एक दुआ, उनके लिए...


मेरे मौला !
अपने महबूब हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सदक़े में मेरे महबूब को सलामत रखना, आमीन 🌹
-फ़िरदौस ख़ान
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सालगिरह का दुआओं से लबरेज़ तोहफ़ा...



साल 2012 की एक जून को हमारी सालगिरह थी...उस रोज़ हम अपने घर में थे...अपनी अम्मी, भाइयों, भाभी, बहन और दीगर रिश्तेदारों के साथ...जब हम घर होते हैं, तब इंटरनेट से दूर ही रहना पसंद करते हैं...आख़िर कुछ वक़्त घरवालों के लिए भी तो होना ही चाहिए न...

आपकी सबकी तरफ़ से हमें सालगिरह की शुभकामनाएं मिलीं...हमारे फ़ेसबुक की वाल, मैसेज बॉक्स आप सबकी दुआओं से भरा हुआ है... इसी तरह हमारे मेल के इनबॉक्स भी दुआओं से लबरेज़ हैं... सच कितना अपनापन है यहां भी...कौन क़ुर्बान न हो जाए इस ख़ुलूस और मुहब्बत पर...यही तो सरमाया हुआ करता है उम्रभर का ...जिसे हम हमेशा संभाल कर रख लेना चाहते हैं अपनी ज़िन्दगी की किताब में...

हर साल हमें सालगिरह के तोहफ़े में कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर मिलता है, जो हमारी उम्र का सरमाया बन जाता है...इस बार भी ऐसा एक तोहफ़ा मिला, जो आज से पहले शायद ही किसी भाई ने अपनी बहन को दिया हो... यह अल्लाह का हम पर बहुत बड़ा करम रहा है कि हमें भाई बहुत अच्छे मिले...वो सगे भाई हों या फिर मुंहबोले भाई... हम जिस तोहफ़े का ज़िक्र कर रहे हैं, वो हमें दिया है हमारे मुंहबोले भाई मन्नान रज़ा रिज़वी ने...मन्नान हमें बहुत अज़ीज़ हैं...यह तोहफ़ा दुआओं से लबरेज़ एक नज़्म की सूरत में है...जिसे पढ़कर अहसास हुआ कि किस तरह मुहब्बत ज़र्रे को भी आफ़ताब बना देती है...हमारे भाई मन्नान ने भी तो यही सब किया है...हमें अर्श से उठाकर आसमां की बुलंदियों पर पहुंचा दिया है...

मन्नान से क्या कहें...? हमारे जज़्बात के आगे अल्फ़ाज़ भी कम पड़ गए हैं... एक दुआ है कि अल्लाह हमारे भाई को हमेशा सलामत और ख़ुश रखे...और ऐसा भाई दुनिया की हर बहन को मिले...आमीन...       
हम अपने भाई का ख़त और नज़्म पोस्ट कर रहे हैं...

ख़त
अस्सलामु अलैकुम व  रहमतुल्लाही व बरकतुह
उम्मीद है मिज़ाज अक़द्दस बख़ैर होंगे... आपकी ख़ैरियत ख़ुदावंद करीम से नेक मतलूब है...
प्यारी बाजी... आपके योम-ए-पैदाइश के मौक़े पर हम क़लब की इन्तहाई गहराइयों से आपको मुबारकबाद पेश करते हैं...हमारी दुआ है कि  ये दिन आपकी ज़िन्दगी में हर बार नई ख़ुशियों के साथ आए...
ख़ुदा आपके तमाम मक़ासिद हक़ा में कामयाबी अता करते हुए आपकी मसरूफ़ियत में कमी और मक़बूलियत में इज़ाफ़ा फ़रमाये... और हमेशा नज़र-ए-बद से महफ़ूज़ रखे...आमीन...
फ़क़्त ख़ैर अंदेश
मन्नान रज़ा रिज़वी 

नज़्म
बयां हो अज़म आख़िर किस तरह से आपका फ़िरदौस
क़लम की जान हैं, फ़ख्र-ए-सहाफ़त साहिबा फ़िरदौस
शुक्रिया फ़िरदौस बेहद शुक्रिया फ़िरदौस...

