मुहब्बत की महक


मेरे महबूब !
इन हवाओं में
मुहब्बत की महक है
लगता है
तुम्हें छूकर आई हैं...
-फ़िरदौस ख़ान
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उर्स


उर्स... औलियाओं की बरसी पर जो जश्न मनाया जाता है, उसे उर्स कहा जाता है... औलिया ख़ुदा को चाहने वाले हैं... ख़ुदा ही उनका महबूब है... उनकी मौत को विसाल कहा जाता है... विसाल का मतलब महबूब से मिलन होता है... उर्स उनके विसाल की सालगिरह के तौर पर मनाया जाता है...
उर्स के मौक़े पर दरगाहों को सजाया जाता है... चिराग़ रौशन किए जाते हैं, चादरें चढ़ाई जाती हैं... फूल चढ़ाए जाते हैं... क़व्वालियां होती हैं, खाने पकते हैं और तबर्रुक बांटा जाता है... दूर-दूर से ज़ायरीन ज़ियारत के लिए आते हैं...
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जुमेरात...


28 जनवरी, 2016... जुमेरात का दिन, एक यादगार दिन था... कभी न भूलने वाला दिन... मुहब्बत की शिद्दत से सराबोर दिन, इबादत से लबरेज़ दिन, एक रूहानी दिन... दिल चाह रहा था कि वक़्त बस यहीं थम जाए और इसी वक़्त में पूरी ज़िन्दगी बीत जाए...
इतना सुकून कि कोई तसव्वुर तक न कर सके... इतनी रूहानियत कि बड़े से बड़ा काफ़िर भी कलमा पढ़ ले...
ये जुमेरात बरसों याद रहेगी... जुमेरात का दिन औलियाओं की ज़ियारत का दिन... इबादत ख़ाने में बैठकर इबादत करने का दिन... मन्नतें मानने का दिन... उन्होंने हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की ज़ियारत की, चादर चढ़ाई और अपनी अक़ीदत के फूल पेश किए...
अल्लाह हमेशा उनका निगेहबान रहे और दोनों जहां में उन्हें कामयाब करे, आमीन...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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नज़्म और शदीद मुहब्बत


यूं तो हर शायरा को अपनी हर नज़्म अज़ीज़ हुआ करती है, लेकिन कुछ कलाम ऐसे होते हैं, जिनसे कुछ ज़्यादा ही उन्सियत होती है... हमें भी अपनी एक नज़्म बहुत पसंद है... इसे बार-बार पढ़ने को जी चाहता है... शायद इसलिए कि इसमें अपने महबूब के लिए शदीद मुहब्बत का इज़हार किया गया है... ये नज़्म हमने उनके लिए लिखी थी, जिनके क़दमों में हम अपनी अक़ीदत के फूल चढ़ाते हैं...

मेरे महबूब...
नज़्म
मेरे महबूब !
उम्र की
तपती दोपहरी में
घने दरख़्त की
छांव हो तुम
सुलगती हुई
शब की तन्हाई में
दूधिया चांदनी की
ठंडक हो तुम
ज़िन्दगी के
बंजर सहरा में
आबे-ज़मज़म का
बहता दरिया हो तुम
मैं
सदियों की
प्यासी धरती हूं
बरसता-भीगता
सावन हो तुम
मुझ जोगन के
मन-मंदिर में बसी
मूरत हो तुम
मेरे महबूब
मेरे ताबिन्दा ख़्यालों में
कभी देखो
सरापा अपना
मैंने
दुनिया से छुपकर
बरसों
तुम्हारी परस्तिश की है...
-फ़िरदौस ख़ान
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रिश्तों की वो गरमाहट चली गई...


फ़िरदौस ख़ान
ज़िंदगी की जद्दोजहद ने इंसान को जितना मसरूफ़ बना दिया है, उतना ही उसे अकेला भी कर दिया है. हालांकि आधुनिक संचार के साधनों ने दुनिया को एक दायरे में समेट दिया है. मोबाइल, इंटरनेट के ज़रिये सात समंदर पार किसी भी पल किसी से भी बात की जा सकती है. इसके बावजूद इंसान बहुत अकेला दिखाई देता है. बहुत ही अकेला, क्योंकि आज के दौर में 'अपनापन' जैसे जज़्बे कहीं पीछे छूट गए हैं. अब रिश्तों में वह गरमाहट नहीं रही, जो पहले कभी हुआ करती थी. पहले लोग संयुक्त परिवार में रहा करते थे. पुरुष बाहर कमाने जाया करते थे और महिलाएं मिल जुलकर घर-परिवार का कामकाज किया करती थीं. परिवार के सदस्यों में एक-दूसरे के लिए आदर-सम्मान और अपनापन हुआ करता था. लेकिन अब संयुक्त परिवार टूटकर एकल हो रहे हैं. महिलाएं भी कमाने के लिए घर से बाहर जा रही हैं. उनके पास बच्चों के लिए ज़्यादा वक़्त नहीं है. बच्चों का भी ज़्यादा वक़्त घर से बाहर ही बीतता है. सुबह स्कूल जाना, होम वर्क करना, फिर ट्यूशन के लिए जाना और उसके बाद खेलने जाना. जो वक़्त मिलता है, उसमें भी बच्चे मोबाइल या फिर कंप्यूटर पर गेम खेलते हैं. ऐसे में न माता-पिता के पास बच्चों के लिए वक़्त है और न ही बच्चों के पास अपने बड़ों के लिए है.

