शनिवार, मई 23, 2009

बस, एक घर ऐसा हो...


घर...कितना सुकून समाया है, इस एक लफ्ज़ में... घर महज़ ईंट-गारे से बनी चारदीवारी पर टिकी छत का नाम नहीं है... और न ही उस छत का नाम है जिसके नीचे कई लोग रहते हैं... क्योंकि ऐसी जगह मकान तो हो सकती है, लेकिन घर क़तई नहीं... हमने बरसों पहले एक घर का तसव्वुर किया था और फिर उसी तसव्वुर को अल्फ़ाज़ में पिरोकर सहेज लिया था... बरसों तक सहेजकर रखे गए उसी तसव्वुर को आज एक दुआ के साथ पोस्ट कर रहे हैं... इंसान अपने लिए जैसा घर चाहता है, उसे वैसा घर नसीब हो... आमीन

घर
एक घर ऐसा हो
जिसकी बुनियाद
खुलूस की ईंटों से बनी हो
जिसके आंगन में
बेला और मेहंदी महकती हों
जिसकी क्यारियों में
रफ़ाक़तों के फूल खिलते हों
जिसकी दीवारें
क़ुर्बतों की सफ़ेदी से पुती हों
जिसकी छत पर
दुआएं
चांद-सितारे बनकर चमकती हों
जिसके दालान में
हसरतें अंगड़ाइयां लेती हों
जिसके दरवाज़ों पर
उम्र की हसीन रुतें
दस्तक देती हों
जिसकी खिड़कियों में
बच्चों-सी मासूम ख़ुशियां
मुस्कराती हों
और
जिसकी मुंडेरों पर
अरमानों के परिन्दे चहकते हों
बस, एक घर ऐसा हो
-फ़िरदौस ख़ान

Courtesy :  Image Mikki Senkarik 


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