... और वो चली गई


कई साल पहले हमारे एक शनासा ने दिल्ली का एक क़िस्सा सुनाया था... आज न जाने क्यूं याद आ गया...
एक लड़का था और एक लड़की... लड़का बिहार का रहने वाला था... लड़की झारखंड की थी... दोनों में प्यार था, जैसा बताया गया... हुआ यूं कि एक रोज़ दोनों कहीं से आ रहे थे... लड़का मोटर साइकिल चला रहा था और लड़की उसके पीछे बैठी थी... जिस तरह लड़की ने उस लड़के को अपनी बांहों की गिरफ़्त में लिया हुआ था, उससे साफ़ ज़ाहिर था कि दोनों में मुहब्बत है...
रात का वक़्त था और सर्दियों का मौसम... हमारे शनासा अपने दोस्त के साथ सड़क किनारे खड़े बात कर रहे थे... तभी अचानक एक गाड़ी ने मोटर साइकिल को टक्कर मार दी... मोटर साइकिल घिसटते हुए दूर जा गिरी... लड़के को बहुत ज़्यादा चोट आई थी... वो सड़क पर बेसुध पड़ा था... चोट लड़की को भी चोट आई थी, लेकिन शायद उसे ज़्यादा चोट नहीं लगी थी... जल्द ही वह उठ बैठी और अपने कपड़े झाड़ते हुए उसने एक ऒटो को इशारा करके रोका... फिर उसमें बैठकर चली गई... उसने नज़र भरकर भी लड़के को नहीं देखा कि वह ज़िन्दा भी है या नहीं... बस उसे जाने की जल्दी थी और इस बात की फ़िक्र कि कहीं कोई उसे न देख ले...
हमारे शनासा ये सब देख रहे थे... उन्होंने अपने दोस्त की मदद से उसे अस्पताल पहुंचाया... कुछ और लोगों ने भी उनकी मदद की... उन्होंने लड़के के परिचितों को फ़ोन किया... लड़के के पैर में फ़्रेक्चर हो गया था... उस लड़के ने ही उन्हें बताया कि वह उस लड़की से प्यार करता है... उसे इस बात का दुख था कि लड़की उसे ज़ख़्मी हालत में सड़क पर पड़ा छोड़कर चली गई...

सोचते हैं, ये कैसी मुहब्बत है, जो अपने महबूब को ज़ख़्मी हालत में सड़क पर छोड़ कर चली जाए...
हम तो इसे मुहब्बत क़तई नहीं कहेंगे...

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1 Response to "... और वो चली गई"

  1. राजेंद्र कुमार says:
    16 अक्तूबर 2014 को 9:26 pm

    आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (17.10.2014) को "नारी-शक्ति" (चर्चा अंक-1769)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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