मेरे महबूब
तुम्हारे इंतज़ार ने
उम्र के उस मोड़ पर
ला खड़ा किया है
जहां से
शुरू होने वाला
एक सफ़र
सांसों के टूटने पर
ख़त्म हो जाता है
लेकिन-
फिर यहीं से
शुरू होता है
एक दूसरा सफ़र
जो हश्र के मैदान में
जाकर ही मुकम्मल होता है...
इश्क़ के इस सफ़र में
मुझे ही तय करना है
फ़ासलों को
ज़िन्दगी में भी
और
ज़िन्दगी के बाद भी
तुम्हारे लिए...
-फ़िरदौस ख़ान
तुम्हारे इंतज़ार ने
उम्र के उस मोड़ पर
ला खड़ा किया है
जहां से
शुरू होने वाला
एक सफ़र
सांसों के टूटने पर
ख़त्म हो जाता है
लेकिन-
फिर यहीं से
शुरू होता है
एक दूसरा सफ़र
जो हश्र के मैदान में
जाकर ही मुकम्मल होता है...
इश्क़ के इस सफ़र में
मुझे ही तय करना है
फ़ासलों को
ज़िन्दगी में भी
और
ज़िन्दगी के बाद भी
तुम्हारे लिए...
-फ़िरदौस ख़ान

इश्क के इस सफर मे मुझे ही तय करना है इन फास्लों को ज़िन्दगी मे भी और ज़िन्दगी के बाद भी ----तुम्हारे लिये वाह बहुत सुन्दर रचना है शुभकामनायें
जवाब देंहटाएंबहुत मज़ेदार .......नाज़ुक सी नज़म .....!
जवाब देंहटाएंकविता बहुत अच्छी लगी...
जवाब देंहटाएंक्या बात कही है आपने मोहतरमा। जैसे आसमान से नाज़िल होती हुई ग़ज़ल। इस चित्र के साथ इस रचना को हमेशा संभाल के रखिएगा। जब वक्त मिलेगा तो आपकी किताब "गंगा जमुनी संस्कृति के अग्रदूत" ज़रूर ख़रीद कर पढ़ेंगे।
जवाब देंहटाएंआपकी उपलब्धियों ने बहुत प्रभावित किया। आभार।
फ़ीअमानिल्लाह।
फिरदौस साहिबा, आदाब
जवाब देंहटाएंनज्म पढ़कर काफी देर तक सोचना पड़ा
बस इतना ही कहेंगे-
आपकी अब तक की सबसे बेहतरीन तख्लीक़ है
वाक़ई (उनमें, जो हम पढ़ चुके हैं)
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद
bahut hi umda khyal .........waah , dil ko choo gayi rachna.
जवाब देंहटाएंWaah, Kya Baat Hai !! Bahut Khoobsoorat Nazm Hai !!
जवाब देंहटाएंbahut nazuk bhav so nice
जवाब देंहटाएंbahut khub kaha hai
जवाब देंहटाएंबहुत खूबसूरत ख्यालात का मुजाहिरा किया है आपने अपनी इस रचना में...गजल का एक शेर याद आ गया आपकी यह रचना पढ कर..
जवाब देंहटाएंअपनी मर्जी से कहां अपने सफ़र के हम हैं
रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं.
लिखते रहिये
एक सफ़र साँसों के टूटने पर ख़त्म हो जाता है
जवाब देंहटाएं... फिर यहीं से शुरू होता है दूसरा सफ़र.
तस्वीर, रचना तथा अनंत की ओर निराली - एक से बढ़कर एक - बहुत बहुत सुंदर.
फिरदौस साहिबा, आदाब
जवाब देंहटाएंनज्म पढ़कर काफी देर तक सोचना पड़ा
बस इतना ही कहेंगे-
आपकी अब तक की सबसे बेहतरीन तख्लीक़ है
पाकीज़गी, इबादत और मुहब्बत....... आपके कलाम में हमेशा देखने को मिलती हैं.......आपने इश्क़ को इबादत दर्जा दे दिया है.......सच, हमें रश्क होता है उस शख्स से, जिसे तसव्वुर में रखकर आप कलाम कहती हैं.......
जवाब देंहटाएंकल 28/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
जवाब देंहटाएंधन्यवाद!
बहुत गहन ..सुन्दर अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंबेहतरीन अभिव्यक्ति ।
जवाब देंहटाएंखुबसूरत नज़्म....
जवाब देंहटाएंसादर...