रविवार, फ़रवरी 01, 2009

मानिंद मेरे उनका भी घरबार नहीं है


हमको तुम्हारी बात से इंकार नहीं है
तुमको हमारी हां में भी इक़रार नहीं है

रातों को भी जंगल में भटकते सदा जुगनू
मानिंद मेरे उनका भी घरबार नहीं है

मजबूरियों ने बेड़ियां डाली हैं बरगना
तुम जैसा मेरा मोनिसो-गमख्वार नहीं है

जो काम ज़िंदगी के उसूलों को ज़रर दे
एक बार नहीं, उससे तो सौ बार नहीं है

वह क़त्ल तो करते हैं ख़ुदा जाने किस तरह
हाथों में जिनके ख़ंजरो-तलवार नहीं है

'फ़िरदौस' तेरी कितनी अजब कश्ती-ए-हयात
चल तो रही है, मगर कोई पतवार नहीं है
-फ़िरदौस ख़ान

6 टिप्‍पणियां:

  1. ये लाइन शानदार है... 'फ़िरदौस' तेरी कितनी अजब कश्ती-ए-हयात है
    चल तो रही है, मगर कोई पतवार नहीं है...
    लेकिन मैं इसको अपनी फेवरिट में इस तरह डाल रहा हूं... 'फ़िरदौस' तेरी कितनी अजब कश्ती-ए-हयात (delete - है)
    चल तो रही है, पर (मगर की जगह) कोई पतवार नहीं है।

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  2. बहुत दिनों से आपकी कोई ख़बर नही थी
    ये ग़ज़ल देख कर राहत मिली

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  3. bahut din baad aapki gazal padney ko mili. hamesha ki tarah behtreen gazal hai. -

    http://www.ashokvichar.blogspot.com

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  4. माना कि तुमको बात से इंकार नहीँ है
    मगर फिर भी तो हमपे एतबार नहीँ है
    मै रखता हूँ इत्तेफाक़ युँ तेरी राय से
    क्या करूँ मेरा भी घरबार नहीँ है

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  5. रातों को भी जंगल में भटकते सदा जुगनू
    मानिंद मेरे उनका भी घरबार नहीं है

    मजबूरियों ने बेड़ियाँ डाली हैं बरगना
    तुम जैसा मेरा मोनिसो-गमख्वार नहीं है

    जो काम ज़िंदगी के उसूलों को ज़रर दे
    एक बार नहीं, उससे तो सौ बार नहीं है

    वह क़त्ल तो करते हैं ख़ुदा जाने किस तरह
    हाथों में जिनके खंजरो-तलवार नहीं है

    'फ़िरदौस' तेरी कितनी अजब कश्ती-ए-हयात
    चल तो रही है, मगर कोई पतवार नहीं है...

    बेहद उम्दा ग़ज़ल.......

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