ज़िन्दगी की हथेली पर मौत की लकीरें हैं...


मेरे महबूब !
तुमको पाना
और
खो देना
ज़िन्दगी के दो मौसम हैं

बिल्कुल
प्यास और समन्दर की तरह
या शायद
ज़िन्दगी और मौत की तरह

लेकिन
अज़ल से अबद तक
यही रिवायत है-
ज़िन्दगी की हथेली पर
मौत की लकीरें हैं...
और
सतरंगी ख़्वाबों की
स्याह ताबीरें हैं

मेरे महबूब !
तुमको पाना
और
खो देना
ज़िन्दगी के दो मौसम हैं...
-फ़िरदौस ख़ान

शब्दार्थ
अज़ल - आदि
अबद - अंत
स्याह - काला
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दहकते पलाश का मौसम...


हर मौसम की अपनी ख़ूबसूरती हुआ करती है... इस मौसम की रौनक़ पलाश के सुर्ख़ फूल है... इस दिल फ़रेब मौसम पर एक नज़्म पेश है...
नज़्म
मेरे महबूब !
ये दहकते पलाश का मौसम है
क्यारियों में
सुर्ख़ गुलाब महक रहे हैं
बर्फ़ीले पहाड़ों के लम्स से
बहकी सर्द हवायें
मुहब्बत के गीत गाती हैं
बनफ़शी सुबहें
कोहरे की चादर लपेटे हैं
अलसाई दोपहरें
गुनगुनी धूप सी खिली हैं
और
गुलाबी शामें
तुम्हारे मुहब्बत से भीगे पैग़ाम लाती हैं
लेकिन
तुम न जाने कब आओगे...
-फ़िरदौस ख़ान

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हश्र


हमारी नज़्म ’हश्र’ उन ’अमन पसंदों’ के नाम, जिन्होंने दुनिया को दोज़ख़ बनाकर रख दिया है...
अमन पसंदो !
तुम अपने मज़हब के नाम पर
क़त्ल करते हो मर्दों को
बरहना करते हो औरतों को
और
मौत के हवाले कर देते हो
मासूम बच्चों को
क्योंकि
तुम मानते हो
ऐसा करके तुम्हें जन्नत मिल जाएगी
जन्नती शराब मिल जाएगी
हूरें मिल जाएंगी...

लेकिन-
क़यामत के दिन
मैदाने-हश्र में
जब तुम्हें आमाल नामे सौंपे जाएंगे
तुम्हारे हर छोटे-बड़े आमाल
तुम्हें दिखाए जाएंगे
तुम्हारे आमाल में शामिल होंगी
उन मर्दों की चीख़ें
जिन्हें तुमने क़त्ल किया
उन औरतें की बददुआएं
जिन्हें तुमने बरहना किया
और
उन मासूमों की आहें
जिन्हें तुमने मौत की नींद सुला दिया...

कभी सोचा है
उस वक़्त
तुम्हारा क्या हश्र होगा...
-फ़िरदौस ख़ान

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प्रिया राजवंश : परी कथा सी ज़िंदगी

फ़िरदौस ख़ान
ख़ूबसूरत और मिलनसार प्रिया राजवंश की ज़िंदगी की कहानी किसी परी कथा से कम नहीं है. पहाड़ों की ख़ूबसूरती के बीच पली-बढ़ी एक लड़की कैसे लंदन पहुंचती है और फिर वापस हिंदुस्तान आकर फ़िल्मों में नायिका बन जाती है. एक ऐसी नायिका जिसने फ़िल्में तो बहुत कम कीं, इतनी कम कि उन्हें अंगुलियों पर गिना जा सकता है, लेकिन अपने ख़ूबसूरत अंदाज़ और दिलकश आवाज़ से उसने सबका दिल जीत लिया.