सहाफ़त के जज़ीरे से ये वो शहज़ादी आई है
मिली हर लफ़्ज़ को जिसके मुहब्बत की गवाही है
हर एक तहरीर पे जिनकी फ़साहत नाज़ करती है
सहाफ़त पर वो और उन पर सहाफ़त नाज़ करती है
वो हैं शहज़ादी-ए-अल्फ़ाज़ यानी साहिबा फ़िरदौस
शुक्रिया फ़िरदौस बेहद शुक्रिया फ़िरदौस...

क़लम जब भी उठा हक़ व सदाक़त की ज़बां बनकर
बयान फिर राज़ दुनिया के किए राज़दां बनकर
मियान-ए-हक़ व बातिल फ़र्क़ यूं वाज़ा किया तुमने
तकल्लुफ़ बर तरफ़ क़ातिल को है क़ातिल लिखा तुमने
तेरा हर लफ़्ज़ बातिल के लिए है आईना फ़िरदौस
शुक्रिया फ़िरदौस बेहद शुक्रिया फ़िरदौस...

कभी मज़मून में पिन्हा किया है दर्दे-मिल्लत को
कभी अल्फ़ाज़ का जामा दिया अंदाज़-ए-उल्फ़त को
यक़ीं महकम, अमल पैहम, मुहब्बत फ़ातहा आलम
सफ़र इस सिम्त में जारी रहा है आपका हर दम
अदा हक़ सहाफ़त आपने यूं है किया फ़िरदौस
शुक्रिया फ़िरदौस बेहद शुक्रिया फ़िरदौस...

हर इक लब रहे जारी कुछ ऐसा साज़ बन जाए
ख़िलाफ़-ए-ज़ुल्म तुम मज़लूम की आवाज़ बन जाओ
हों चर्चे हर ज़बां पर आम इक दिन तेरी शौहरत के
हर  इक तहरीर मरहम सी लगे ज़ख्मों पे मिल्लत के
तुम्हारे हक़ में करते हैं अनस ये ही दुआ फ़िरदौस
शुक्रिया फ़िरदौस बेहद शुक्रिया फ़िरदौस...
-मन्नान रज़ा रिज़वी


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ईश प्रीत की छलकन है यह पुस्तक


सूफ़ी-संतों पर आधारित पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ फ़िरदौस ख़ान की ईश प्रीत की छलकन है. ऋषि सत्ताओं की विस्मृत वाणी को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ को कैसे संत व फ़क़ीर जीते हैं, उसी को पुनः स्मृति में लाने का प्रयास है यह पुस्तक.

जैसे श्रीमद्भगवद्गीता पुनः अर्जुन के बहाने संसार को मिल रहा है, जबकि योगेश्वर कहते हैं कि सबसे पहले यह ज्ञान सूर्य को दिया था, जो काल के खेल में विलुप्त हो गया था.
ऋषि सत्ताओं ने धर्म की जगह विशेष के समूह को जीवन जीने का तरीक़ा दिया और ऋषियों, सूफ़ी, संतों व फ़क़ीरों ने उस जीवन जीने के तरीक़ों के उद्देश्य को जिया अर्थात आध्यात्मिक जीवन को प्राप्त होना, अर्थात उस प्रकाश को पाना है जिससे यह कायनात है. अखिल ब्रह्मांड है, भीड़ और समूह सीढ़ियां छोड़ नहीं पाती हैं, जिससे भेद बना रहता है, बसा रहता है. मंज़िल पानी थी, न कि सिर पर सीढ़ियां लादे घूमना था. फ़क़ीरों-संतों का जीवन चीख़-चीख़ कर घोषणा करता है- ढाई आखर प्रेम का, पढ़या सो पंडित होय.
पहुंचना प्रीत सागर में है. सारी की सारी नदियों का गंतब्य क्या है, समुद्र.