ज़िंदगी की आपाधापी में रिश्ते कहीं खो गए हैं. शायद, इसीलिए, अब लोग परछाइयों यानी वर्चुअल दुनिया में रिश्ते तलाशने लगे हैं. लेकिन अफ़सोस यहां भी वे रिश्तों के नाम पर ठगे जा रहे हैं. सोशल नेटवर्किंग साइट पर ज़्यादातर प्रोफ़ाइल फ़ेक होते हैं, या फिर उनमें ग़लत जानकारी दी गई होती है. झूठ की बुनियाद पर बनाए गए रिश्तों की उम्र बस उस वक़्त तक ही होती है, जब तक झूठ पर पर्दा पड़ा रहता है. लेकिन जैसे ही सच सामने आता है, वह रिश्ता भी दम तोड़ देता है.  अगर किसी इंसान को कोई अच्छा लगता है और वह उससे उम्रभर का रिश्ता रखना चाहता है, तो उसे सामने वाले व्यक्ति से झूठ नहीं बोलना चाहिए. जिस दिन उसका झूठ सामने आ जाएगा. उस वक़्त उसका रिश्ता तो टूट ही जाएगा, साथ ही वह हमेशा के लिए नज़रों से भी गिर जाएगा. कहते हैं- इंसान पहाड़ से गिरकर तो उठ सकता है, लेकिन नज़रों से गिरकर कभी नहीं उठ सकता. ऐसा भी देखने में आया है कि कुछ अपराधी प्रवृति के लोग ख़ुद को अति सभ्य व्यक्ति बताते हुए महिलाओं से दोस्ती गांठते हैं, फिर प्यार के दावे करते हैं. बाद में पता चलता है कि वे शादीशुदा हैं और कई बच्चों के बाप हैं. दरअसल, ऐसे बाप टाईप लोग हीन भावना का शिकार होते हैं. अपराधी प्रवृति के कारण उनकी न घर में इज्ज़त होती है और न ही बाहर. उनकी हालत धोबी के कुत्ते जैसी होकर रह जाती है यानी धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का. ऐसे में वे सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपना अच्छा-सा प्रोफ़ाइल बनाकर ख़ुद को महान साबित करने की कोशिश करते हैं. वे ख़ुद को अति बुद्धिमान, अमीर और न जाने क्या-क्या बताते हैं, जबकि हक़ीक़त में उनकी कोई औक़ात नहीं होती. ऐसे लोगों की सबसे बड़ी 'उपलब्धि' यही होती है कि ये अपने मित्रों की सूची में ज़्यादा से ज़्यादा महिलाओं को शामिल करते हैं. कोई महिला अपने स्टेट्स में कुछ भी लिख दे, फ़ौरन उसे 'लाइक' करेंगे, कमेंट्स करेंगे और उसे चने के झाड़ पर चढ़ा देंगे.  ऐसे लोग समय-समय पर महिलाएं बदलते रहते हैं, यानी आज इसकी प्रशंसा की जा रही है, तो कल किसी और की. लेकिन कहते हैं न कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती.

वक़्त दर वक़्त ऐसे मामले सामने आते रहते हैं. ब्रिटेन में हुए एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि ऑनलाइन रोमांस के चक्कर में तक़रीबन दो लाख लोग धोखा खा चुके हैं. धोखा देने वाले लोग अपनी असली पहचान छुपाकर रखते थे और आकर्षक मॉडल और सेना अधिकारी की तस्वीर अपनी प्रोफ़ाइल पर लगाकर लोगों को आकर्षित किया करते थे. ऐसे में सोशल नेटवर्किंग साइटों का इस्तेमाल करने वाले लोगों का उनके प्रति जुड़ाव रखना स्वाभाविक ही था, लेकिन जब उन्होंने झूठे प्रोफ़ाइल वाले लोगों से मिलने की कोशिश की, तो उन्हें सारी असलियत पता चल गई. कई लोग अपनी तस्वीर तो असली लगाते हैं, लेकिन बाक़ी जानकारी झूठी देते हैं. झूठी प्रोफ़ाइल बनाने वाले या अपनी प्रोफ़ाइल में झूठी जानकारी देने वाले लोग महिलाओं को फांसकर उनसे विवाह तक कर लेते हैं. सच सामने आने पर उससे जुड़ी महिलाओं की ज़िन्दगी बर्बाद होती है. एक तरफ़ तो उसकी अपनी पत्नी की और दूसरी उस महिला की जिससे उसने दूसरी शादी की है.

एक ख़बर के मुताबि़क़,  अमेरिका में एक महिला ने सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर अपने पति की दूसरी पत्नी को खोज निकाला. फेसबुक पर बैठी इस महिला ने साइड में आने वाले पॉपअप ‘पीपुल यू मे नो’ में एक महिला को दोस्त बनाया. उसकी फेसबुक पर गई, तो देखा कि उसके पति की वेडिंग केक काटते हुए फोटो थी. समझ में नहीं आया कि उसका पति किसी और के घर में वेडिंग केक क्यों काट रहा है? उसने अपने पति की मां को बुलाया, पति को बुलाया. दोनों से पूछा, माजरा क्या है? पति ने पहली पत्नी को समझाया कि ज़्यादा शोर न मचाये, हम इस मामले को सुलझा लेंगे. मगर इतने बड़े धोखे से आहत महिला ने घर वालों को इसकी जानकारी दी. उसने अधिकारियों से इस मामले की शिकायत की. अदालत में पेश दस्तावेज़ के मुताबिक़  दोनों अभी भी पति-पत्नी हैं. उन्होंने तलाक़ के लिए भी आवेदन नहीं किया.  पियर्स काउंटी के एक अधिकारी के मुताबिक़, एलन ओनील नाम के इस व्यक्ति ने 2001 में एलन फल्क के अपने पुराने नाम से शादी की. फिर 2009 में पति ओनील ने नाम बदलकर एलन करवा लिया था और किसी दूसरी महिला से शादी कर ली थी. उसने  पहली पत्नी को तलाक़ नहीं दिया था.

दरअसल, सोशल नेटवर्किंग साइट्स की वजह से रिश्ते तेज़ी से टूट रहे हैं. अमेरिकन एकेडमी ऑफ मैट्रीमोनियल लॉयर्स के एक सर्वे में यह बात सामने आई है. सर्वे के मुताबिक़ तलाक़ दिलाने वाले क़रीब 80 फ़ीसद वकीलों ने माना कि उन्होंने तलाक़ के लिए सोशल नेटवर्किंग पर की गई बेवफ़ाई वाली टिप्पणियों को अदालत में बतौर सबूत पेश किया है. तलाक़ के सबसे ज़्यादा मामले फेसबुक से जुड़े हैं. 66 फ़ीसद मामले फेसबुक से, 15 फ़ीसद माईस्पेस से, पांच फ़ीसद ट्विटर और 14 फ़ीसद मामले बाक़ी दूसरी सोशल नेटवर्किंग साइट्स से जुड़े हैं. इन डिजिटल फुटप्रिंट्स को अदालत में तलाक़ के एविडेंस के रूप में पेश किया गया.  अभिनेत्री इवा लांगोरिया ने बास्केट बाल  खिलाड़ी अपने पति टोनी पार्कर का तलाक़ दे दिया. इवा का आरोप है कि फेसबुक पर उसके पति टोनी और एक महिला की नज़दीकी ज़ाहिर हो रही थी. ब्रिटेन में भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स की वजह से तलाक़ के मामले तेज़ी से बढ़े हैं. अपने साथी को धोखा देकर ऑनलाइन बात करते हुए पकड़े जाने की वजह से तलाक़ के मामलों में इज़ाफ़ा हुआ है. ब्रिटिश न्यूज पेपर 'द सन' के मुताबिक़  पिछले एक साल में फेसबुक पर की गईं आपत्तिजनक टिप्पणियां तलाक़ की सबसे बड़ी वजह बनीं. रिश्ते ख़राब होने और टूटने के बाद लोग अपने साथी के संदेश और तस्वीरों को तलाक़ की सुनवाई के दौरान इस्तेमाल कर रहे हैं.