प्रिया राजवंश का जन्म 1937 में नैसर्गिक सौंदर्य के शहर शिमला में हुआ था. उनका बचपन का नाम वीरा था. उनके पिता सुंदर सिंह वन विभाग में कंजरवेटर थे. प्रिया राजवंश ने शिमला में ही पढ़ाई की. इसी दौरान उन्होंने कई अंग्रेज़ी नाटकों में हिस्सा लिया. जब उनके पिता संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ़ से ब्रिटेन गए, तो प्रिया राजवंश ने लंदन की प्रतिष्ठित संस्था रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स में दाख़िला ले लिया. सौभाग्य से उन्हें फ़िल्मों में भी काम करने का मौक़ा मिल गया. हुआ यूं कि लंदन के एक फोटोग्राफर ने उनकी तस्वीर खींची. चेतन आनंद ने अपने एक दोस्त के घर यह तस्वीर देखी तो वह प्रिया राजवंश की ख़ूबसूरती के क़ायल हो गए. उन दिनों चेतन आनंद को अपनी फ़िल्म के लिए नए चेहरे की तलाश थी. 20 अक्टूबर, 1962 को चीन ने देश पर हमला कर दिया था. हिंदुस्तानी फ़ौज को भारी नुक़सान हुआ था और फ़ौज को पीछे हटना पड़ा. इस थीम पर चेतन आनंद हक़ीक़त नाम से फ़िल्म बनाना चाहते थे. उन्होंने प्रिया राजवंश से संपर्क किया और उन्हें फ़िल्म की नायिका के लिए चुन लिया गया. 1964 में बनी इस फ़िल्म के निर्माण के दौरान प्रिया राजवंश ने चेतन आनंद की हर स्तर पर मदद की. संवाद लेखन से लेकर पटकथा लेखन, निर्देशन, अभिनय और संपादन तक में उनका दख़ल रहा. चेतन आनंद उन दिनों अपनी पत्नी उमा से अलग हो चुके थे. इसी दौरान प्रिया राजवंश और चेतन आनंद एक दूसरे के क़रीब आ गए और फिर ज़िंदगी भर साथ रहे. प्रिया राजवंश उम्र में चेतन आनंद से तक़रीबन 22 साल छोटी थीं, लेकिन उम्र का फ़ासला उनके बीच कभी नहीं आया.

प्रिया राजवंश ने बहुत कम फ़िल्मों में काम किया. फ़िल्म हक़ीक़त के बाद 1970 में उनकी फ़िल्म हीर रांझा आई. 1973 में हिंदुस्तान की क़सम और हंसते ज़ख्म, 1977 में साहेब बहादुर, 1981 में क़ुदरत और 1985 में हाथों की लकीरें आई. प्रिया राजवंश ने सिर्फ़ चेतन आनंद की फ़िल्मों में ही काम किया और चेतन ने भी हक़ीक़त के बाद प्रिया राजवंश को ही अपनी हर फ़िल्म में नायिका बनाया. उन्हें फ़िल्मों के बहुत से प्रस्ताव मिलते थे, लेकिन वह इंकार कर देती थीं. उनकी खुशी तो सिर्फ़ और सिर्फ़ चेतन आनंद के साथ थी. हालांकि दोनों ने विवाह नहीं किया था, लेकिन फ़िल्मी दुनिया में उन्हें पति-पत्नी ही माना जाता था. चेतन आनंद के साथ अपनी छोटी सी दुनिया में वह बहुत सुखी थीं. कहा जाता है कि हीर रांझा प्रिया राजवंश को केंद्र में रखकर ही बनाई गई थी. इस फ़िल्म की ख़ासियत यह है कि इसके सारे संवाद पद्य यानी काव्य रूप में हैं, जिन्हें कैफ़ी आज़मी ने लिखा था. इसे काव्य फ़िल्म कहना ग़लत न होगा. इसके गीत भी कैफ़ी आज़मी ने ही लिखे थे. प्रिया राजवंश पर फ़िल्माया गया गीत-मिलो न तुम तो, हम घबराएं, मिलो तो आंख चुराएं, हमें क्या हो गया है…बहुत मशहूर हुआ. इसी तरह फ़िल्म हंसते जख्म का कैफ़ी आज़मी का लिखा और मदन मोहन के संगीत से सजा गीत-बेताब दिल की तमन्ना यही है…आज भी लोग गुनगुना उठते हैं.