गंगा-जमुनी मेल क्या है, संस्कृति क्या है, चलें सागर की ओर, मिलकर. संगम पाकर और विशाल-विस्तृत होकर. विराट मिलन के पूर्व का मिलन उस महामिलन की मौज की मस्ती के स्वाद का पता दे देता है. इसका बड़ा अच्छा उदाहरण लेखिका व आलिमा फ़िरदौस ख़ान ने प्रस्तुत किया है. सूफ़ी हज़रत इब्राहिम बिन अदहम के जीवन से-
-कौन ?
- तेरा परिचित.
-क्या खोज रहे हो?
- ऊंट.
बकवास... इतने ऊपर हमारे महल में ऊंट कैसे आ सकता है? परिचित बोलते हैं कि जब तू राजमहल में मालिक को ढूंढ सकता है, तो यहां हमारा ऊंट क्यों नहीं आ सकता है?
अर्थात राजस में रहकर सात्विक से भी (त्रिगुण मयी माया) पार की ख़बर का नाटक करना ही है. आज के दौर में कितना प्रासंगिक है. राजस जीवन जीकर धर्म की व्याख्या करना, पतन की पराकाष्ठा ही है.
वहीं जब महल को पुनः सराय कहता है परिचित, तब बादशाह की आंख पूरी खुल जाती है. राजस आने जाने वाली फ़ानी बादशाहत छोड़कर फ़क़ीरी जीवन जीने लगते हैं.

और सूफ़ी, संत, फ़क़ीर ही असली बादशाह हैं. मालिक की गोद में बैठकर असली मौज लेते रामकृष्ण परमहंस भी दिखते हैं और माँ के आशीष से सिंचित कर्मयोगी शहनाई वादक बिस्मिल्लाह ख़ान साहेब भी क्या हज़रत इब्राहिम बिन अदहम की तरह फ़क़ीरी में बादशाह नहीं हैं.
चाहे कबीर हों, रसखान हों, दादू हों सभी उस नूर, उस रौशनी की चर्चा अपनी सधुक्कड़ी भाषा में कर रहे हैं. 
लेखिका फ़िरदौस ख़ान उस ईश्वरीय नूर को जी रही हैं और इस तरह ईश प्रीत की उस छलकन की पहली श्रृंखला है यह पुस्तक, जिसे ज्ञान गंगा (प्रभात प्रकाशन समूह) ने प्रकाशित किया है.

शुभकामनाएं अपार!
नन्दलाल सिंह

लेखक का परिचय 
नन्दलाल सिंह लेखक एवं अनिभेता हैं. वह रंगमंच, हिन्दी फ़ीचर फ़िल्मों के लिए लेखन करते हैं. उनकी कहानियां, लेख, उपन्यास एवं गांधी दर्शन पर अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. वह महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, बनारस में भी नाट्य विभाग में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रहे हैं. वह महात्मा गांधी के विचार एवं दर्शन पर कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देते हैं. 
संपर्क : गोरेगांव (पश्चिम), मुम्बई- 400104 (महाराष्ट्र)
ईमेल : sundharanandlal@gmail.com
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एक मुबारक तारीख़


एक मुबारक तारीख़... एक रूहानी तारीख़, जिसे हम कभी नहीं भूल सकते... तआरुफ़ 
4 अप्रैल 2022 हिजरी 2 रमज़ान 1443

कितनी प्यारी दुआ है 

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم 
 إلهي كفى بي عِزًّا أن أكون لك عَبدًا، وكفى بي فخرًا أن تكون لي رَبًّا، أنت كما أُحب فاجعلني كما تُحب. 
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
इलाही कफ़ा बी इज़्ज़न, अन अकुना लका अबदन
वा कफ़ा बी फ़ख़रन, अन तकुना लि रब्बन 
अंता कमा उहिब्ब, फ़जअलनी कमा तोहिब
आमीन या रब्बुल आलेमीन 
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है.
ऐ मेरे रब ! मेरी इज़्ज़त के लिए यही काफ़ी है कि मैं तेरा बन्दा हूं. और मेरे फ़ख़्र करने के लिए ये काफ़ी है कि तू मेरा परवरदिगार है. तू वैसा ही है, जैसा मैं चाहता हूं. बस तू मुझे ऐसा बना दे, जैसा तू चाहता है.
आमीन या रब्बुल आलेमीन
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इबादत


