समर्पण


जहां मुहब्बत होती है, वहां समर्पण होता है... अगर समर्पण न हो, तो वो मुहब्बत हो ही नहीं सकती... हां, वक़्ती तौर का आकर्षण ज़रूर हो सकता है... अकसर लोग आकर्षण को मुहब्बत समझ बैठते हैं... और जब मुहब्बत यानी आकर्षण ख़त्म होने लगता है, तो इल्ज़ाम तराशी का सिलसिला शुरू हो जाता है...
मुहब्बत करने वाला अपने महबूब के लिए अपनी ज़िन्दगी क़ुर्बान कर देगा, लेकिन उसके नाम पर हर्फ़ नहीं आने देगा, यही मुहब्बत है...
फ़िल्म ’बिन फेरे हम तेरे’ का इन्दीवर का लिखा ये नग़मा समर्पण के जज़्बे से सराबोर है...
सजी नहीं बारात तो क्या
आई ना मिलन की रात तो क्या
ब्याह किया तेरी यादों से
गठबंधन तेरे वादों से
बिन फेरे हम तेरे...
तन के रिश्ते टूट भी जाएं
टूटे ना मन के बंधन
जिसने दिया मुझको अपनापन
उसी का है ये जीवन
बांध लिया मन का बंधन
जीवन है तुझ पर अर्पण
सजी...
तूने अपना मान लिया है
हम थे कहां इस क़ाबिल
जो अहसान किया जान देकर
उसको चुकाना मुश्किल
देह बनी ना दुल्हन तो क्या
पहने नहीं कंगन तो क्या
सजी...
जिसका हमें अधिकार नहीं था
उसका भी बलिदान दिया
भले बुरे को हम क्या जाने
जो भी किया तेरे लिए किया
लाख रहें हम शर्मिन्दा
मगर रहे ममता ज़िन्दा
सजी...
आंच ना आए नाम पे तेरे
ख़ाक भले ये जीवन हो
अपने जहां में आग लगा दें
तेरा जहां जो रौशन हो...
तेरे लिए दिल तोड़ लें हम
दिल तो क्या जग छोड़ दें हम
सजी...
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ऐसे और भी गीत हैं... आपको याद हैं... ?
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