अंग्रेज़ी के लेखक आरके नारायण के उपन्यास गाइड पर आधारित फ़िल्म गाइड बनाने के वक़्त पहला विवाद नायिका को लेकर ही हुआ था. देव आनंद माला सिन्हा को नायिका रोज़ी की भूमिका के लिए लेना चाहते थे, लेकिन चेतन की पसंद प्रिया राजवंश थीं. विजय आनंद का मानना था कि रोज़ी की भूमिका वहीदा रहमान से बेहतर कोई और अभिनेत्री नहीं निभा सकती, लेकिन वहीदा रहमान राज खोसला के साथ काम नहीं करती थीं. दरअसल, हुआ यह था कि देव आनंद गाइड के निर्देशन के लिए पहले ही राज खोसला से बात कर चुके थे. अब उन्हें राज खोसला और वहीदा रहमान में से किसी एक को चुनना था. चेतन आनंद और विजय आनंद ने वहीदा का समर्थन किया और फिर चेतन आनंद की सलाह पर निर्देशन की ज़िम्मेदारी विजय आनंद को सौंप दी गई. वहीदा रहमान ने कमाल का अभिनय किया और फ़िल्म मील का पत्थर साबित हुई.

प्रिया राजवंश की ज़िंदगी में अकेलापन और परेशानियां उस वक़्त आईं, जब 6 फ़रवरी, 1997 को चेतन आनंद का देहांत हो गया. प्रिया राजवंश अकेली रह गईं. वह जिस बंगले में रहती थीं, उसकी क़ीमत दिनोदिन बढ़ती जा रही थी. चेतन के बेटे केतन आनंद और विवेक आनंद प्रिया राजवंश को इस बंगले से निकाल देना चाहते थे, लेकिन जब वे इसमें कामयाब नहीं हो पाए तो उन्होंने नौकरानी माला चौधरी और अशोक स्वामी के साथ मिलकर 27 मार्च, 2000 को प्रिया राजवंश का बेहरहमी से क़त्ल कर दिया. मुंबई की एक अदालत ने प्रिया राजवंश हत्याकांड में 31 जुलाई, 2002 को केतन आनंद और विवेक आनंद तथा उनके सहयोगियों नौकरानी माला चौधरी और अशोक स्वामी को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई.

कुछ अरसा पहले चेतन आनंद की ज़िंदगी पर आधारित उनकी पत्नी उमा और बेटे केतन आनंद की एक किताब आई थी. इस किताब में ज़िंदगीभर चेतन आनंद के साथ रहने वाली प्रिया राजवंश का ज़िक्र नहीं के बराबर है. दरअसल, चेतन आनंद ने अपने लिए अलग एक बंगला बनवाया था, जिसमें वह प्रिया राजवंश के साथ रहा करते थे. यही बंगला बाद में प्रिया राजवंश की मौत की वजह बना यानी एक बंगले के लालच ने प्रिया राजवंश से उनकी ज़िंदगी छीन ली. वह अपने घर में मृत पाई गई थीं. उनके हत्यारों को तो अदालत ने सज़ा दे दी, लेकिन उनके प्रशंसक शायद ही उनके क़ातिलों को कभी मा़फ़ कर पाएं. अपनी फ़िल्मों की बदौलत वह हमेशा हमारे बीच रहेंगी, मुस्कराती और चहकती हुई. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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उनकी आंखें...