मेरे महबूब !
तुम फ़ज्र की ठंडक हो 
इशराक़ की सुर्ख़ी हो 
चाश्त की धूप हो
ज़ुहर की तपिश हो 
अस्र की महक हो 
मग़रिब की छांव हो 
इशा की दुआ हो
और
तहज्जुद की इबादत हो 
मेरे महबूब 
तुम ही तो मेरी इबादत का मरकज़ हो...
-फ़िरदौस ख़ान  
शब्दार्थ : फ़ज्र, इशराक़, चाश्त, ज़ुहर, अस्र, मग़रिब, इशा और तहज्जुद –मुख़तलिफ़ अवक़ात की नमाज़ों के नाम हैं.   
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और अल्लाह ने खाना भेज दिया...


साल 2005 का वाक़िया है. नवम्बर का महीना था. हम अपनी अम्मी के साथ उत्तर प्रदेश के एक गांव में गए हुए थे. गांव के एक बुज़ुर्ग के साथ हम घूमने निकले. उनके साथ कांग्रेस के एक नेता और उनके चाचा नवाब साहब भी थे. दोपहर हो गई. सबको बहुत भूख लगी थी. बुज़ुर्ग ने कहा कि बहुत भूख लग रही है. घर वापस लौटने में बहुत देर हो जाएगी और यहां दूर-दूर ऐसा कुछ दिखाई नहीं दे रहा, जहां जाकर कुछ खा-पी सकें. उनकी यह बात सुनकर हमारी अम्मी ने कहा- “मैं जहां भी जाती हूं, अल्लाह वहां खाना ज़रूर भेज देता है.” इस पर वे बुज़ुर्ग तंज़िया मुस्कराने लगे. अभी चन्द घड़ियां ही गुज़री थीं कि साईकिल पर सफ़ेद लिबास में एक शख़्स आया. उसने सबको सलाम किया और उन बुज़ुर्ग के हाथ में एक थैली थमाकर चला गया. उन्होंने थैली खोली, तो उसमें गरमा-गरम समौसे थे. नवाब साहब ने बुज़ुर्ग से उस शख़्स के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा कि वे उसे नहीं जानते.
इस पर हमारी अम्मी ने बुज़ुर्ग से कहा- “क्या मैंने आपसे नहीं कहा था कि मैं जहां भी जाती हूं, अल्लाह वहां खाना ज़रूर भेज देता है.”
-फ़िरदौस ख़ान
हमारी अम्मी ख़ुशनूदी ख़ान उर्फ़ चांदनी
(शेख़ज़ादी का वाक़िया)
#शेख़ज़ादी_का_वाक़िया
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अब्र का साया


