मेरे मसीहा...

कुछ लोग घने नूरे-इलाही की मानिंद हुआ करते हैं... उनसे मिलकर ज़िन्दगी के अंधेरे छंट जाया करते हैं... हमारी ज़िन्दगी में भी एक ऐसी ही रूहानी हस्ती शरीक हुई है... उन्हें समर्पित एक नज़्म...

मेरे मसीहा...
मेरे अज़ीज़, मेरे मसीहा
सोचती हूं
तुम्हें किस किस तरह पुकारूं

मेरे मसीहा
तुम्हारी रफ़ाक़त के साये में
मेरी बेचैन रूह सुकून पाती है...

तुम्हारी गुफ़्तगू की ख़ुशबू से
दिलो-दिमाग़ महक उठते हैं...

तुम्हारी अक़ीदत के नूर से
मेरी ज़िन्दगी रौशन है...

तुम पर हमेशा
अल्लाह की रहमत बरसती रहे
और
अज़ल से अबद तक
मैं तुम्हारे ज़ेरे-साये में रहूं...
-फ़िरदौस ख़ान

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