शुक्रवार, जनवरी 08, 2010

इश्क़ का घूंट

एक कप कॉफ़ी...
जिसका एक घूंट
उसने पिया
और एक मैंने
लगा-
कॉफ़ी नहीं
इश्क़ का घूंट
पी लिया है मैंने...
-फ़िरदौस ख़ान

5 टिप्‍पणियां:

  1. फिरदौस साहिबा,
    बस यूं समझिये,
    नज्म का सारा दारोमदार
    'इश्क के घूंट' पर ही टिका है
    इस अंदाज़ में किसी के हो जाने के भाव को
    बिल्कुल नये शब्द मिले हैं
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

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  2. जिसके लिए लोगों ने इतना कुछ लिख/कह डाला उसे काफी के एक घूंट समाहित कर दिया - वाह-वाह लाजवाब - आपकी लेखनी सलामत रहे और यूँ ही चलती रहे - - हार्दिक शुभकामनाएं

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  3. इश्क़ का घूंट.......सुब्हानअल्लाह.......आपने तो इन तीन अल्फ़ाज़ में ही सब कुछ कह दिया.......लाजवाब कर दिया.......

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