जाड़ो की दस्तक


अल सुबह से ठंडी हवाएं चल रही हैं... गोया जाड़ो ने हौले से दस्तक दी हो और गर्मियों के मौसम से चुपके से कहा हो-
गर्मी के मौसम ! अब विदा लो और कुछ देर हमें भी ठहरने दो... तुम फिर आ जाना, वैसे भी तुम ही ज़्यादा डेरा डाले रहते हो... बरसात के मौसम में भी तुम्हारा ही जलवा क़ायम रहता है... मगर अब हम आ गए हैं, दिवाली की रौनक़ लेकर, क्रिसमस के तोहफ़े लेकर और नये साल की सौग़ात लेकर...
विदा गर्मियो के प्यारे मौसम ! अगले साल फिर मिलेंगे... उदास मत होना, बस कुछ ही माह की बात है, फ़रवरी तक का ही तो इंतज़ार है... मार्च में फिर तुम्हारे साथ होंगे..
-फ़िरदौस ख़ान
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मिट्टी के दिये

बचपन से ही दिवाली का त्यौहार मन को बहुत भाता है. दादी जान दिवाली की रात में मिट्टी के दीये जलाया करती थीं. घर का कोई कोना ऐसा नहीं होता था, जहां दियों की रौशनी न हो. हम भाई-बहन आतिशबाज़ी ख़रीद कर लाते, पटाख़े, अनार, फुलझड़ियां वग़ैरह-वग़ैरह. घर में खील, बताशे और मिठाइयां भी ख़ूब आतीं.

वक़्त गुज़रता गया. आतिशबाज़ी का मोह जाता रहा, लेकिन दियों से रिश्ता क़ायम रहा. हर बरस हम दिवाली पर बाज़ार से मिट्टी के दिये लाते हैं. दिन में उनमें पानी भरकर रख देते हैं. शाम में उनमें सरसों का तेल भरकर उन्हें रौशन करते हैं. अपनी दादी जान की ही तरह हम भी घर के हर गोशे में दिये रखते हैं.  पहला दीया घर की चौखट पर रखते हैं. फिर आंगन में, कमरों में, ज़ीने पर, छत पर और मुंडेरों पर दिये रखते हैं.

अमावस की रात में आसमान में तारे टिमटिमा रहे होते हैं, और ज़मीन पर मिट्टी के नन्हे दिये रौशनी बिखेर रहे होते हैं.
मिट्टी के इन नन्हे दियों के साथ हमने अपनी अक़ीदत का भी एक दिया रौशन किया है.
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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पूरे चांद की रात

आज पूरे चांद की रात है... हमेशा की तरह ख़ूबसूरत... इठलाती हुई... अंगनाई में खिले सफ़ेद फूल अपनी भीनी-भीनी महक से माहौल को और रूमानी बना रहे हैं... नींद आंखों से कोसों दूर है... पिछले कई दिन से उनसे मुलाक़ात नहीं हुई... चांद आसमान में मुस्करा रहा है...उसकी दूधिया चांदनी अंगनाई में बिखरी हुई है... शाख़ें हवा से झूम रही हैं... गर्मी के मौसम के बावजूद हवा में ठंडक है... बादलों के दूधिया टुकड़े आसमान में कहीं-कहीं तैर रहे हैं... लेकिन जिन्हें दिल ढूंढ रहा है, बस वही नहीं हैं...
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