इश्क़ का घूंट

एक कप कॉफ़ी...
जिसका एक घूंट
उसने पिया
और एक मैंने
लगा-
कॉफ़ी नहीं
इश्क़ का घूंट
पी लिया है मैंने...
-फ़िरदौस ख़ान
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6 Response to "इश्क़ का घूंट"

  1. अजय कुमार says:
    8 जनवरी 2010 को 2:36 pm

    प्यार के गहरे जज्बात

  2. ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ says:
    8 जनवरी 2010 को 2:57 pm

    लाजवाब कर दिया आपने।
    आपकी सोच को सलाम करता हूँ।
    --------
    बारिश की वो सोंधी खुश्बू क्या कहती है?
    क्या सुरक्षा के लिए इज्जत को तार तार करना जरूरी है?

  3. Suman says:
    8 जनवरी 2010 को 5:12 pm

    nice

  4. शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' says:
    8 जनवरी 2010 को 10:17 pm

    फिरदौस साहिबा,
    बस यूं समझिये,
    नज्म का सारा दारोमदार
    'इश्क के घूंट' पर ही टिका है
    इस अंदाज़ में किसी के हो जाने के भाव को
    बिल्कुल नये शब्द मिले हैं
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

  5. हृदय पुष्प says:
    8 फ़रवरी 2010 को 4:57 pm

    जिसके लिए लोगों ने इतना कुछ लिख/कह डाला उसे काफी के एक घूंट समाहित कर दिया - वाह-वाह लाजवाब - आपकी लेखनी सलामत रहे और यूँ ही चलती रहे - - हार्दिक शुभकामनाएं

  6. मौसम says:
    6 मार्च 2010 को 8:58 pm

    इश्क़ का घूंट.......सुब्हानअल्लाह.......आपने तो इन तीन अल्फ़ाज़ में ही सब कुछ कह दिया.......लाजवाब कर दिया.......

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