी !
    http://sudhinama.blogspot.com
    http://sadhanavaid.blogspot.com

  11. वाणी गीत says:
    17 अप्रैल 2010 को 7:14 am

    लू , गुलमोहर , सूनी सड़के ...सुलगती रातें ...
    मौसम के दहकने का और क्या प्रमाण चाहिए ...!!

    सुन्दर अभिव्यक्ति ...!!

  12. ajit gupta says:
    17 अप्रैल 2010 को 12:24 pm

    मौसम में तो लग रहा है कि दावानल उतर आया है। मनुष्‍य का सारा गुस्‍सा ही सूरज में समा गया है। अच्‍छी कविता, बधाई।

  13. वन्दना says:
    17 अप्रैल 2010 को 3:45 pm

    बहुत सुन्दर भाव पिरोये हैं।

  14. neelima garg says:
    17 अप्रैल 2010 को 4:31 pm

    nice abhivykti..

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