कई बरस पहले का वाक़िया है. एक रोज़ हमारी छोटी बहन ने अम्मी को फ़ोन किया कि आपसे मिलने का दिल कर रहा है. अम्मी ने उससे मिलने का वादा कर लिया. चुनांचे ज़ुहर की नमाज़ के बाद अम्मी और हम उससे मिलने के लिए घर से निकले. वह शायद जेठ का महीना था. शिद्दत की गर्मी थी. सूरज आग बरसा रहा था. अम्मी कहने लगीं कि काश ! बादल होते. हमने आसमान की तरफ़ रुख़ करके कहा कि आसमान में दूर-दूर तक बादल का कोई नामो निशान तक नहीं है. हमारी बात ख़त्म भी न होने पाई थी कि हमने ज़मीन पर साया देखा. वह साया इतना वसीह था कि अम्मी और हम उसके नीचे थे. यानी हम घर से दस क़दम भी आगे नहीं बढ़े थे कि हम दोनों अब्र के सायेबान में थे. हम यूं ही बातें करते-करते बहन के घर गए. वहां कुछ वक़्त रुके और फिर वापस घर आ गए. जब हम घर आ गए, तो अम्मी ने हमसे पूछा- ये बताओ कि क्या तुम धूप में गई थीं या अब्र के साये में. हमने ग़ौर किया कि वाक़ई हम अब्र के साये में ही गए थे और अब्र के साये में ही घर वापस आए थे. जैसे-जैसे हम आगे क़दम बढ़ा रहे थे, वैसे-वैसे ही अब्र का साया भी आगे बढ़ता जा रहा था.
ये अल्लाह का एक बहुत बड़ा मौजिज़ा था. ऐसे थीं हमारी अम्मी. अल्लाह उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता करे, आमीन   
(शेख़ज़ादी का वाक़िया) 
#शेख़ज़ादी_का_वाक़िया
 
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फूल, किताबें और एक तस्वीर...



हमारे कमरे में क़दम रखते ही सबसे पहले नज़र पड़ती है...फ़र्श पर बिछी चांदनी पर...गहरे हरे रंग की ज़मीन पर हल्के बादामी रंग के बड़े-बड़े फूल बहुत ही ख़ूबसूरत लगते हैं...
कमरे में सफ़ेद और सुर्ख़ रंग के फूलों की बहार है...मुझे सफ़ेद फूल पसंद हैं तो उन्हें सुर्ख़ फूल...इसलिए कमरे में दोनों ही तरह के फूल अपनी मौजूदगी का ख़ुशनुमा अहसास कराते हैं...
इसके बाद बारी आती है किताबों की...हमारे पास बहुत सी किताबें हैं...घर पर तो अच्छी ख़ासी लाइब्रेरी है...सबसे ज़्यादा उर्दू की किताबें हैं...दूसरे तीसरे और चौथे दर्जे पर बारी आती है पंजाबी, हिन्दी और अंग्रेजी की किताबों की...हिन्दी में रूसी साहित्य की किताबों का अच्छा ख़ासा ज़ख़ीरा है... अम्मी को उर्दू और अरबी की किताबें पसंद हैं. भाई को पत्रकारिता, पशु-पक्षियों और बाग़वनी की... यहां यानी दिल्ली में भी हमारे पास किताबों का ज़ख़ीरा है...हम अकसर किताबें ख़रीदते रहते हैं...इसके अलावा समीक्षा के लिए प्रकाशक भी ढेरों किताबें भेजते रहते हैं...

किताबों की अपनी ही एक दुनिया है. कहते हैं किताबों से अच्छा कोई दोस्त नहीं होता. कॉलेज के वक़्त हर महीने आठ से दस किताबें पढ़ लेते थे. लाइब्रेरी में उर्दू और पंजाबी की किताबें पढ़ने वाले हम अकेले थे. उर्दू या पंजाबी का कोई बुज़ुर्ग पाठक कभी साल-दो-साल में ही वहां आता था. कई बार लाइब्रेरी के लोग किताबों को तरतीब से लगाने के लिए हमारी मदद लेते थे तो कभी फटी पुरानी या कभी-कभी नई किताबों के नाम, लेखक और प्रकाशक के नाम हिन्दी में लिखने में. हमें यह सब काम करना बहुत अच्छा लगता था.

