रातभर दर्द के जंगल में घुमाती है मुझे...




 ग़ज़ल
रातभर दर्द के जंगल में घुमाती है मुझे
याद उस शख़्स की हर रोज़ रुलाती है मुझे

ख़्वाब जब सच के समन्दर में बिखर जाते हैं
उम्र तपते हुए सहरा में सजाती है मुझे

ज़िन्दगी एक जज़ीरा है तमन्नाओं का
धूप उल्फ़त की यही बात बताती है मुझे

हर तरफ़ मेरे मसाइल के शरार बरपा हैं
जुस्तजू अब्र की हर लम्हा बुलाती है मुझे

मैं संवरने की तमन्ना में बिखरती ही गई
आंधियां बनके हवा ऐसे सताती है मुझे

जब से क़िस्मत का मेरी रूठ गया है सूरज
तीरगी वक़्त की हर रोज़ डराती है मुझे

आलमे-हिज्र में 'फ़िरदौस' खो गई होती
चांदनी रोज़ रफ़ाक़त की बचाती है मुझे
-फ़िरदौस ख़ान
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17 Response to "रातभर दर्द के जंगल में घुमाती है मुझे..."

  1. amritwani.com says:
    20 अप्रैल 2010 को 4:06 pm

    wow bahut sundar gazal

    rat bhar dard ke jangal me gumati he mujhe


    shekharkumawat

    http://kavyawani.blogspot.com/

  2. प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) says:
    20 अप्रैल 2010 को 4:10 pm

    वाह बहुत बेहतरीन खाश कर ये लायने दिल को छू गयी
    मै सवंरने की तमन्ना में बिखरती ही गई ,,,
    आंधिया बन के हवा यैसे सताती है मुझे ,,
    सादर
    प्रवीण पथिक
    9971969084

  3. Apanatva says:
    20 अप्रैल 2010 को 4:13 pm

    hamesha kee tarah bejod gazal......

  4. M VERMA says:
    20 अप्रैल 2010 को 4:13 pm

    दर्द का जंगल जब उजाला और किनारा देखेगा तो चमक बढ जायेगी
    खूबसूरत रचना, खूबसूरत खयाल, खूबसूरत एहसास

  5. दीपक 'मशाल' says:
    20 अप्रैल 2010 को 4:19 pm

    agar kuchh kathin lafzon ke maayne bhi sath me den to naye logon ke liye samajhne me aasani rahegi. khair mujhe to pasand aayi gazal sivaye teergee ke matlab ke lekin bhaav se samajh liya.

  6. सुलभ § सतरंगी says:
    20 अप्रैल 2010 को 4:23 pm

    ...चांदनी रोज़ रफ़ाक़त की बचाती है मुझे.

    बहुत खूब!

  7. कहत कबीरा...सुन भई साधो says:
    20 अप्रैल 2010 को 4:51 pm

    रातभर दर्द के जंगल में घुमाती है मुझे
    याद उस शख्स की हर रोज़ रुलाती है मुझे
    ख़्वाब जब सच के समन्दर में बिखर जाते हैं
    उम्र तपते हुए सहरा में सजाती है मुझे

    लाजवाब ग़ज़ल

  8. Dev says:
    20 अप्रैल 2010 को 4:55 pm

    बहुत खूबसूरत लब्जों से नवाज़ा है
    प्रशंसनीय

  9. पी.सी.गोदियाल says:
    20 अप्रैल 2010 को 5:13 pm

    waah !

  10. anand says:
    20 अप्रैल 2010 को 6:10 pm

    woh lines khoobsurat rahi - main sanwarne ki tammanna me bikharti hi gai! baki to routine hai!

  11. kunwarji's says:
    20 अप्रैल 2010 को 7:10 pm

    waah!bahut khoob is baar bhi!

    kunwar ji,

  12. P.N. Subramanian says:
    20 अप्रैल 2010 को 9:33 pm

    बहुत ही सुन्दर एवं सार्थक रचना. आभार.

  13. Tarkeshwar Giri says:
    20 अप्रैल 2010 को 10:32 pm

    very nice.

  14. संजय भास्कर says:
    21 अप्रैल 2010 को 12:25 am

    हमेशा की तरह उम्दा रचना..बधाई.

  15. मो सम कौन ? says:
    21 अप्रैल 2010 को 6:13 am

    गज़ल बहुत अच्छी लगी आपकी।
    और जिन लोगों के बारे में आप बात कर रही हैं, ये नहीं जानते हैं कि अपनी हरकतों के कारण अपने समाज की छवि बिगाड़ ही रहे हैं।

  16. वाणी गीत says:
    21 अप्रैल 2010 को 7:55 am

    चांदनी रोज रफ़ाकत की बचाती है मुझे ...
    वाह ...
    यही विश्वास बना रहे ...सब मुशिकलें आसान होंगी ...!!

  17. वन्दना says:
    21 अप्रैल 2010 को 11:27 am

    bahut hi bhavpoorna gazal.

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