एक तस्वीर है, जो हमेशा हमारी डायरी में रहती है... जब भी मन उदास होता है... हम उस तस्वीर को देखते रहते हैं... घंटों ऐसे ही बीत जाते हैं, पता नहीं चलता कि कब दोपहर से शाम हुई और कब रात से सुबह हो गई. अपनी पूरी उम्र उस तस्वीर को देखते रह सकते हैं...
कितनी सच्ची हैं उनकी आंखें... कितनी मुहब्बत है उन आंखों में... पापा की आंखों में भी बहुत मुहब्बत थी... जब भी कोई दिल दुखाता है, तो दिल चाहता है कि पापा की गोद में सर रख कर बहुत रोयें... पर हम ऐसा नहीं कर सकते... क्योंकि पापा तो क़ब्र में सो रहे हैं... काश ! हम भी पापा की क़ब्र में जाकर उनके सीने पर सर रख कर कुछ देर सुकून से सो सकते... जिस तरह बचपन में सोया करते थे...
पापा के जाने के बाद उनकी आंखों में वो मुहब्बत देखी,  जिसके आगे दोनों जहां की हर शय छोटी मालूम होती है... इसलिए उनके साये में हमारी रूह सुकून पाती है...

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पापा ! आप बहुत याद आते हो...


बचपन में सुना था... जब कोई मर जाता है, तो वह तारा बन जाता है... आसमान में चमकता हुआ एक सितारा... यह बात साईंस से परे की है... सिर्फ़ मानने या न मानने की... रात में जब भी आसमान को देखते हैं, तो लगता है कि पापा भी सितारा बन गए होंगे... आसमान में चमकते अनगिनत सितारों में किसी एक सितारे के रूप में पापा भी होंगे... जो हमें देख रहे होंगे... बस हमने भी एक सितारा तलाश लिया... वही सितारा, जो चमेली के पास बैठने पर आसमान में अपने सबसे क़रीब नज़र आता है... चम्पा के महकते फूलों के गुच्छे के ठीक ऊपर... अब यह हर रोज़ का शग़ल बन गया है... चमेली के पास चटाई बिछाकर बैठ जाना और आसमान में चमकते सितारे को देखना... ऐसा लगता है, जैसे पापा भी रोज़ रात को हमारे आने का इंतज़ार करते हैं...
वो भी अपने पापा से इतना ही प्यार करते हैं, क्या वो भी अपने पापा को इस तरह आसमान में सितारों के बीच तलाशते होंगे... कभी पूछेंगे उनसे...
पापा ! आप बहुत याद आते हो... मिस यू...
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पापा की बरसी


ज़िन्दगी में कुछ वाक़ियात ऐसे हुआ करते हैं, जो इंसान को भीतर से तोड़ देते हैं... पापा का जाना भी एक ऐसा ही वाक़िया है... कहते हैं कि किसी लड़की का किसी मर्द से पहला प्यार, उसके वालिद से ही होता है... बिल्कुल सच है... पापा से हमें कितनी मुहब्बत है, इसका अहसास पापा के जाने के बाद ही हुआ...
पापा को इस दुनिया से गए छह साल हो गए हैं, लेकिन ये कल ही की बात लगती है... उस दिन 8 जुमादा उल अव्वल 1432 हिजरी का पीर की रात थी... अंग्रेज़ी कैलेंडर के हिसाब से 11 अप्रैल 2011 थी... आज पापा की बरसी है...
पापा की याद को समर्पित एक नज़्म...

पापा
आप बहुत याद आते हो...
मैं जानती हूं
अब आप इस दुनिया में नहीं हो
लेकिन
दिल हरगिज़ ये मानने को राज़ी नहीं
कि आप इस दुनिया से चले गए...

पापा
आप आज भी मुझमें ज़िन्दा हो
हर आहट पर लगता है
आप आओगे और पूछोगे
मेरी शहज़ादी कैसी है...

पापा
आपसे बिछड़ कर
आपकी शहज़ादी बहुत उदास रहती है
क्योंकि
आपकी तरह उसे चाहने वाला कोई नहीं

पापा
उस दिन का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा
जब आपकी शहज़ादी आपके पास होगी
और
फिर हम हमेशा साथ रहेंगे...
-फ़िरदौस ख़ान
अल्लाह हमारे पापा की मग़फ़िरत करे और उन्हें जन्नतुल-फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता करे, आमीन...


