ज़िन्दगी


हमने ज़िन्दगी में जो चाहा वह नहीं मिला, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा मिला. ज़मीन चाही, तो आसमान मिला... इतना मिला कि अब कुछ और चाहने की 'चाह' ही नहीं रही.

* ज़िन्दगी में ऐसा भी मुक़ाम आया करता है, जब इंसान जद्दो-जहद करके थक जाता है. उसकी ख़्वाहिशें दम तोड़ देती हैं. उम्मीद का दिया बुझ जाता है. फिर उसे ज़िन्दगी में कुछ भी अच्छा होने की कोई आस नहीं रहती.

* इंसान को संघर्ष अकेले करना पड़ता है. नाकामी का दर्द भी अकेले ही सहना पड़ता है. लेकिन जब कामयाबी मिल जाती है, तो उसे बांटने के लिए सब आ जाते हैं. यही दुनिया का दस्तूर है.


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