सोशल नेटवर्किंग साइट की वजह से खु़दकशी के मामले भी सामने आए हैं. एक चर्चित मामला है जमशेदपुर की 22 वर्षीय आदिवासी छात्रा मालिनी मुर्मू का, जिसने अपने प्रेमी के रवैये से आहत होकर ख़ुदकुशी कर ली थी. उसका बेंगलूर में ही रहने वाले उसके ब्वायफ्रेंड से कथित तौर पर कुछ मनमुटाव और कहासुनी हुई थी. इसके बाद लड़के ने फेसबुक में अपने वॉल पर एक संदेश में लिखा था- 'मैं आज बहुत आराम महसूस कर रहा हूं. मैंने अपनी गर्लफ्रेंड को छोड़ दिया है. अब मैं स्वतंत्र महसूस कर रहा हूं. स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं.'  मामले की जांच कर रहे अधिकारियों के मुताबिक़ सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर मालिनी के ब्वॉयफ्रैंड ने उससे संबंध तोड़ लिए थे. इससे उसे गहरा आघात लगा और उसने क्लास में भी जाना छोड़ दिया. क्लास में उसे नहीं पाकर जब उसके दोस्त हॉस्टल के कमरा नंबर 421 में गए, तो उसने दरवाज़ा नहीं खोला. गार्ड्स को बुलाकर दरवाज़ा तुड़वाया गया. कमरे के भीतर मालिनी का शव पंखे से झूलता मिला. मालिनी ज़िन्दगी में एक बड़ा मुक़ाम हासिल करना चाहती थी. उसने साकची के राजेंद्र विद्यालय से दसवीं की पढ़ाई की थी. इसके बाद उसने उड़ीसा के आईटीई से बारहवीं पास की. वह आईआईएम बेंगलुरू में एमबीए प्रथम वर्ष की छात्रा थी. लैपटॉप में छोड़े अपने सुसाइड नोट में उसने लिखा है- ‘उसने मुझे छोड़ दिया, इसलिए आत्महत्या कर रही हूं.’ माना ज़िन्दगी में प्रेम की भी अपनी अहमियत है. मगर प्रेम ही तो सबकुछ नहीं है. ज़िन्दगी बहुत ख़ूबसूरत है...और उससे भी ख़ूबसूरत होते हैं हमारे इंद्रधनुषी सपने .हमें अपनी भावनाएं ऐसे व्यक्ति से नहीं जोड़नी चाहिए, जो इस क़ाबिल ही न हो. जिस तरह पूजा के फूलों को कूड़ेदान में नहीं फेंका जा सकता, उसी तरह अपने प्रेम और इससे जुडी कोमल भावनाओं को किसी दुष्ट प्रवृति के व्यक्ति पर न्योछावर नहीं किया जा सकता.

दरअसल, सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जहां कुछ फ़ायदें हैं, वहीं नुक़सान भी हैं. इसलिए सोच-समझ कर ही इनका इस्तेमाल करें. अपने आसपास के लोगों को वक़्त दें, उनके साथ रिश्ते निभाएं. सोशल नेटवर्किंग साइट्स के आभासी मित्रों से परस्पर दूरी बनाकर रखें.  कहीं ऐसा न हो कि आभासी फ़र्ज़ी दोस्तों के चक्कर में आप अपने उन दोस्तों को खो बैठें, जो आपके सच्चे हितैषी हैं.

वाल्ट व्हिटमेन के शब्दों में " ओ राही! अगर तुझे मुझसे बात करने की इच्छा हुई, तो मैं भी तुझसे क्यों न बात करूं...
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कुछ लोग


कुछ लोग घर में साथ रहते हैं, कुछ फ़ोन पर साथ रहते हैं, कुछ फ़ेसबुक पर साथ रहते हैं और कुछ वट्सअप पर घंटों साथ रहते हैं... लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हुआ करते हैं, जो घर में साथ नहीं रहते, फ़ोन, फ़ेसबुक या वट्सअप पर भी घंटों साथ नहीं रहते... लेकिन वो लोग एक-दूसरे के दिलों में हमेशा बसते हैं... दुआओं में हमेशा रहते हैं, उनके नाम के बिना कोई दुआ मुकम्मल नहीं हुआ करती... 
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फूल और तालाब


फ़िरदौस ख़ान
पानी से भरा एक तालाब था. उसमें एक मेंढक रहता था. तालाब में एक कमल का फूल भी था. तीनों की ज़िन्दगी बहुत अच्छी तरह से गुज़र रही थी. तीनों बहुत ख़ुश थे. मौसम ने करवट ली और सूखा पड़ गया. दूर-दूर तलक बादल का एक टुकड़ा भी नज़र नहीं आता था. ऊपर से शिद्दत की गर्मी पड़ रही थी. तालाब सूखने लगा. मेंढक पानी की तलाश में दूसरी जगह चला गया. तालाब उदास हो गया. उसका साथी बिछड़ गया था, लेकिन वो कर भी क्या सकता था. जाने वाले को कोई रोक सका है भला. तालाब दिनोदिन सूख रहा था. जैसे-जैसे तालाब का पानी कम होने लगा, वैसे-वैसे कमल का फूल भी मुरझाने लगा. तालाब ने उससे कहा कि वह भी यहां से कहीं और चला जाए, वरना एक दिन सूख जाएगा. फूल ने जाने से इंकार कर दिया और कहा- हम साथी हैं, हर हाल में साथ रहेंगे. मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा, जो तुम्हारा हाल होगा, वही मेरा हाल होगा.
एक दिन तालाब सूख गया और उसके साथ-साथ फूल भी सूख गया.
कभी किसी से मुहब्बत करो, तो कमल के फूल की तरह करना. जो तालाब के सूखने के साथ ख़ुद भी सूख जाता है.
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पानी और मछली


फ़िरदौस ख़ान
एक मछली थी. पानी के एक ज़ार में रहती थी. अकसर वो पानी से कहती-तुम ही मेरी ज़िन्दगी हो. मुझे तुमसे बेपनाह मुहब्बत है. तुम्हारे बिना मैं ज़िन्दगी का तसव्वुर भी नहीं कर सकती. पानी को मछली की बातें सुनकर बहुत ख़ुशी मिलती. वो ख़ुद पर और मछली पर नाज़ करने लगा. गरमी का मौसम शुरू हुआ और गरमी की शिद्दत से ज़ार का पानी सूखने लगा. और एक दिन ज़ार का पानी बहुत कम रह गया. फिर क्या था. मछली छलांग लगाकर दूसरे ज़ार में चली गई, दूसरे पानी के पास.
पहले ज़ार का सूखता पानी उसे देखता रहा. मछली बहुत ख़ुश थी. पानी का वजूद पल-पल ख़त्म हो रहा था, लेकिन वो हर लम्हा मछली को दुआएं दे रहा था. यही तो मुहब्बत है. ख़ुद को मिटाकर भी अपने महबूब के लिए ख़ुशी चाहना.
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जहां क़दम ले चलें


