ततैया...


-फ़िरदौस ख़ान
उन्सियत किसी से भी हो सकती है, एक ततैये से भी... हम परिन्दों के लिए मिट्टी के कूंडे में पानी रखते हैं... सुबह कूंडे में पाने डालने के लिए आंगन में जाते, तो देखते कि एक ततैया कूंडे के किनारे पर बैठा पानी पी रहा है... हम उसे देखकर पीछे हट जाते कि कहीं वह हमें देखकर उड़ न जाए, कहीं प्यासा न रह जाए... आए-दिन ऐसा होता है...
एक सुबह हम पानी डालने के लिए गए, तो देखा कि कूंडे के पास एक ततैया पड़ा है... हमने उसे छुआ तो, मालूम हुआ कि वह मर चुका है... उसे देखकर दुख हुआ... हमने उसे गमले की मिट्टी में दबा दिया... उस दिन न जाने क्यूं दिल उदास रहा... पूरा दिन काम में दिल नहीं लगा... शाम को चिड़ियों के लिए दाना डालने गए, तो देखा कि एक ततैया कूंडे के किनारे बैठा पानी पी रहा है... उसे देख कर इतनी ख़ुशी हुई, मानो बरसों की कोई मुराद पूरी हो गई हो... हमारी उदासी अब ख़ुशी में बदल चुकी थी...
अब कई ततैये पानी पीने आते हैं, उन्हें देखकर बहुत अच्छा लगता है... हम कभी ततैयों को उड़ाते नहीं हैं. उन्होंने कभी हमें नुक़सान नहीं पहुंचाया... शायद वे भी हमसे उन्सियत रखते हैं...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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3 Response to "ततैया..."

  1. राजेंद्र कुमार says:
    22 अक्तूबर 2015 को 6:10 pm

    आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (23.10.2015) को "शुभ संकल्प"(चर्चा अंक-2138) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
    विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

  2. Anita says:
    23 अक्तूबर 2015 को 8:54 am

    जर्रे जर्रे में एक उसी अल्लाह का नूर बसा है..ततैयों में भी...

  3. राजेंद्र कुमार says:
    24 अक्तूबर 2015 को 1:08 pm

    बहुत ही सुन्दर और बेहतरीन प्रस्तुति, आभार आपका।

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