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दोस्ती...रफ़ाक़त...एक अनछुआ अहसास है...


दोस्ती...रफ़ाक़त...एक अनछुआ अहसास है...रफ़ाक़त का यह जज़्बा, हवा के उस झोंके की मानिंद नहीं, जो खुली, महकी ज़ुल्फ़ों से एक पल के लिए अठखेलियां करता गुज़र जाए...किसी अनजान दिशा में...बल्कि यह तो वो दायिमी अहसास है जो रूह की गहराई में उतर जाता है...हमेशा के लिए...फिर यही अहसास आंखों में समाकर मुसर्रत और होंठों पर आकर दुआ बन जाता है...दोस्ती को किसी दायरे में क़ैद नहीं किया जा सकता...यह अहसास ओस की कोई बूंद नहीं जो ज़रा-सी गर्मी से फ़ना हो जाए...यह तो वो अहसास है जो नीले आसमान की तरह वसीह और समन्दर की मानिंद गहरा है...
फ्रांसिस बेकन ने बेहद ख़ूबसूरत अंदाज़ में दोस्ती के इस जज़्बे को बयान किया है... वे कहते हैं...
A man cannot speak to his son but as a father; to his wife but as a husband; to his enemy but upon terms: whereas a friend may speak as the case requires, and not as it sorteth with the person. But to enumerate these things were endless; I have given the rule, where a man cannot fitly play his own part; if he have not a friend, he may quit the stage.
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अच्छे दोस्त क़िस्मत से ही मिला करते हैं


हमारे दोस्तों में अमूमन सभी तरह के लोग हैं... आस्तिक हैं, नास्तिक भी हैं... ईसाई भी हैं, मुस्लिम भी हैं, हिन्दू भी हैं, सिख भी हैं...
संघी भी हैं, जमाती भी हैं. कम्युनिस्ट भी हैं, कांग्रेसी भी हैं, समाजवादी भी हैं...
शाकाहारी भी हैं, मांसाहारी भी हैं... ऐसे लोग भी हैं, जो शराब तो क्या सिगरेट तक को हाथ नहीं लगाते. ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें शाराब न मिले, तो नींद नहीं आती...
सबसे बड़ी बात ये है कि हमारे दोस्तों में ऐसा कोई नहीं है, जो जबरन सामने वाले से अपनी बात मनवाने की कोशिश करे, और उसकी बात न मानने पर दोस्ती ख़त्म कर दे...
हमारे आपस में मतभेद हो सकते हैं, हुए भी हैं, लेकिन मनभेद कभी नहीं हुआ... यही सबसे ख़ुशनुमा बात है... हमें अपने दोस्तों पर नाज़ है... अच्छे दोस्त क़िस्मत से ही मिला करते हैं... हैं न...

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ख़ुशी


फ़िरदौस ख़ान
कभी-कभार इंसान बहुत ख़ुश होता है... इतना ख़ुश कि उसे लगता है, सारी कायनात ख़ुशी से झूम रही है... वो अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करना चाहता है, सबको बता देना चाहता है कि आज वो बहुत ख़ुश है... उसे वो ख़ुशी मिली है, जिसका वो तसव्वुर भी नहीं कर सकता था... उसे वो ख़ुशी मिली है, जिसे पाना उसके लिए नामुमकिन था... लेकिन ख़ुदा के लिए कुछ भी नामुमकिन नहीं है... ख़ुदा इंसान के लिए नामुमकिन को भी मुमकिन कर देता है... ऐसे में दिल चाहता है कि जी भर कर अपने ख़ुदा का शुक्र अदा करें, और सजदे में ही पड़े रहें...
बस, एक ऐसी ख़ुशी ज़िन्दगी को मुकम्मल कर दिया करती है...