बहुत दिनों से कहीं जाना चाहते हैं... लेकिन कहां, यह मालूम नहीं है... पर इतना ज़रूर है कि कहीं जाना है... किसी पहाड़ पर... क़ुदरत के बेहद क़रीब... जहां कल-कल करती बहती नदी हो... देर तक नदी के पानी में पैर लटका कर बैठे रहें... जहां झर-झर झरते झरने हों... जिसे देर तक निहारते रहें... किसी पहाड़ी सड़क पर दूर तक पैदल चलते रहें किसी अनजान राह पर... या फिर किसी ऐसी जगह जाएं, जहां दूर-दूर तक रेत ही रेत हो... रेतीले टीले हों... मरूस्थल में उगने वाले दरख़्त हों... गरम रेत में जब चलते-चलते थक जाएं, तो किसी घने दरख़्त की छाया में बैठ जाएं... या फिर समंदर के किनारे... जहां लहरों पर अठखेलियां करती सूरज की सुनहरी किरनें हो... कंकरीट की इन बस्तियों से दूर, बहुत दूर... जहां क़ुदरती नज़ारें हो...
बस, जाना है... कहीं भी... जहां क़दम ले चलें...
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ज़ख़्म


कहते हैं कि वक़्त हर ज़ख़्म भर देता है... लेकिन कुछ ज़ख़्म ऐसे हुआ करते हैं, जो कभी नहीं भरते...  बस इंसान को उन ज़ख़्मों का दर्द बर्दाश्त करने की आदत पड़ जाती है... वो अपनी तकलीफ़ को अपनी बनावटी मुस्कराहट के पीछे छुपाना सीख लेता है...
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फ़ितरत


इंसान की फ़ितरत कभी नहीं बदलती. वो जैसा होता है, वैसा ही रहता है.
एक शहज़ादी थी. उसे एक ऐसे लड़के से मुहब्बत हो गई, जो फटे-पुराने कपड़े पहने यहां-वहां घूमता रहता था. किसी ने कुछ खाने को दे दिया, तो खा लिया. शहज़ादी अकसर उसे देखती. उसे लड़के से हमदर्दी हो गई, जो बाद में मुहब्बत बन गई. शहज़ादी ने उस लड़के से शादी कर ली. उसे पहनने के लिए एक से एक अच्छे कपड़े दिए. खाने के लिए एक से बढ़कर एक पकवान दिए.
लेकिन शादी के बाद से लड़का दुबला होने लगा. शहज़ादी बहुत परेशान हो गई. उसने बड़े-बड़े हकीमों को उसे दिखाया, लेकिन लड़के की कमज़ोरी दिनोदिन बढ़ती चली जा रही थी. एक रोज़ वज़ीर ने शहज़ादी से कहा कि मैं लड़के का इलाज कर सकता हूं, लेकिन मैं जैसा कहूंगा, वैसा ही करना होगा. शहज़ादी मान गई. महल में जगह-जगह उस तरह का खाना रख दिया गया, जैसा वो शादी से पहले खाता था. कुछ ही दिनों में लड़का फिर से तंदुरुस्त हो गया.
शहज़ादी ने वज़ीर से इसकी वजह पूछी, तो उसने कहा कि इंसान की फ़ितरत कभी नहीं बदलती. इसे दिनभर रूखा-सूखा खाने की आदत थी और आप इसे भरपेट लज़ीज़ पकवान खिलाती थीं.
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उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे


फ़िरदौस ख़ान
कैफ़ियात मशहूर शायर कै़फ़ी आज़मी के सात काव्य संग्रहों का संकलन है, जिसमें इनकार, आख़िर-ए-शब, मसनवी, आवारा सजदे, इब्लीस की मजलिस-ए-शूरा, इब्लीस की मजलिस-ए-शूरा: दूसरा इजलास और मुतफ़र्रिक़ात शामिल हैं. 19 जनवरी, 1909 को उत्तर प्रदेश के आज़मढ़ ज़िले के गांव मिज्वां में जन्मे कै़फ़ी आज़मी का असली नाम अख़्तर हुसैन रिज़वी था. उन्होंने फ़िल्मों में भी गीत लिखे, जिन्हें सुनकर आज भी लोग झूम उठते हैं. उन्हें कई राष्ट्रीय पुरस्कार मिले. 1970 में उन्हें फ़िल्म सात हिंदुस्तानी के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार प्रदान किया गया. इसके बाद 1975 में उन्हें आवारा सजदे के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड से नवाज़ा गया. इसी साल उन्हें फ़िल्म गरम हवा के लिए फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार भी मिला. 10 मई, 2002 को मुंबई में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया. उनकी मौत के क़रीब एक दशक बाद यह संकलन प्रकाशित हुआ है. इस बारे में शबाना आज़मी कहती हैं, कैफ़ियात कै़फ़ी साहब की कुल्लियात (समग्र) है. इसे उनकी ज़िंदगी में प्रकाशित होना चाहिए था, मगर ऐसा नहीं हो सका. मुझे इसका ग़म है.

अपने बारे में कै़फ़ी आज़मी कहते थे, अपने बारे में यक़ीन के साथ सिर्फ़ इतना कह सकता हूं कि मैं महकूम (ग़ुलाम) हिंदुस्तान में पैदा हुआ, आज़ाद हिंदुस्तान में बूढ़ा हुआ और सोशलिस्ट हिंदुस्तान में मरूंगा. यह किसी मज्ज़ूब की बड़ या दीवाने का सपना नहीं है. समाजवाद के लिए सारे संसार में और खु़द मेरे अपने देश में एक मुद्दत से जो अज़ीम जद्दोजहद हो रही है, उससे हमेशा जो मेरा और मेरी शायरी का ताल्लुक़ रहा है, इस यक़ीन ने उसी की कोख से जन्म लिया है.

कै़फ़ी आज़मी की चार बहनों की टीबी से मौत हो गई थी. इसलिए उनके वालिद सोचते थे कि उन्होंने अपने बेटों को अंग्रेज़ी तालीम दी है, इसलिए यह सब हो रहा है. उन्होंने फ़ैसला किया कि वह कै़फ़ी को मौलवी बनाएंगे और इसके लिए उन्हें लखनऊ में सुल्तानुलमदारिस में दाख़िल करा दिया गया. यहां कै़फ़ी ने छात्रों के साथ मिलकर एक कमेटी बनाई और अपनी मांगें पूरी कराने के लिए मुहिम शुरू कर दी. उन्होंने बैठकें कीं, हड़तालें कीं और आख़िर में अपनी मांगें मनवा कर ही दम लिया. इसी दौरान उन्होंने प्राइवेट इम्तिहान देकर कई डिग्रियां हासिल कर लीं, जिनमें लखनऊ यूनिवर्सिटी से दबीर माहिर (फ़ारसी), दबीर कामिल (फ़ारसी), आलिम (अरबी) और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से आला क़ाबिल (उर्दू), मुंशी (फ़ारसी) और मुंशी कामिल (फ़ारसी) शामिल हैं. बक़ौल अफ़साना निगार आयशा सिद्दीक़ी, कै़फ़ी साहब को उनके बुज़ुर्गों ने एक दीनी मदरसे में इसलिए दा़ख़िल किया था कि वहां यह फ़ातिहा पढ़ना सीख जाएंगे. कै़फ़ी साहब इस मदरसे में मज़हब पर फ़ातिहा पढ़कर निकल आए. कै़फ़ी साहब ने ग्यारह साल की उम्र में अपनी पहली ग़ज़ल लिखी थी. बेगम अख़्तर ने इसे अपनी आवाज़ दी और यह हिंदुस्तान और पाकिस्तान में मशहूर हो गई-
इतना तो ज़िंदगी में किसी की ख़लल पड़े
हंसने से हो सुकून, न रोने से कल पड़े...

