ठहराव


ठहराव शायद कभी भी अच्छा नहीं होता... ठहराव बुरा हो, तो तकलीफ़ देता है... और अगर अच्छा हो, तो भी उससे कोफ़्त होने लगती है... शायद इसीलिए क़ुदरत की हर चीज़ में रवानी है... वक़्त का दरिया भी मुसलसल बहता रहता है और ज़िन्दगी भी तो चलते रहने का ही नाम है...
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ईस्टर संडे


ये त्यौहार ही तो हुआ करते हैं, जब लोग इकट्ठे होते हैं... एक-दूजे से मिलते हैं... कुछ अपनी कहते हैं, कुछ अपनी सुनाते हैं...
हमारी कई सहेलियां हैं, जो विदेशों में रहती हैं... त्यौहार के मौक़े पर वे अपने मायके आती हैं और उनसे मुलाक़ात हो जाती है... ये त्यौहार हमें आपस में जोड़े रखते हैं, बहुत-सी यादें ताज़ा हो जाती हैं... कल कई सहेलियों से मुलाक़ात हुई... वाक़ई कल का दिन बहुत प्यारा था, एक यादगार दिन था...

कल ईस्टर संडे था... ईस्टर संडे, गुड फ़्राइडे के बाद आने वाले इतवार को मनाया जाता है... ईसाई मान्यता के मुताबिक़ सलीब पर चढ़ाए जाने के बाद तीसरे दिन यीशु (ईसा मसीह) दोबारा ज़िन्दा हो गए थे... ईस्टर ख़ुशी का दिन होता है... इस त्यौहार को ज़िन्दगी में नये बदलाव के प्रतीक के तौर पर मनाए जाने की रिवायत है. यीशु के चाहने वाले गिरजाघर जाते हैं, अपने ईष्ट को याद करते हैं, प्रभु भोज में शामिल होते हैं और एक-दूसरे को मुबारकबाद देते हैं...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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गुड फ़्राइडे


आज गुड फ़्राइडे है... गुड फ्राइडे को होली फ्राइडे, ब्लैक फ्राइडे या ग्रेट फ्राइडे भी कहा जाता है... आज के दिन हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को सलीब पर चढ़ाया गया था...
हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम आज भी हयात हैं और क़यामत से पहले लोगों के सामने आएंगे...
किताबों के मुताबिक़ एक दिन सुबह की नमाज़ के वक़्त और एक रिवायत के मुताबिक़ अस्र की नमाज़ के वक़्त हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम दो फ़रिश्तों के कांधों पर हाथ रखे हुए दमिश्क की जामा मस्जिद के शरक़ी मीनार पर नुज़ूल फ़रमाएंगे. हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम उनका इस्तक़बाल करेंगे कि आप नमाज़ पढ़ाइये. हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम कहेंगे कि यह मुमकिन नहीं है, आप ही नमाज़ पढ़ाइये. लिहाज़ा इमाम महदी अलैहिस्सलाम इमामत फ़रमाएंगे और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम उनके पीछे नमाज़ पढ़ेंगे और उनकी तस्दीक़ करेंगे.
(नूर उल अबसार सफ़ा न.154 व ग़ायत उल मक़सूद सफ़ा न. 104से 154 व मिशकात सफ़ा न. 458)
उस वक़्त हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की उम्र चालीस साल के जवान जैसी होगी और आप इस दुनिया में शादी करेंगे और उनके दो लड़के पैदा होंगे, एक नाम अहमद और दूसरे का नाम मूसा होगा.


(औसाफ़ उर राग़ेबीन व क़ियामत नामा सफ़ा न. 9 व सिराज उल क़ुलूब सफ़ा न. 77)
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होलिया में उड़े रे गुलाल...


