शनिवार, दिसंबर 19, 2009

शायद, यही ज़िन्दगी है...

ज़िन्दगी एक सहरा है...और ख़ुशियां सराब...इंसान ख़ुशियों को अपने दामन में समेट लेने के लिए क़दम जितने आगे बढ़ाता है...ख़ुशियां उतनी ही उससे दूर होती चली जाती हैं...शायद, यही ज़िन्दगी है...
-फ़िरदौस ख़ान

5 टिप्‍पणियां:

  1. कोमल भावों की प्रभावशाली अभिव्यक्ति। -
    http://drashokpriyaranjan.blogspot.com

    http://www.ashokvichar.blogspot.com

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  2. फिरदौस साहिबा,
    'इंसान जितना.....यही ज़िंदगी है
    ऐसा क्यूं सोचती हैं आप?
    जिगर साहब का एक शेर समाअत फरमायें-
    चला जाता हूं हंसता खेलता दौरे-हवादिस से
    अगर आसानियां हों, ज़िंदगी दुश्वार हो जाये...
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

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  3. उलझन जीवन की सखा कभी न छूटे साथ।
    खुशियाँ मिलतीं हैं तभी मिले हाथ से हाथ।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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