फ़ितरत


इंसान की फ़ितरत कभी नहीं बदलती. वो जैसा होता है, वैसा ही रहता है.
एक शहज़ादी थी. उसे एक ऐसे लड़के से मुहब्बत हो गई, जो फटे-पुराने कपड़े पहने यहां-वहां घूमता रहता था. किसी ने कुछ खाने को दे दिया, तो खा लिया. शहज़ादी अकसर उसे देखती. उसे लड़के से हमदर्दी हो गई, जो बाद में मुहब्बत बन गई. शहज़ादी ने उस लड़के से शादी कर ली. उसे पहनने के लिए एक से एक अच्छे कपड़े दिए. खाने के लिए एक से बढ़कर एक पकवान दिए.
लेकिन शादी के बाद से लड़का दुबला होने लगा. शहज़ादी बहुत परेशान हो गई. उसने बड़े-बड़े हकीमों को उसे दिखाया, लेकिन लड़के की कमज़ोरी दिनोदिन बढ़ती चली जा रही थी. एक रोज़ वज़ीर ने शहज़ादी से कहा कि मैं लड़के का इलाज कर सकता हूं, लेकिन मैं जैसा कहूंगा, वैसा ही करना होगा. शहज़ादी मान गई. महल में जगह-जगह उस तरह का खाना रख दिया गया, जैसा वो शादी से पहले खाता था. कुछ ही दिनों में लड़का फिर से तंदुरुस्त हो गया.
शहज़ादी ने वज़ीर से इसकी वजह पूछी, तो उसने कहा कि इंसान की फ़ितरत कभी नहीं बदलती. इसे दिनभर रूखा-सूखा खाने की आदत थी और आप इसे भरपेट लज़ीज़ पकवान खिलाती थीं.
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1 Response to "फ़ितरत"

  1. Madhulika Patel says:
    17 जनवरी 2016 को 1:58 pm

    बहुत सही बात है फिरदौस जी इन्सान की फितरत कभी नहीं बदलती ।

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