किताबों से मुताल्लिक़ एक ख़ास बात. कुछ लोगों की आदत में शुमार होता है कि वो अच्छी किताब देखते ही आपसे मांग लेंगे. आपने एक बार किताब दे दी तो फिर मजाल है कि वो आपको वापस मिल जाए. किताबों के पन्ने मोड़ने, पैन से लाइनें खींचकर किताबों की अच्छी सूरत को बिगाड़ने में भी लोगों को बहुत मज़ा आता है. हमारे पास मुल्क के नामी कहानीकारों की कहानियों का एक संग्रह था. एक रोज़ हम उसे अपने साथ दफ़्तर ले गए  एक लड़की ने हमसे मांग लिया. कई महीने गुज़र गए, लेकिन उसने वापस नहीं किया. हमें पूछा तो कहने लगी-वक़्त ही नहीं मिला. खैर क़रीब दो साल बाद हमारा उसके घर जाना हुआ तो उसने उसे लौटा दिया. लेकिन उसे वापस पाकर हमें बेहद दुख हुआ. तक़रीबन हर सफ़े पर पैन से लाइनें खींची हुईं थीं. कवर पेज भी बेहद अजनबी लगा. जब भी उस किताब को देखते तो बुरा लगता. छोटे भाई असलम ने हमारी  सालगिरह पर नई किताब लाकर दी और उस किताब को अलमारी से हटा दिया. ऐसे कितने ही क़िस्से हैं अपनी प्यारी किताबों से जुदा होने के...

कहते हैं कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं, जिन्हें देखकर ख़ुशी हासिल होती है...किसी मासूम से चेहरे की मुस्कराहट आपकी सारी थकन मिटा देती है...आपको ताज़गी से सराबोर कर देती है...आप अपनी सारी उदासी और तन्हाई को भूलकर तसव्वुरात की ऐसी दुनिया में खो जाते हैं, जहां सिर्फ़ आप और आप ही होते हैं...या फिर आपका कोई अपना... हम बात कर रहे हैं एक तस्वीर की...एक ऐसी तस्वीर की, जो हमें बहुत अज़ीज़ है...इस तस्वीर का क़िस्सा भी बहुत दिलचस्प है... हम किसी काम से बाज़ार गए, वहां हमें एक फ़ोटोग्राफर की दुकान दिखाई दी... काफ़ी अरसे से हमें एक तस्वीर बड़ी करानी थी...हमने वहां बैठे लड़के से कहा कि भैया हमें इस तस्वीर की बड़ी कॉपी चाहिए...उसने कहा ठीक है- 100 रुपये लगेंगे...हमने हज़ार का एक नोट उसे पकड़ा दिया...उसने हमें नौ सौ रुपये वापस कर दिए और एक बड़ी तस्वीर दे दी...हम तस्वीर पाकर बहुत ख़ुश थे...  उस वक़्त हमारे साथ हमारे एक दोस्त थे, उन्होंने कहा कि उस लड़के ने तुमसे एक ज़ीरो ज़्यादा लगाकर पैसे ले लिए...हमने कहा कि एक क्या वो दो ज़ीरो ज़्यादा लगाकर पैसे मांगता तो भी हम दे देते, क्योंकि जहां प्यार होता है, वहां मोल-भाव नहीं होता...यह तस्वीर हमारे लिए अनमोल है...
उस वक़्त लगा कि हमारे सामने एक गूजरी खड़ी मुस्करा रही है...एक बहुत दिलचस्प कहानी है...किसी डेरे पर एक फ़क़ीर आकर रहने लगा...वह एक पेड़ के नीचे बैठा इबादत करता...  फ़क़ीर हर रोज़ देखता कि गूजरी दूध बेचने के लिए रोज़ वहां आती है...वो बहुत माप-तोल के साथ सबको दूध देती, लेकिन जब एक ख़ूबसूरत नौजवान आता तो उसके बर्तन को पूरा दूध से भर देती, यह देखे बिना कि बर्तन छोटा है या बड़ा... एक रोज़ फ़क़ीर ने गूजरी से पूछा कि  तुम सबको तो बहुत माप-माप कर दूध देती हो, लेकिन उस ख़ूबसूरत नौजवान का पूरा बर्तन भर देती हो... गूजरी ने मुस्कराते हुए फ़क़ीर को जवाब दिया कि जहां प्यार होता है, वहां मोल-भाव नहीं होता...

हां, तो यह तस्वीर सिर्फ़ हम ही देख पाते हैं, क्योंकि यह हमारी डायरी में रहती है...उन नज़्मों की तरह, जो हमने सिर्फ़ अपने महबूब के लिए लिखी हैं...