किताब के शुरू में शबाना आज़मी भी अपने पिता की ज़िंदगी के कई प्रसंगों को बयां करती हैं. वह लिखती हैं, कै़फ़ी साहब की ज़िंदगी एक ऐसे इंसान, एक ऐसे शायर की कहानी है, जिसने ज़िंदगी को पूरी तरह भरपूर जी कर देखा है और चौरासी बरस की उम्र में भी उनके हौसलों में कोई थकान नहीं दिखाई दी. 8 फ़रवरी, 1973 को उन पर फ़ालिज का असर हुआ था. हम सबको लगा कि शायद आइंदा वह कुछ न कर सकें. पांच दिनों बाद उन्हें होश आया. वह मुश्किल से बोल सकते थे. उसी हालत में उन्होंने शमा ज़ैदी को एक नज़्म लिखवाई, धमाका. उस धमाके के बारे में जो उन्होंने पांच दिन पहले अपने दिमाग़ में महसूस किया था और उसी महीने में अस्पताल से निकलने से पहले ही उन्होंने अपनी एक नज़्म ज़िंदगी लिख डाली. मैं समझती हूं, ज़िंदगी उनकी बेहतरीन नज़्मों में से एक है-
आज अंधेरा मेरी नस-नस में उतर जाएगा
आंखें बुझ जाएंगी, बुझ जाएंगे अहसास-ओ-शऊर
और ये सदियों से जलता सा, सुलगता-सा वजूद
इससे पहले कि मेरी बेटी के वो फूल से हाथ
गर्म रुख़सार को ठंडक बख़्शें
इससे पहले कि मेरे बेटे का मज़बूत बदन
जान-ए-मफ्लूज में शक्ति भर दे
इससे पहले कि मेरी बीवी के होंठ
मेरे होंठों की तपिश पी जाएं
राख हो जाएगा जलते-जलते
और फिर राख बिखर जाएगी...

यह नज़्म निराशा और नाउम्मीदी पर नहीं, उस आशा और उम्मीद पर ख़त्म होती है कि एक दिन ज़िंदगी मौत से डरना छोड़ देगी. दरअसल उनकी बात सिर्फ़ एक इंसान के दिल की बात नहीं, दुनिया के सारे इंसानों के दिलों की बात हो जाती है और महसूस करते हैं कि उनकी शायरी में सिर्फ़ उनका नहीं, हमारा आपका सबका दिल धड़क रहा है.

कै़फ़ी आज़मी अपनी बेटी शबाना से बहुत स्नेह करते थे. 18 सितंबर, 1974 को लिखी उनकी नज़्म एक दुआ, में उनकी यही मुहब्बत झलकती है-
अब और क्या तेरा बीमार बाप देगा तुझे
बस इक दुआ कि खु़दा तुझको कामयाब करे
वह टांक दे तेरे आंचल में चांद और तारे
तू अपने वास्ते जिसको भी इंतिख़ाब करे...

उन्होंने अपनी पत्नी शौकत आज़मी को संबोधित करते हुए एक नज़्म इंतिसाब (समर्पण) लिखी, जिसमें वह कहते हैं-
ऐसा झोंका भी इक आया था कि दिल बुझने लगा
तूने उस हाल में भी मुझको संभाले रक्खा
कुछ अंधेरे जो मिरे दम से मिले थे तुझको
आफ़रीं तुझको कि नाम उनका उजाले रक्खा
मेरे ये सजदे जो आवारा भी, बदनाम भी हैं
अपनी चौखट पे सजा ले जो तेरे काम के हों...

कै़फ़ी को अपनी एक नज़्म बोसा के लिए अपने साथियों की आलोचना का शिकार होना प़डा था. हुआ यूं कि टेक्सटाइल वर्कर्स यूनियन के मज़दूरों की हड़ताल के दौरान कै़फी ने एक रूमानी नज़्म लिखी. मज़दूरों की हड़ताल नाकाम रही और उन्होंने इसके लिए उनकी नज़्म को ज़िम्मेदार ठहराया-
जब भी चूम लेता हूं इन हसीन आंखों को
सौ चिराग़ अंधेरे में झिलमिलाने लगते हैं
फूल क्या, शिगू़फे क्या, चांद क्या, सितारे क्या
सब रक़ीब क़दमों पर सर झुकाने लगते हैं
लम्हे भर को ये दुनिया ज़ुल्म छोड़ देती है
लम्हे भर को सब पत्थर मुस्कराने लगते हैं...

उनकी नज़्म अंदेशे भी लोकप्रिय नज़्मों में शुमार की जाती है. इसमें प्रेमिका की मनोस्थिति का शानदार तरीक़े से चित्रण किया गया है. नज़्म का एक-एक लफ़्ज़ दर्द को अपने में समेटे नज़र आता है-
दिल ने ऐसे भी कुछ अफ़साने सुनाए होंगे
अश्क आंखों ने पिए और न बहाए होंगे
बंद कमरे में जो ख़त मेरे जलाए होंगे
इक-इक हर्फ़ ज़मीं पे उभर आया होगा
उसने घबरा के नज़र लाख बचाई होगी
मिट के इक ऩक्श ने सौ शक्ल दिखाई होगी
मेज़ से जब मेरी तस्वीर हटाई होगी
हर तऱफ मुझको तड़पता हुआ पाया होगा...

वह तरक़्क़ी पसंद इंसान थे. उन्होंने हमेशा अपनी बीवी और बेटी को भी यही सिखाया कि उनमें आत्मविश्वास हो और वे अपने पैरों पर खड़ी हों, अपने सपनों को साकार करें. यह सोच उनके कलाम में भी झलकती है-
जिसमें जलता हूं उसी आग में जलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
ज़िंदगी जेहद में है, सब्र के क़ाबू में नहीं
नब्ज़-ए-हस्ती का लहू कांपते आंसू में नहीं
उड़ने खुलने में है नकहत, ख़म-ए-गेसू में नहीं
उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
गोशे-गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिए
फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिए
क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिए
ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिए
रुत बदल डाल अगर फलना-फूलना है तुझे...