अगर देखी जहां में तो नबूवत आपकी देखी
करम देखा, अमल देखा, मिसाले-ज़िन्दगी देखी
न हो मायूस पंछी, इक ज़ियारत यूं भी होती है
उसी को देख जिसने मदीने की गली देखी...

(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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सूफ़ियाना बसंत पंचमी...

फ़िरदौस ख़ान
सूफ़ियों के लिए बंसत पंचमी का दिन बहुत ख़ास होता है... हमारे पीर की ख़ानकाह में बसंत पंचमी मनाई गई... बसंत का साफ़ा बांधे मुरीदों ने बसंत के गीत गाए... हमने भी अपने पीर को मुबारकबाद दी...

बसंत पंचमी के दिन मज़ारों पीली चादरें चढ़ाई जाती हैं, पीले फूल चढ़ाए जाते हैं... क़व्वाल पीले साफ़े बांधकर हज़रत अमीर ख़ुसरो के गीत गाते हैं...
कहा जाता है कि यह रिवायत हज़रत अमीर ख़ुसरो ने शुरू की थी... हुआ यूं कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (रह) को अपने भांजे सैयद नूह की मौत से बहुत सदमा पहुंचा और वह उदास रहने लगे. हज़रत अमीर ख़ुसरो से अपने पीर की ये हालत देखी न गई... वह उन्हें ख़ुश करने के जतन करने लगे... एक बार हज़रत अमीर ख़ुसरो अपने साथियों के साथ कहीं जा रहे थे... उन्होंने देखा कि एक मंदिर के पास हिन्दू श्रद्धालु नाच-गा रहे हैं... ये देखकर हज़रत अमीर ख़ुसरो को बहुत अच्छा लगा... उन्होंने इस बारे में मालूमात की कि तो श्रद्धालुओं ने बताया कि आज बसंत पंचमी है और वे लोग देवी सरस्वती पर पीले फूल चढ़ाने जा रहे हैं, ताकि देवी ख़ुश हो जाए...
इस पर हज़रत अमीर ख़ुसरो ने सोचा कि वह भी अपने औलिया को पीले फूल देकर ख़ुश करेंगे... फिर क्या था. उन्होंने पीले फूलों के गुच्छे बनाए और नाचते-गाते हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (रह) के पास पहुंच गए... अपने मुरीद को इस तरह देखकर उनके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई... तब से हज़रत अमीर ख़ुसरो बसंत पंचमी मनाने लगे...

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ऋतु बसंत की मादक बेला, तुझ बिन सूनी ओ हरजाई



आज बसंत पंचमी है... इस मौसम से बहुत-सी यादें वाबस्ता हैं... जैसे आज के दिन पीले कपड़े पहनना...कवि सम्मलेन आयोजित करना...और सभी से ग़ुज़ारिश करना कि वे पीले कपड़े पहनकर आएं... सभी साथी कई रोज़ पहले से ही बसंत पंचमी के लिए पीले कपड़े ख़रीदने और सिलवाने शुरू कर देते थे... हमारा एक ग्रुप हुआ करता था... सभी पत्रकार थे... उनमें कुछ कवि और कुछ साहित्य प्रेमी थे... सब दूर-दूर शहरों में जा बसे हैं...
बहरहाल, आप सभी को बसंत पंचमी की तहे-दिल से मुबारकबाद...

गीत
ऋतु बसंत की मादक बेला
तुझ बिन सूनी ओ हरजाई
मन का दर्पण बिखरा-बिखरा
जैसे अम्बर की तन्हाई...

कंगन, पायल, झूमर, झांझर
सांझ सुहानी, नदी किनारा
आकुल, आतुर, विरह-व्यथित मन
पंथ प्रिय का देख के हारा
कल की यादें बांह में ले के
मुझको सता रही अमराई...

क्षण, रैना, दिन सब ही बीते
बीत गईं कितनी सदियां
नयन मिलन की आस लिए हैं
ले भूली-बिसरी सुधियां
अंग-अंग जल उठे विरह में
ऐसी मंद चली पुरवाई...
-फ़िरदौस ख़ान

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