काश ! कोई हातिम ताई मिल जाता...


फ़िरदौस ख़ान
अकसर अच्छा काम करने पर भी ताने सुनने को मिलते हैं... मसलन हातिम ताई बनने की क्या ज़रूरत थी, इतना सख़ी होना भी अच्छा नहीं होता, व़गैरह-वग़ैरह...

कुछ माह पहले की बात है. हम बस में सफ़र कर रहे थे. पीरागढ़ी से एक बुज़ुर्ग औरत बस में चढ़ी. बस पूरी खचाखच भरी हुई थी. वह हमारी सीट के पास आकर खड़ी हो गई. हमने उससे पूछा कि कहां जाना है, तो उसने बताया कि हमने उस औरत को अपनी सीट दे दी और ख़ुद वहीं खड़े हो गए.
उस औरत ने पूछा कि तुम्हें उतरना है.
हमने कहा- नहीं.
फिर बोली- कहां जा रही हो?
हमने कहा- रोहतक.
उसने कहा कि रोहतक तो बहुत दूर है, फिर अपनी सीट क्यों दे दी, तुम बैठ जाओ.
हमने बैठने से इंकार कर दिया और कहा- आपको देखकर हमें अपनी अम्मी याद आ गईं. अगर उन्हें भी आपकी तरह सीट की ज़रूरत होती, तो क्या हम उन्हें सीट न देते. इस पर वह मुस्कराने लगी और हमें ढेर सारा आशीष दिया...  ख़ैर, बहादुरगढ़ में कंडक्टर ने हमें अपनी सीट दे दी और हम आराम से अपनी मंज़िल तक पहुंच गए...

इसी तरह पिछले दिनों हम अपने परिवार के साथ महरौली गए थे. बस में एक दंपत्ति चढ़ा. औरत के हाथ में कुछ सामान था, जबकि मर्द एक छोटे बच्चे को गोद में लिए हुए था और उसके हाथ में भी एक थैला था. औरत बीमार लग रही थी. हमारे भाई ने उस औरत को अपनी सीट दे दी. हमने उस शख़्स से कहा कि वह हमारी सीट पर बैठ जाए. पहले तो वह अजीब नज़रों से देखने लगा, जैसे किसी ने उसके साथ मज़ाक़ किया हो. सवारियां भी हमें अजीब नज़रों से देख रही थीं, क्योंकि हमने एक मर्द के लिए अपनी सीट छोड़ दी थी. लेकिन हमारे दोबारा कहने पर वह बैठ गया.
बाद में भाभी ने कहा कि हातिम ताई बनने की क्या ज़रूरत थी. हम भी तो थके हुए थे और सीट की हमें भी ज़रूरत थी. हमारी सहेलियां भी अकसर इसी तरह हमारा मज़ाक़ उड़ाती हैं.

दरअसल, मैट्रो या बस में सफ़र करते वक़्त लेडीज़ सीट पर अगर कोई बुज़ुर्ग शख़्स बैठा हो, तो हम कभी भी उसे नहीं उठाते... अगर वह ख़ुद भी सीट देने की कोशिश करे, तो हम मना कर देते हैं... हम अगर लेडीज़ या सामान्य सीट पर बैठे हैं, और ऐसा कोई शख़्स आ जाए, जिसे सीट की हमसे ज़्यादा ज़रूरत हो, तो हम अपनी सीट उसे दे देते हैं. वो चाहे औरत हो या फिर मर्द...

कभी तबीयत ठीक न हो और सीट भी न मिले, तो बहुत परेशानी होती है... सोचते हैं, काश !  कोई हातिम ताई मिल जाता... :)
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

तस्वीर गूगल से साभार
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2 Response to "काश ! कोई हातिम ताई मिल जाता... "

  1. Anita says:
    9 जुलाई 2015 को 12:54 pm

    बहुत खूब..

  2. Madhulika Patel says:
    15 जुलाई 2015 को 1:09 am

    जी हाँ अआजके समय में मदद करने वाले का भी मजाक बन जाता है |

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