जाड़ों की सहर


कितनी दिलकश होती है
जाड़ों की
कोहरे से ढकी सहर
जब
सुर्ख़ गुलाबों की
नरम पंखुरियों पर
ओस की बूंदें
इतराती हैं
और फिर
किसी के
लम्स का अहसास
रूह की गहराई में
उतर जाता है
रग-रग में
समा जाता है
जाड़े बीतते रहते हैं
मौसम-दर-मौसम
वक़्त की, परतों की तरह
मगर
अहसास की वो शिद्दत
क़ायम रहती है
दूसरे पहर की
गुनगुनी धूप की तरह...
-फ़िरदौस ख़ान
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8 Response to "जाड़ों की सहर"

  1. seema gupta says:
    22 सितंबर 2008 को 9:06 am

    अहसास की वो शिद्दत
    क़ायम रहती है

    दूसरे पहर की
    गुनगुनी धूप की तरह...
    "very touching and loving words"

    Regards

  2. seema gupta says:
    22 सितंबर 2008 को 9:06 am

    अहसास की वो शिद्दत
    क़ायम रहती है

    दूसरे पहर की
    गुनगुनी धूप की तरह...
    "very touching and loving words"

    Regards

  3. रंजना [रंजू भाटिया] says:
    22 सितंबर 2008 को 12:10 pm

    मगर
    अहसास की वो शिद्दत
    क़ायम रहती है
    दूसरे पहर की
    गुनगुनी धूप की तरह...

    बहुत सुंदर ..

  4. मौसम says:
    22 सितंबर 2008 को 12:45 pm

    और फिर
    किसी के
    लम्स का अहसास
    रूह की गहराई में
    उतर जाता है
    रग-रग में
    समा जाता है
    जाड़े बीतते रहते हैं
    मौसम-दर-मौसम
    वक़्त की, परतों की तरह
    मगर
    अहसास की वो शिद्दत
    क़ायम रहती है

    दूसरे पहर की
    गुनगुनी धूप की तरह...


    सुब्हान अल्लाह... बेहद ख़ूबसूरत नज़्म है...

  5. shahroz says:
    22 सितंबर 2008 को 5:02 pm

    अहसास की वो शिद्दत
    क़ायम रहती है

    दूसरे पहर की
    गुनगुनी धूप की तरह...

    अंतिम पंक्तियाँ बहुत प्रभावी है.
    दूर तक और देर तक स्मरण में रहेंगी.
    आपने मेरे इक ब्लॉग का लिंक दिया है ,देख कर अच्छा लगा.

  6. ashok priyaranjan says:
    22 सितंबर 2008 को 7:52 pm

    < jade ki subah ka bhut sundar aur sajeev chitran kiya hai aapney.>
    < sabdon ko bahut khoobsurati sey nazm mein piroya hai.>

  7. विक्रांत बेशर्मा says:
    22 सितंबर 2008 को 8:36 pm

    अहसास की वो शिद्दत
    क़ायम रहती है

    दूसरे पहर की
    गुनगुनी धूप की तरह...

    बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति है !!!!!!!!!!!

  8. Udan Tashtari says:
    22 सितंबर 2008 को 8:55 pm

    बेहतरीन..आभार.

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