वह गंगा-जमुनी तहज़ीब के पक्षधर थे. बाबरी मस्जिद की शहादत पर उन्होंने नज़्म दूसरा बनबास लिखी. इस नज़्म में सांप्रदायिकता पर कड़ा प्रहार किया गया है. कै़फ़ी आज़मी लिखते हैं-
राम बनबास से जब लौट के घर में आए
याद जंगल बहुत आया, जो नगर में आए
रक़्स-ए-दीवानगी आंगन में जो देखा होगा
छह दिसंबर को स्रीराम ने सोचा होगा
तुमने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थर
है मेरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो घर में आए
पांव सरजू में अभी राम ने धोए भी न थे
कि नज़र आए वहां खू़न के गहरे धब्बे
पांव धोए बिना सरजू के किनारे से उठे
राम यह कहते हुए अपने द्वारे से उठे
राजधानी की फ़िज़ा आई नहीं रास मुझे
छह दिसंबर को मिला दूसरा बनबास मुझे...

कै़फ़ियात एक बेहतरीन किताब है. इसकी ख़ास बात यह भी है कि इसमें फ़ारसी के शब्दों का हिंदी अनुवाद दिया गया है, ताकि ग़ैर उर्दू भाषी पाठकों को इसे समझने में मुश्किल पेश न आए. कै़फ़ी साहब का कलाम ख़ालिस उर्दू में है, इसलिए इससे उन लोगों को भी फ़ायदा होगा, जो उर्दू शायरी पसंद करते हैं, लेकिन फ़ारसी लिपि पढ़ नहीं सकते हैं. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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लोहड़ी पर विशेष : सुंदर मुंदरीए होए


फ़िरदौस ख़ान
लोहड़ी उत्तर भारत विशेषकर हरियाणा और पंजाब का एक प्रसिद्ध त्योहार है. लोहड़ी के की शाम को लोग सामोहिक रूप से आग जलाकर उसकी पूजा करते हैं. महिलाएं आग के चारों और चक्कर काट-काटकर लोकगीत गाती हैं. लोहड़ी का एक विशेष गीत है. जिसके बारे में कहा जाता है कि एक मुस्लिम फ़क़ीर था. उसने एक हिन्दू अनाथ लड़की को पाला था. फिर जब वो जवान हुई तो उस फ़कीर ने उस लड़की की शादी के लिए घूम-घूम के पैसे इकट्ठे किए और फिर धूमधाम से उसका विवाह किया. इस त्यौहार से जुड़ी और भी कई किवदंतियां हैं. कहा जाता है कि सम्राट अकबर के ज़माने में लाहौर से उत्तर की ओर पंजाब के इलाक़ों  में दुल्ला भट्टी नामक एक दस्यु या डाकू हुआ था, जो धनी ज़मींदारों को लूटकर ग़रीबों की मदद करता था.
जो भी हो, लेकिन इस गीत का नाता एक लड़की से ज़रूर है. यह गीत आज भी लोहड़ी के मौक़े पर ख़ूब गया जाता है.
लोहड़ी का गीत
सुंदर मुंदरीए होए
तेरा कौन बचारा होए
दुल्ला भट्टी वाला होए
तेरा कौन बचारा होए
दुल्ला भट्टी वाला होए
दुल्ले धी ब्याही होए
सेर शक्कर पाई होए
कुड़ी दे लेखे लाई होए
घर घर पवे बधाई होए
कुड़ी दा लाल पटाका होए
कुड़ी दा शालू पाटा होए
शालू कौन समेटे होए
अल्ला भट्टी भेजे होए
चाचे चूरी कुट्टी होए
ज़िमींदारां लुट्टी होए
दुल्ले घोड़ दुड़ाए होए
ज़िमींदारां सदाए होए
विच्च पंचायत बिठाए होए
जिन जिन पोले लाई होए
सी इक पोला रह गया
सिपाही फड़ के ले गया
आखो मुंडेयो टाणा टाणा
मकई दा दाणा दाणा
फकीर दी झोली पाणा पाणा
असां थाणे नहीं जाणा जाणा
सिपाही बड्डी खाणा खाणा
अग्गे आप्पे रब्ब स्याणा स्याणा
यारो अग्ग सेक के जाणा जाणा
लोहड़ी दियां सबनां नूं बधाइयां

यह गीत आज भी प्रासंगिक है, जो मानवता का संदेश देता है.

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झूठ


एक आशना ने हमें एक क़िस्सा सुनाया था...
यूनिवर्सिटी के एक प्रोफ़ेसर ने इंग्लिश की उत्तर पुस्तिका को जांचने से मना कर दिया... जब इसकी वजह पूछी गई, तो प्रोफ़ेसर ने कहा कि पहले सफ़े पर English की जगह Inglish लिखा है... जिसने English लफ़्ज़ ही सही नहीं लिखा, उसकी उत्तर पुस्तिका का अगला वर्क़ क्यों खोला जाए...
जो शख़्स बातचीत की शुरुआत ही झूठ से करे, फिर उससे गुफ़्तगू का सिलसिला ही क्यों रखा जाए...


  • कुछ लोग महान हुआ करते हैं, और कुछ लोग महान होने का स्वांग रचते हैं... ये दुनिया स्वांग रचने वाले की ही वाहवाही करती है... दुनिया की एक तल्ख़ हक़ीक़त यह भी है...
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बदलाव


इंसान हमेशा एक जैसा रहे, ये ज़रूरी तो नहीं... बाज़ दफ़ा अच्छे लोग बाद में बुरे हो जाते हैं, और बुरे लोग अच्छे बन जाते हैं... ज़िन्दगी में कई मोड़ ऐसे आया करते हैं कि इंसान बदल जाता है...
तक़रीबन चार बरस पहले की बात है... जिस इमारत में हमारी सहेली का फ़्लैट है, उसमें बनी एक दुकान एक शख़्स ने ख़रीदी और किराने की दुकान खोल ली... वो शख़्स की एक बहुत बुरी आदत थी कि वह हर लड़की-औरत को देखकर फ़िल्मी गाने गाता... नतीजतन, उस इलाक़े की औरतें उसे बुरा-भला कहतीं... कई औरतें कहतीं कि हम तो उस तरफ़ से भी नहीं जाते, रास्ता बदल लेते हैं, भले ही ज़्यादा क़दम चलना पड़े...
एक दिन हम अपनी सहेली के साथ नीचे उतरे, तो उसने देखकर गाना शुरू कर दिया... हमने कहा कि बहनों को देखकर भाई ऐसे गाने नहीं गाया करते...

एक रोज़ एक औरत उसे कोसने लगी... हमने कहा कि आप उसे क्यों कोसती हैं... दुआ करें कि ख़ुदा उसे हिदायत दे और वो सुधर जाए... इस वाक़िये के कुछ दिन बाद सुनने में आया कि उसकी दुकान में आग लग गई, काफ़ी नुक़सान हुआ... कुछ रोज़ बाद एक हादसे में वह ज़ख़्मी हो गया... हमारा वहां से गुज़रना हुआ, तो हमने उससे उसकी ख़ैरियत पूछी और कहा कि भाई अपना ख़्याल रखा करें...

