कला, साहित्य और संस्कृति को समर्पित एक पत्रिका


फ़िरदौस ख़ान
कला, साहित्य और संस्कृति किसी भी देश और समाज की पहचान हुआ करती हैं. इसके बिना कोई भी समाज अपने वजूद का तसव्वुर तक नहीं कर सकता. भले ही आज बाज़ार का दौर है. हर चीज़ पर बाज़ार का असर दिखता है, वो चाहे अख़बार हों या पत्रिकाएं. लेकिन ये ख़ुशनुमा बात है कि बाज़ारवाद के माहौल में भी  कला, साहित्य और संस्कृति में रची-बसी पत्रिकाएं शाया हो रही हैं. कला, साहित्य और संस्कृति को समर्पित ऐसी ही एक पत्रिका है ’मानव संस्कृति’, जो तहज़ीब की सरज़मीं लखनऊ से शाया हो रही है. पिछले साल दिसंबर में शुरू हुई इस पत्रिका के दो अंक शाया हो चुके हैं और तीसरा अंक ‘सृजन शक्ति विशेषांक’ आने वाला है, जो भारतीय महिला कलाकारों पर केंद्रित है. क़ाबिले-ग़ौर है कि इस पत्रिका के प्रकाशन से कलाकार दम्पति का जुड़ाव है. शीला शर्मा फ़ुट आर्टिस्ट हैं और सुधीर शर्मा मूर्तिकार, चित्रकार व कला समीक्षक हैं. शीला शर्मा प्रकाशक होने के साथ-साथ पत्रिका की संपादक भी हैं.

पत्रिका के वजूद में आने की दास्तां बयां करते हुए राजीव शर्मा जी कहते हैं, काफ़ी समय से हम सभी हिन्दी भाषा में दृश्यकलाओं पर एक ऐसी पत्रिका की ज़रूरत महसूस कर रहे थे, जिसमें समकालीन और परंपरागत, दोनों ही कलारूपों का समुचित समावेश हो. साथ ही साथ रंगमंच, संगीत, नृत्य और साहित्य भी उस पत्रिका का ज़रूरी हिस्से के रूप में स्थापित दिखे. आज के दौर में ऐसी पत्रिका के तमाम फ़ायदे हैं. इसमें जहां एक ओर सभी समकालीन कला विधाओं को एक स्थान पर प्राप्त होने की सहूलियत पाठकों को मिल सकती है, वहीं दूसरी ओर अलग-अलग विधाओं से जुड़े रचनाकारों के लिए दूसरी विधाओं के रचनाकारों के परिचय को गाढ़ा करने का आधार भी बन सकती है. बात यहीं पर ख़त्म नहीं हो जाती. यह एक ऐसी शुरुआत भी बन सकती है, जिसमें अपने फ़न के उस्ताद और शागिर्द दोनों ही, निःसंकोच बराबर आ जा सकें. यदि दूसरी विधाओं में उनकी यह आवाजाही एक-दूसरे के सृजन को समझने, परखने और उस पर निःसंकोच अपने सकारात्मक विचार व्यक्त करने का कारक बनती है, तो सृजनात्मक मूल्यों के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में यह कार्य महत्वपूर्ण माना जा सकता है. इस कार्यों का मूल उद्देश्य सृजनशीलता से भी है. अंततः यह कलाओं की अंतर्सम्बधता को ही प्रकट करेगा. इन विचारों के क्रम में ही इस पत्रिका ‘मानव संस्कृति’ का ख़ाका तैयार किया गया है.
‘मानव संस्कृति’ पत्रिका को कुछ मामूली लोगों के द्वारा किया जा रहा एक मामूली-सा प्रयास भर माना जाना चाहिए. हमारा उद्देश्य सरल है, सीधा है. कला साहित्य और अन्य सांस्कृतिक विधाओं के जानकारों और इन विषयों में रुचि रखने वाले पाठकों को एक मंच पर लाना. उन्हें कला विषयक ज़रूरी पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराना तथा निरंतर सभी की राय शामिल करते हुए पत्रिका में अपेक्षित सुधार करना और अंततः पाठकों का दिल जीतना. दरअसल, हमारे लिए भी यह सीखने की प्रक्रिया से जुड़ा कार्य है. हम सभी को मिलकर एकसाथ कार्य करना है, एक साथ सीखना है. यह पत्रिका लोगों का दिल जीतने की कोशिश होगी, यही एकमात्रा हमारी मंशा है.
‘मानव संस्कृति’ पत्रिका कला, साहित्य और संस्कृति की धरोहर बने इस विचार एवं संकल्प के साथ इस पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया जा रहा है. हमारा प्रयास है कि अपने प्रारंभ से ही पत्रिका कला के उन सभी रूपों को एकजुट कर एक साथ उनकी प्रस्तुति संभव कर सके, जिससे कि उनकी अंतर्सम्बधता प्रकट हो, उनके विचार साझा हों और उनके बीच सृजनात्मक आवा-जाही सुनिश्चित हो. इस प्रवेशांक के ज़रिये इस रिश्ते का आग़ाज़ किया जा रहा है.

फ़ुट आर्टिस्ट शीला शर्मा 
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1 Response to "कला, साहित्य और संस्कृति को समर्पित एक पत्रिका"

  1. Anita says:
    25 नवंबर 2014 को 2:52 pm

    मानव संस्कृति की सफलता के लिए शुभकामनायें...ऐसी पत्रिकाओं की समाज को सदा आवश्यकता रहती है

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