रविवार, जून 24, 2018

ख़त

मेरे महबूब !
तुम्हारा ख़त मिला
ऐसा लगा
जैसे
कोई वही उतरी है...
जिसका
हर इक लफ़्ज़
हमारे लिए
कलामे-इलाही की मानिन्द है...
-फ़िरदौस ख़ान

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें