हमसफ़र


हमसफ़र
कहने को
महज़ एक लफ्ज़ है
लेकिन
इसमें छुपी हैं
दो धड़कते जवां दिलों की
कितनी ही उमंगें, ख़्वाहिशें
और तमन्नाएं
जिनके सहारे
इंसान
दुनिया की भूल-भूलैया में
कितनी ही दिक्क़तों को
झेलते हुए
आगे बढ़ जाता है
अपनी उस मंज़िल की चाह में
जिसके इंद्रधनुषी सपने
उसने संजोए हैं
बचपन से जवानी तक
या शायद
हसरतों के आखिरी लम्हे तक
मगर
कितना मुश्किल होता है
अपने ख्यालात, अपने अहसासात को
मुजस्सम करना
शायद
दो धड़कते जवां दिलों की इंतिहा
हमेशा
तड़पते रहने में ही है...
-फ़िरदौस ख़ान
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4 Response to "हमसफ़र"

  1. प्रभाकर पाण्डेय says:
    7 अगस्त 2008 को 7:05 pm

    हमसफ़र
    कहने को
    महज़ एक लफ्ज़ है
    लेकिन
    इसमें छुपी हैं
    दो धड़कते जवां दिलों की
    कितनी ही उमंगें, ख़्वाहिशें
    और तमन्नाएं
    जिनके सहारे
    इंसान
    दुनिया की भूल-भूलैया में
    कितनी ही दिक्क़तों को
    झेलते हुए
    आगे बढ़ जाता है

    -------
    सुंदरतम और यथार्थ। सटीक रचना।

  2. Udan Tashtari says:
    7 अगस्त 2008 को 7:09 pm

    वाह! बहुत सुन्दर.बहुत बधाई.

  3. मोहन वशिष्‍ठ says:
    7 अगस्त 2008 को 7:50 pm

    वाह फिरदौस जी अच्‍छा लिखा आपने बधाई हो और फिरदौस जी कभी हमारे ब्‍लाग पर भी नजरें इनायत करो आप ही कहते थे कि हम नहीं सुधरेंगे देखो अब सुधर गए हैं

    http://mohankaman.blogspot.com

  4. फ़िरदौस खान says:
    8 अगस्त 2008 को 9:37 am

    आपका ब्लॉग देखा...बहुत अच्छा है...अपने शौक को ज़िन्दा रखना चाहिए...

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