तुम्हारे लिए...


मैं अकसर सोचती हूं
तुम्हारे लिए
एक गीत लिखूं
आसमान के काग़ज़ पर
चांदनी की रौशनाई से
मगर
मेरे जज़्बात के मुक़ाबिल
हर शय छोटी पड़ जाती है
इस कायनात की...
-फ़िरदौस ख़ान
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6 Response to " तुम्हारे लिए..."

  1. Parul says:
    8 अगस्त 2008 को 3:17 pm

    bahut badhiyaa...pyaari nazm

  2. आशीष कुमार 'अंशु' says:
    8 अगस्त 2008 को 4:16 pm

    आते ही आप तो छा गई. कुछ ही दिन पहले आपका संदेश मिला आपने एक ब्लॉग बनाया है. और इतने कम दिनों में इतनी सारी रचनाएं लिख मारी.
    आपकी सक्रियता यहाँ बनी रहे, मेरी शुभकामनाएं

  3. मीत says:
    8 अगस्त 2008 को 5:17 pm

    क्या बात है. बहुत ख़ूब.

  4. Manish Kumar says:
    8 अगस्त 2008 को 8:53 pm

    sundar..prem ko kitne hi shabson mein vyakta kiya jaye kam hi padega

  5. Udan Tashtari says:
    8 अगस्त 2008 को 9:52 pm

    बहुत बढिया.

  6. मोहन वशिष्‍ठ says:
    10 अगस्त 2008 को 3:45 pm

    वाह फिरदौस जी बचपन याद दिला दिया क्‍योंकि हम चांदनी रोशनाई नाम से काली स्‍याही मिलती थी 25 पैसे की पुडिया वही यूज किया करते थे बहुत खूब

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