वो दिन है और आज का दिन है... अब वो न तो किसी लड़की या औरत को देखकर कोई गाना गाता है न ही इमारत के आसपास किसी को फ़िज़ूल में ख़ड़े होने देता है...

एक रोज़ हमने उससे कहा कि हमारी सहेली घर पर अकेली है, इसलिए वह मेन गेट बंद करना चाहती है... उसका जो फ़्लैट ख़ाली पड़ा है, उसमें उसे कोई काम है, तो कर ले, ताकि वह दरवाज़ा बंद कर सके...
उसने कहा कि किसी तरह की फ़िक्र मत करना, तुम्हारा भाई नीचे ही है...
अब वह शख़्स आते-जाते सलाम करता है और ख़ैरियत पूछता है... कोई इतने जल्दी इतना बदल भी सकता है, कुछ लोग ये देखकर हैरान होते हैं...
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नूर का क़तरा


मेरे महबूब !
इश्क़ के नूर का
एक क़तरा
मेरी रूह में समा गया
और
ज़िन्दगी मुकम्मल हो गई...
-फ़िरदौस ख़ान
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फूल पलाश के...


फूल पलाश के
वक़्त के समंदर में
यादों का जज़ीरा हैं
जिसके हर ज़र्रे में
ख़्वाबों की धनक फूटती है
फ़िज़ाओं में
चाहत के गुलाब महकते हैं
जिसकी हवाएं
रूमानी नगमें गुनगुनाती हैं
जिसके जाड़ों पर
कुर्बतों का कोहरा छाया होता है
जिसकी गर्मियों में
तमन्नाएं अंगडाइयां लेती हैं
जिसकी बरसात
रफाकतों से भीगी होती है
फूल पलाश के
इक उम्र का
हसीन सरमाया ही तो हैं...
-फ़िरदौस ख़ान
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न दैन्यम न पलायनम...


फ़िरदौस ख़ान
ज़िन्दगी सिर्फ़ ख़ुशहाली का ही नाम नहीं है... ज़िन्दगी में मुश्किलें भी आती हैं... अम्मी ने हमेशा यही सिखाया कि मुश्किलों से कभी डरना नहीं चाहिए... और न ही उनसे कभी भागना चाहिए, बल्कि हिम्मत के साथ उनका मुक़ाबला करना चाहिए... हिम्मत वाले लोग मुश्किल से मुश्किल हालात में भी अपना वजूद बनाए रखते हैं...

बहुत से लोग ऐसे होते हैं, जो ज़रा-ज़रा सी मुश्किल से भी घबरा जाते हैं और बुज़दिलों की तरह भाग खड़े होते हैं...
ज़िन्दगी में कभी भी बुज़दिलों पर यक़ीन नहीं करना चाहिए...

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ख़ुशनसीब औरतें


बहुत कम ही ऐसी ख़ुशनसीब औरतें होती हैं, जिनके शौहर उनकी पसंद के होते हैं... ज़्यादातर के शौहर उनके परिवार वालों की पसंद के ही होते हैं... कुछ औरतें उन्हें अपनी पसंद का बनाने की कोशिश करती हैं... कुछ उन्हें उनके हाल पर ही छोड़ देती हैं और इसे क़िस्मत का लिखा मानकर सब्र कर लेती हैं...
ठीक यही बात मर्दों पर भी लागू होती है... 
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कहानी जनवरी की...


फ़िरदौस ख़ान
रोमन देवता 'जेनस' के नाम पर साल के पहले महीने जनवरी का नाम रखा गया. मान्यता है कि जेनस के दो चेहरे हैं. एक से वह आगे और दूसरे से पीछे देखता है. इसी तरह जनवरी के भी दो चेहरे हैं. एक से वह बीते हुए साल को देखता है और दूसरे से अगले साल को. जेनस को लैटिन में जैनअरिस कहा गया. जेनस बाद में जेनुअरी बना, फिर हिन्दी में जनवरी हो गया.
जनवरी का महीना बहुत ख़ास होता है... मौसम के हिसाब से भी और त्यौहारों के लिहाज़ से भी. इस महीने में कई त्यौहार आते हैं. मकर संक्रान्ति का पावन पर्व इसी माह में आता है. इसी महीने में यानी पौष मास में सूर्य मकर राशि में दाख़िल होता है. मकर संक्रान्ति के दिन से सूर्य की उत्तरायण गति शुरू हो जाती है.
देश के अलग-अलग प्रदेशों में इसे अपने-अपने तरीक़े से मनाया जाता है. हरियाणा-पंजाब में मकर संक्रांति से एक दिन पहले यानी 13 जनवरी को लोहड़ी धूमधाम से मनाई जाती है. गुजरात में पतंग उत्सव का आयोजन होता है. उत्तर प्रदेश में माघ मेला लगता है. तमिलनाडु में पोंगल और असम में माघ बिहू की धूम रहती है. ये सभी त्यौहार 13 से 24 जनवरी के बीच मनाए जाते हैं. फिर 26 जनवरी को आता है राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस...
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हज़रत जुनैद बग़दादी


फ़िरदौस ख़ान
जुनैद बग़दादी प्रसिध्द सूफ़ी संत हैं. वे संत हज़रत सक्ती क़े भांजे और शिष्य थे. उन्हें शिक्षा और अमल का उद्गम माना जाता है. ईश्वर भक्ति और त्याग के प्रतीक संत जुनैद बग़दादी ने लोगों को कर्तव्य पालन और लोककल्याण का संदेश दिया. इसके बावजूद उनके विरोधी उन्हें अधर्मी और काफ़िर कहकर पुकारते थे.

बचपन में जब एक दिन वे मदरसे से आ रहे थे तो उन्होंने रास्ते में अपने पिता को रोते हुए देखा. उन्होंने इसका कारण पूछा तो उनके पिता ने बताया कि आज मैंने कुछ दिरहम (मुद्रा) तुम्हारे मामा हज़रत सक्ती को भेजे थे, लेकिन उन्होंने इन्हें लेने से साफ़ इंकार कर दिया. जब ईश्वर के भक्तों को मेरे कडे परिश्रम की कमाई पसंद नहीं तो फिर मेरा जीवन भी व्यर्थ है. जुनैद बग़दादी पिता से दिरहम लेकर अपने मामा की कुटिया पर पहुंचे. हज़रत सक्ती ने पूछा कौन है? उन्होंने जवाब दिया कि मैं जुनैद हूं और अपने पिता की ओर से भेंट लेकर आया हूं, इसे स्वीकार कर कृतार्थ कीजिए. मगर जब जुनैद ने इसे लेने से साफ़ इंकार कर दिया तो उन्होंने कहा कि आपको उस ईश्वर का वास्ता जिसने आप को संत बनाया और मेरे पिता को सांसारिक व्यक्ति बनाकर दोनों के साथ ही न्याय किया है. मेरे पिता ने अपना कर्तव्य पूरा किया और अब आप अपने नैतिक दायित्व का पालन करें. उनकी यह बात सुनकर हज़रत सक्ती ने दरवाज़ा खोल दिया और उन्हें गले से लगा लिया. उसी दिन हज़रत सक्ती ने जुनैद को अपना शिष्य बना लिया.

