हाथ भी रहते हैं साये में मेरे आंचल के...


तेरी ख़ामोश निगाहों में अया होता है
मुझको मालूम है उल्फ़त का नशा होता है

मुझसे मिलता है वो जब भी मेरे हमदम की तरह
उसकी पलकों पे कोई ख़्वाब सजा होता है

चैन कब पाया है मैंने ये न पूछो मुझसे
मैं करूं शिकवा तो नाराज़ ख़ुदा होता है

हाथ भी रहते हैं साये में मेरे आंचल के
जब हथेली पे तेरा नाम लिखा होता है
-फ़िरदौस ख़ान

छाया : तस्वीर हमारी ही है...
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2 Response to "हाथ भी रहते हैं साये में मेरे आंचल के..."

  1. sushma 'आहुति' says:
    2 अगस्त 2013 को 5:29 pm

    बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

  2. अभिषेक कुमार अभी says:
    10 मई 2014 को 1:39 am

    आपकी इस उत्कृष्ट अभिव्यक्ति की चर्चा कल रविवार (11-05-2014) को ''ये प्यार सा रिश्ता'' (चर्चा मंच 1609) पर भी होगी
    --
    आप ज़रूर इस ब्लॉग पे नज़र डालें
    सादर

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