जाड़ों की गुलाबी शाम...

जाड़ों की
एक गुलाबी शाम को
जब
मग़रिब की तरफ़
सरकता सूरज
दूर उफ़्क़ पर जाकर
कहीं खो जाता है
तो
सितारों के बेल-बूंटों से जड़ा
दुपट्टा ओढ़कर
रात आंगन में
उतर आती है
और फिर
जिस्म को छूकर गुज़रा
हवा का
इक सर्द झोंका
कितने बीते दिनों की
याद दिला जाता है
किताबों में रखे
सूखे गुलाबों की तरह...
-फ़िरदौस ख़ान
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6 Response to "जाड़ों की गुलाबी शाम..."

  1. अनिल कुमार वर्मा says:
    23 सितंबर 2008 को 9:46 am

    फिरदौस जी,
    जाड़ों की इस शाम के चित्रण ने दिल को छू लिया।

    सितारों के बेल-बूंटों से जड़ा
    दुपट्टा ओढ़कर
    रात आंगन में
    उतर आती है

    वाकई खूबसूरत चित्रण। अच्छी रचना के लिए बधाई।

  2. श्यामल सुमन says:
    23 सितंबर 2008 को 10:03 am

    जिस्म को छूकर गुज़रा
    हवा का
    इक सर्द झोंका
    कितने बीते दिनों की
    याद दिला जाता है
    किताबों में रखे
    सूखे गुलाबों की तरह...

    क्या बात है? बहुत भावपूर्ण है। मन को छूनेवाली

  3. Udan Tashtari says:
    23 सितंबर 2008 को 6:42 pm

    वाह! बहुत सुन्दर.बधाई.

  4. dr. ashok priyaranjan says:
    23 सितंबर 2008 को 11:29 pm

    subah key khoobsurat manzar ko bade salike sey shabdon sey sajaya hai.

  5. मौसम says:
    24 सितंबर 2008 को 11:54 am

    और फिर
    जिस्म को छूकर गुज़रा
    हवा का
    इक सर्द झोंका
    कितने बीते दिनों की
    याद दिला जाता है
    किताबों में रखे
    सूखे गुलाबों की तरह...


    दिल को छू लेने वाली नज़्म है...अरसे तक याद रहेगी...

  6. ज़ाकिर हुसैन says:
    25 सितंबर 2008 को 1:15 pm

    सितारों के बेल-बूंटों से जड़ा
    दुपट्टा ओढ़कर
    रात आंगन में
    उतर आती है

    वाकई खूबसूरत और दिलकश मंजर। दिल चुरा लिया आपकी इस नज़्म ने!!!!!!

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