सात साल की छोटी उम्र में वे अपने पीर हज़रत सक्ती के साथ मक्का की यात्रा पर गए थे. तभी वहां सूफियों में आभार की परिभाषा पर चर्चा हो रही थी. सबने अपने-अपने विचार रखे. हज़रत सक्ती ने उनसे भी अपने विचार व्यक्त करने को कहा. गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए उन्होंने कहा कि आभार की परिभाषा यह है, जब ईश्वर सुख-एश्वर्य दे तो इसे लेने वाला इसके कारण अल्लाह की अवज्ञा न करे. मक्का से वापस आकर उन्होंने शीशों की दुकान खोली, मगर दुकानदारी में उनका ज़रा भी मन नहीं लगा. वे कहते हैं कि मनुष्य को नैतिक शिक्षा अपने आसपास के वातावरण से ही मिल जाती है. निष्ठा की शिक्षा उन्होंने एक हज्जाम से प्राप्त की थी. एक बार मक्का में वे एक हज्जाम के पास गए तो देखा कि वे किसी धनवान की हजामत बना रहा है. उन्होंने उससे आग्रह किया कि वह ईश्वर के लिए उनकी भी हजामत बना दे. यह सुनकर हज्जाम ने धनवान की हजामत छोड़कर उनके बाल काटने शुरू कर दिए. बाल काटने के बाद हज्जाम ने उनके हाथ में एक पुडिया दी, जिसमें कुछ रेज़गारी लिपटी हुई थी और कहा कि इसे अपने काम में ख़र्च कर लेना. पुडिया लेकर उन्होंने संकल्प लिया कि उन्हें जो कुछ मिलेगा उसे वे इस हज्जाम को दे देंगे. कुछ समय बाद बसरा में एक व्यक्ति ने अशर्फियों से भरी थैली उन्हें भेंट की. वे उस थैली को लेकर हज्जाम के पास गए. थैली देखकर हज्जाम ने कहा कि उसने तो उनकी सेवा केवल अल्लाह के लिए की थी, इसलिए वह इसे स्वीकार नहीं कर सकता.

जुनैद बग़दादी कहते हैं कि अल्लाह के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कभी भी किसी पर उपकार करके अहसान नहीं जताता और न ही उसके बदले में उससे कुछ चाहता है. वे लोगों को नेकी और सच्चाई के रास्ते पर चलने की सीख देते हुए कहते हैं कि व्यक्ति को सीमित साधनों में ही प्रसन्न रहना चाहिए. सुख-दुख जीवन के दो पहलू हैं. जिस अल्लाह ने सुख दिया है, दुख भी उसी की देन है. इसलिए मनुष्य को दुखों से घबराने की बजाय सदा अपने कर्तव्यों का पालन करते रहना चाहिए. वे स्वयं भी रूखी-सूखी रोटी खाकर गुज़ारा करते थे. अमीर उन्हें बहुमूल्य रत्न और वस्तुएं भेंट करते थे, लेकिन वे इन्हें लेने से साफ इंकार कर देते थे. वे कहते थे कि सूफियों को धन की ज़रूरत नहीं है. अगर कोई उन्हें कुछ देना ही चाहता है तो वे ज़रूरतमंदों की मदद करे, जिससे ईश्वर भी उससे प्रसन्न रहे. वे अपने साथ बुरा बर्ताव करने वाले लोगों को उनकी गलती के लिए माफ करके उनकी भी मदद करते थे. एक बार चोर ने उनका कुर्ता चुरा लिया और दूसरे दिन जब बाज़ार में उन्होंने चोर को कुर्ता बेचते देखा. ख़रीदने वाला चोर से कह रहा था कि अगर कोई गवाही दे दे कि यह माल तेरा ही है तो मैं ख़रीद सकता हूं. उन्होंने कहा कि मैं वाकिफ़ हूं. यह सुनकर ख़रीदार ने कुर्ता ख़रीद लिया.

उनका कहना था कि तकलीफ़ पर शिकायत न करते हुए सब्र करना बंदगी की बेहतर अलामत है. सच्चा बंदा वही है जो न तो हाथ फैलाए और न ही झगड़े. तवक्कुल सब्र का नाम है जैसा कि अल्लाह फ़रमाता है कि वे लोग जो सब्र करते हैं और अपने मालिक पर भरोसा करते हैं. सब्र की परिभाषा यह है कि जो लोगों से दूर करके अल्लाह के करीब कर दे. तवक्कुल का मतलब यह है कि तुम अल्लाह के ऐसे बंदे बन जाओ जैसे आदिकाल में थे. फ़रमाया कि यकीन नाम है इल्म का, दिल में इस तरह बस जाने का जिसमें बदलाव न हो सके. यकीन का मतलब यह है कि गुरूर को छोड़कर दुनिया से बे नियाज़ हो जाओ. उनका यह भी कहना था कि जिसकी ज़िन्दगी रूह पर निर्भर हो वह रूह निकलते ही मर जाता है और जिसकी ज़िन्दगी का आधार ख़ुदा पर हो वह कभी नहीं मरता, बल्कि भौतिक जिन्दगी से वास्तविक ज़िन्दगी हासिल कर लेता है. फरमाया अल्लाह की रचना से प्रेरणा हासिल न करने वाली आंख का अंधा होना ही अच्छा है और जो जबान अल्लाह के गुणगान से महरूम हो उसका बंद होना ही बेहतर है. जो कान हक़ की बात सुनने से मजबूर हो उसका बहरा होना अच्छा है और जो जिस्म इबादत से महरूम हो उसका मुर्दा होना ही बेहतर है.

वे भाईचारे और आपसी सद्भाव में विश्वास रखते थे. एक बार किसी ने उनसे कहा कि आज के दौर में दीनी भाइयों की कमी है. इस पर उन्होंने जवाब दिया कि तुम्हारे विचार में दीनी भाई केवल वे हैं जो तुम्हारी परेशानियों को हल कर सकें तब तो निश्चित ही वे कम हैं और अगर तुम वास्तविक दीनी भाइयों की कमी समझते हो तो तुम झूठे हो, क्योंकि दीनी भाई का वास्तविक अर्थ यह है कि जिनकी मुश्किलों का हल तुम्हारे पास हो और सारे मामलों को हल करने में तुम्हारी मदद शामिल हो जाए और ऐसे दीनी भाइयों की कमी नहीं है. जुनैद बग़दादी की यह बात आज भी समाज के लिए बेहद प्रासंगिक है.

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