फ़िरदौस ख़ान
होली...
मुझे बहुत अज़ीज़ है
क्योंकि
इसके इंद्रधनुषी रंगों में
इश्क़ का रंग भी शामिल है...
हिन्दुस्तानी त्योहार हमें बचपन से ही आकर्षित करते रहे हैं, क्योंकि ये त्योहार मौसम से जुड़े होते हैं, प्रकृति से जुड़े होते हैं. हर त्योहार का अपना ही रंग है, बिल्कुल मन को रंग देने वाला. बसंत पंचमी के बाद रंगों के त्योहार होली का उल्लास वातावरण को उमंग से भर देता है. होली से कई दिन पहले बाज़ारों, गलियों और हाटों में रंग, पिचकारियां सजने लगती हैं. छोटे क़स्बों और गांवों में होली का उल्लास देखते ही बनता है. महिलाएं कई दिन पहले से ही होलिका दहन के लिए भरभोलिए बनाने लगती हैं. भरभोलिए गाय के गोबर से बने उन उपलों को कहा जाता है, जिनके बीच में छेद होता है. इन भरभेलियों को मूंज की रस्सी में पिरोकर माला बनाई जाती है. हर माला में सात भरभोलिए होते हैं. इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घुमाने के बाद होलिका दहन में डाल दिया जाता है. होली का सबसे पहला काम झंडा लगाना है. यह झंडा उस जगह लगाया जाता है, जहां होलिका दहन होना होता है. मर्द और बच्चों चैराहों पर लकड़िया इकट्ठी करते हैं. होलिका दहन के दिन दोपहर में विधिवत रूप से इसकी पूजा-अर्चना की जाती है. महिलाएं पारंपरिक गीत गाते हुए घरों में पकवानों का भोग लगाती हैं. रात में मुहूर्त के समय होलिका दहन किया जाता है. किसान गेहूं और चने की अपनी फ़सल की बालियों को इस आग में भूनते हैं. देर रात तक होली के गीत गाए जाते हैं और लोग नाचकर अपनी ख़ुशी का इज़हार करते हैं.
होली के अगले दिन को फाग, दुलहंदी और धूलिवंदन आदि नामों से पुकारा जाता है. हर राज्य में इस दिन को अलग नाम से जाना जाता है. बिहार में होली को फगुआ या फागुन पूर्णिमा कहते हैं. फगु का मतलब होता है, लाल रंग और पूरा चांद. पूर्णिमा का चांद पूरा ही होता है. हरित प्रदेश हरियाणा में इसे धुलैंडी कहा जाता है. इस दिन महिलाएं अपने पल्लू में ईंट आदि बांधकर अपने देवरों को पीटती हैं. यह सब हंसी-मज़ाक़ का ही एक हिस्सा होता है. महाराष्ट्र में होली को रंगपंचमी और शिमगो के नाम से जाना जाता है. यहां के आम बाशिंदे जहां रंग खेलकर होली मनाते हैं, वहीं मछुआरे नाच के कार्यक्रमों का आयोजन कर शिमगो मनाते हैं. पश्चिम बंगाल में होली को दोल जात्रा के नाम से पुकारा जाता है. इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधा की मूर्तियों का मनोहारी श्रृंगार कर शोभा यात्रा निकाली जाती है. शोभा यात्रा में शामिल लोग नाचते-गाते और रंग उड़ाते चलते हैं. तमिलनाडु में होली को कामान पंडिगई के नाम से पुकारा जाता है. इस दिन कामदेव की पूजा की जाती है. किवदंती है कि शिवजी के क्रोध के कारण कामदेव जलकर भस्म हो गए थे और उनकी पत्नी रति की प्रार्थना पर उन्हें दोबारा जीवनदान मिला.
इस दिन सुबह से ही लोग रंगों से खेलना शुरू कर देते हैं. बच्चे-बड़े सब अपनी-अपनी टोलियां बनाकर निकल पड़ते हैं. ये टोलियां नाचते-गाते रंग उड़ाते चलती हैं. रास्ते जो मिल जाए, उसे रंग से सराबोर कर दिया जाता है. महिलाएं भी अपने आस पड़ोस की महिलाओं के साथ इस दिन का भरपूर लुत्फ़ उठाती हैं. इस दिन दही की मटकियां ऊंचाई पर लटका दी जाती हैं और मटकी तोड़ने वाले को आकर्षक इनाम दिया जाता है. इसलिए युवक इसमें बढ़-चढ़कर शिरकत करते हैं.
रंग का यह कार्यक्रम सिर्फ़ दोपहर तक ही चलता है. रंग खेलने के बाद लोग नहाते हैं और भोजन आदि के बाद कुछ देर विश्राम करने के बाद शाम को फिर से निकल पड़ते हैं. मगर अब कार्यक्रम होता है, गाने-बजाने का और प्रीति भोज का. अब तो होली से पहले ही स्कूल, कॊलेजों व अन्य संस्थानों में होली के उपलक्ष्य में समारोहों का आयोजन किया जाता है. होली के दिन घरों में कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं, जिनमें खीर, पूरी और गुझिया शामिल है. गुझिया होली का ख़ास पकवान है. पेय में ठंडाई और भांग का विशेष स्थान है.
होली एक ऐसा त्योहार है, जिसने मुग़ल शासकों को भी प्रभावित किया. अकबर और जहांगीर भी होली खेलते थे. शाहजहां के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी और आब-ए-पाशी के नाम से पुकारा जाता था. पानी की बौछार को आब-ए-पाशी कहते हैं. आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र भी होली मनाते थे. इस दिन मंत्री बादशाह को रंग लगाकर होली की शुभकामनाएं देते थे. पर्यटक अलबरूनी ने अपने ऐतिहासिक सफ़रनामे मे होली का ख़ास तौर पर ज़िक्र किया है. हिन्दू साहित्यकारों ही नहीं मुस्लिम सूफ़ियों ने भी होली को लेकर अनेक कालजयी रचनाएं रची हैं. अमीर ख़ुसरो साहब कहते हैं-
मोहे अपने ही रंग में रंग दे
तू तो साहिब मेरा महबूब ऐ इलाही
हमारी चुनरिया पिया की पयरिया वो तो दोनों बसंती रंग दे
जो तो मांगे रंग की रंगाई मोरा जोबन गिरबी रख ले
आन परी दरबार तिहारे
मोरी लाज शर्म सब ले
मोहे अपने ही रंग में रंग दे...
होली के दिन कुछ लोग पक्के रंगों का भी इस्तेमाल करते हैं, जिसके कारण जहां उसे हटाने में कड़ी मशक़्क़त करनी पड़ती है, वहीं इससे एलर्जी होने का ख़तरा भी बना रहता है. हम और हमारे सभी परिचित हर्बल रंगों से ही होली खेलते हैं. इन चटक़ रंगों में गुलाबों की महक भी शामिल होती है. इन दिनों पलाश खिले हैं. इस बार भी इनके फूलों के रंग से ही होली खेलने का मन है.