जाने कब तक तेरी तस्वीर निगाहों में रही
हो गई रात तेरे अक्स को तकते तकते
मैंने फिर तेरे तसव्वुर के किसी लम्हे में
तेरी तस्वीर पे लब रख दिये अहिस्ता से...  परवीन शाकिर  
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पनाह


मेरे महबूब !
मैं तुम्हारी पनाह में हूं
गोया 
अपने रब की पनाह में हूं...
-फ़िरदौस ख़ान

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ज़िन्दगी के सफ़र सी कविताएं


फ़िरदौस ख़ान
युवा कवि आलोक मिश्र की कविताएं ज़िन्दगी के बेहद क़रीब हैं. अपनी कविताओं के बारे में आलोक जी कहते हैं- "जब भी मैं देखता हूं दुनिया को, वह मुझसे कुछ कहती है और जो कहती है वह मेरी कविता है.”
कवि आलोक मिश्र की कविताएं भाव प्रधान कविताएं हैं. पिछले दिनों नई दिल्ली की ग्रंथ अकादमी ने उनका काव्य संग्रह ’लखनपुर और अन्य कविताएं’ प्रकाशित किया है. 104 पृष्ठों के इस कविता संग्रह में कुल 54 कविताएं हैं. ये कविताएं ज़िन्दगी के सफ़र की तरह हैं, जिसमें रफ़्तार भी और ठहराव भी है. इन  कविताओं में प्रेम भी है और वियोग भी है. कहीं मिलन की चाह है, तो कहीं टूटन है, बिखराव है और दरकते रिश्तों का दर्द है. कवि ने जहां राजनीति पर कटाक्ष किया है, वहीं प्रकृति के नैसर्गिक सौन्दर्य का भी बखूबी चित्रात्मक वर्णन किया है. कवि ने आज के दौर में बढ़ते अपराधों, सांप्रदायिकता और नफ़रतों पर चिंता ज़ाहिर करते हुए इनसे उपजे दर्द को अपनी कविताओं में समेटने की भी भरपूर कोशिश की है.
यह कहना क़तई ग़लत नहीं होगा कि ज़िन्दगी के तमाम दुखों और तकलीफ़ों के बावजूद इन कविताओं में उम्मीद की एक ऐसी किरण भी है, जो ज़िन्दगी के अंधेरे को मिटाने देने के लिए आतुर नज़र आती है. यह सूरज की रौशनी की एक ऐसी चाह है, जो हर तरफ़ सुबह का उजियारा बनकर बिखर जाना चाहती है. ये कविताएं पाठक को अपने साथ भावों की नदी में बहा ले जाना चाहती हैं. ऐसी ही एक कविता है-
लिखूंगा तुम्हारा नाम
और पढूंगा सिर्फ़ तुमको
क्योंकि 
तुमको ज़बान से नहीं 
नज़रों से और 
प्रेम की भाषा में पढ़ा जा सकता है  

काव्य सृजन के मामले में भी यह काव्य संग्रह उत्कृष्ट है. कविता की भाषा में रवानगी है. कवि ने कम से कम शब्दों में अपनी बात कही है. कविताओं में शिल्प सौंदर्य है. कवि ने अपनी भावनाओं को मार्मिक शब्दों और सुन्दर बिम्बों के माध्यम से उकेरा है. कविता में चिंतन और विचारों को सहज और सरल ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जिससे कविता का मर्म और अर्थ पाठक को सहजता से समझ में आ जाता है. पुस्तक का आवरण भी आकर्षक है. अलबत्ता काव्य प्रेमियों के लिए यह एक अच्छा कविता संग्रह है.

समीक्ष्य कृति : लखनपुर और अन्य कविताएं 
कवि : आलोक मिश्र 
प्रकाशक : ग्रंथ प्रकाशन, नई दिल्ली 
पेज : 104
मूल्य : 200 रुपये
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