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मिट्टी के कोरे कूंडे टंगे हैं...

गरमी से बेहाल
प्यासी चिड़ियों के लिए
घने दरख्तों की शाख़ों पर
ठंडे पानी से भरे
मिट्टी के कोरे कूंडे टंगे हैं...
किसी न ख़त्म होने वाले
सवाब की तरह...
-फ़िरदौस ख़ान
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बेल के दरख़्त


तीज-त्यौहारों से बहुत सी ख़ूबसूरत यादें वाबस्ता हुआ करती हैं... शिवरात्रि भी एक ऐसा ही त्यौहार है... बहुत साल पहले हमने भी अपनी सहेली की मां के लिए बेल पत्र तोड़े थे... घर के पास वाले पार्क में बेल के कई दरख़्त थे... हम सुबह सवेरे अपनी सहेली के साथ पार्क जाते और बेल के बहुत से पत्ते तोड़ते... उसी से हमें पता चला कि शिवजी की पूजा के लिए किस तरह के बेल पत्र तोड़े जाते हैं... कोई भी पता खंडित नहीं होना चाहिए...
बेल के दरख़्त फलों से लदे हुए हैं... हमें बेल बहुत पसंद है... बेल के शर्बत के तो कहने ही क्या... रूहअफ़्ज़ा के अलावा बेल का शर्बत ही हमें सबसे ज़्यादा भाता है... गर्मियों में बेल का शर्बत ख़ूब बिकता है...
आज शिवभक्त शिवालय पर अर्पण के लिए बेल पत्र तोड़ रहे हैं... आज महाशिवरात्रि पर बेल के दरख़्त को देखकर बीते दिन याद आ गए...
अपना एक शेअर याद आ गया-
कोई सहरा भी नहीं, कोई समंदर भी नहीं
अश्क आंखों में हैं वीरान शिवालों की तरह...

मुहम्मद अल्लामा इक़बाल साहब ने भी क्या ख़ूब कहा है-
सूनी पड़ी हुई है मुद्दत से दिल की बस्ती
आ एक नया शिवाला इस देश में बना दें...
बहरहाल, आप सभी को महाशिवरात्रि की मंगलकामनाएं...
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कहानी मार्च की


मार्च... रोमन देवता 'मार्स' के नाम पर मार्च महीने का नाम रखा गया... रोमन साल की शुरुआत इसी महीने से होता थी... मार्स मार्टिअस का अपभ्रंश है, जो आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है... सर्दियों का मौसम ख़त्म होने पर लोग दुश्मन देश पर हमला करते थे, इसलिए इस महीने का नाम मार्च रखा गया... ये महीना अपने साथ रंगों का त्यौहार होली लेकर आया है...

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