पतझड़ में मुझको ख़ार का मौसम बहुत अज़ीज़...

पतझड़ में मुझको ख़ार का मौसम बहुत अज़ीज़
तन्हा उदास शाम का आल बहुत अज़ीज़

छोटी सी ज़िन्दगी में पीया है कुछ इतना ज़हर
लगने लगा है मुझको हर एक ग़म बहुत अज़ीज़

सहरा की धूप नज़र आती है ये हयात
जाड़ों की नर्म धूम सा हमदम बहुत अज़ीज़

सारी गुज़ारी उम्र ख़ुदा ही के ज़िक्र में
मोमिन की नात में ढली सरगम बहुत अज़ीज़

सूरज के साथ-साथ हूं आशिक़ बहारे-गुल
सावन बहुत अज़ीज़, है शबनम बहुत अज़ीज़
-फ़िरदौस ख़ान

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माहे-जून...


माहे-जून में गर्मी अपने शबाब पर हुआ करती है... आलम यह कि दिन के पहले पहर से ही लू चलने लगती है... गरम हवाओं की वजह से सड़कें भी सुनसान हो जाती हैं... धूल भरी आंधियां भी ऐसे चलती हैं, मानो सबकुछ उड़ा कर ले जाना चाहती हैं... दहकती दोपहरें भी अलसाई-सी लगती हैं... बचपन में इस मौसम में दिल नहीं लगता था... दादी जान कहा करती थीं कि ये हवाएं मन को अपने साथ बहा ले जाती हैं... इसलिए मन उड़ा-उड़ा रहता है... और कहीं भी मन नहीं लगता... तब से दादी जान की बात मान ली कि इस मौसम में ऐसा ही होता है... फिर भी हमें जून बहुत अच्छा लगता है... दहकती दोपहरें, गरम हवाएं, धूल भरी आंधियां... और किसी की राह तकती वीरान सड़क... वाक़ई, सबकुछ बहुत अच्छा लगता है... बहुत ही अच्छा... जैसे इस मौसम से जनमों-जनमों का नाता हो... एक  ख़ास बात यह है कि जून की शुरुआत ही हमारी सालगिरह यानी एक जून से होती है... और फिर उनकी सालगिरह भी तो इसी माह में है... 
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एक शख़्स ऐसा हो


इंसान अपनी ख़ुशियां तो किसी के भी साथ बांट सकता है, लेकिन उसे अपना ग़म बांटने के लिए किसी अपने की ही ज़रूरत हुआ करती है... ज़िन्दगी में एक शख़्स ऐसा ज़रूर होना चाहिए, जिससे आप अपने दिल की हर बात कह सकें, बिना ये सोचे कि वो क्या कहेगा. सबसे ख़ास बात ये कि वो यक़ीन के क़ाबिल हो...

अकसर होता ये है कि इंसान अपने दुख-दर्द, अपनी ख़्वाहिशात जिसके साथ बांटता है, वो ही उसी का तमाशा बनाकर रख देता है... वो अपने दोस्तों को उसकी ज़िन्दगी के बारे में बताता है और इस तरह एक ज़िन्दगी घर की चहारदीवारी से निकल सड़क पर आ जाती है...
(Firdaus Diary)

Insaan apni khushiyan to kisi ke saath bhi baant sakta hai, lekin use apna gham baantne ke lye kisi apne ki hi zaroorat hua karti hai... zindagi mein ek shakhs aisa zaroor hona chahiye, jisse aap apane dil ki har baat kah saken, bina ye soche ki wo kya kahega... sabse khaas baat ye ki wo yaqeen ke qaabil ho...

Aksar hota ye hai ki insaan apane dukh-dard, apni khxwaahishaat jisake saath baanta hai, wo hi usi ka tamasha banakar rakh deta hai... Wo apne doston ko uski zindagi ke baare mein batata hai aur is tarah ek zindagi ghar ki chahaardiwari se nikal kar sadak par aa jaati hai...
(Firdaus Diary)

तस्वीर गूगल से साभार
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छत और बारिश


फ़िरदौस ख़ान
पिछले साल सर्दियों की बात है... हमारे मायके में दूसरी मंज़िल बनाई गई... जगह काफ़ी बड़ी थी... दीवारें बनकर तैयार हो चुकी थीं... जिस दिन काम पूरा हुआ, उसी दिन शाम को बारिश शुरू हो गई... सब बहुत परेशान थे... सीमेंट बह जाने का डर, ऐसे में तो दीवारें गिर जाएंगी... तभी जल्दी-जल्दी सबने मिलकर दीवारों पर प्लास्टिक की शीटें, पन्नी और सीमेंट के ख़ाली कट्टे डालने शुरू कर दिए... सभी दुआ मांग रहे कि बारिश रुक जाए... अल्लाह के करम से बारिश रुक गई...

कुछ दिन बाद लैंटर डला... लेबर के जाते ही थोड़ी देर बाद फिर बूंदाबांदी शुरू हो गई... अब क्या हो... सब फिर परेशान... दुआ मांगने लगे कि बारिश रुक जाए, वरना छत ख़राब हो जाएगी... थोड़े देर बाद बारिश रुक गई... सबने अल्लाह का शुक्र अदा किया और राहत की सांस ली...  हालांकि अगले दिन शाम को फिर हल्की बारिश हुई, लेकिन अब ख़तरा नहीं था...

कुछ दिन बाद हमारी गली में दस-बारह घर छोड़ कर किसी ने छत पर कमरा बनवाया... शायद पंडितों का घर था... वहां सब इसी तरह बोलते हैं, यानी इसका घर, उसका घर, ख़ैर...
हमने छत से देखा, लैंटर डल रहा था... उसी दिन शाम को फिर बारिश शुरू हो गई... हर रोज़ का यही मामूल बन गया था... जब देखो बूंदा-बंदी... हमने अम्मी से कहा कि आज ही पड़ौस में लैंटर डला है और बारिश होने लगी... अम्मी दुआ करने लगी कि बारिश रुक जाए, वरना उनकी छत ख़राब हो जाएगी...
अम्मी को इस तरह दुआ मांगते देखकर बहुत अच्छा लगा... दूसरों के लिए भी इतनी फ़िक्र करने वाले भला कितने लोग होते होंगे... भले ही कम हों, लेकिन हैं तो सही... नेक लोगों की वजह से ही अभी तक दुनिया क़ायम है... जिस दिन नेकी ख़्त्म हो जाएगी, दुनिया भी नेस्तनाबूद हो जाएगी...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

तस्वीर गूगल से साभार
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सिगरेट


इंसान जिससे मुहब्बत करता है, उसकी हर चीज़ उसे अच्छी लगती है... अमृता प्रीतम साहिर लुधियानवी से बेपनाह मोहब्बत करती थीं... अपनी आत्मकथा 'रसीदी टिकट' में वो लिखती हैं कि किस तरह साहिर लाहौर में उनके घर आया करते थे और एक के बाद एक सिगरेट पिया करते थे... साहिर के जाने के बाद वो उनकी सिगरेट की बटों को दोबारा पिया करती थीं. इस तरह उन्हें सिगरेट पीने की लत लगी...

चेतावनी : सिगरेट सेहत के लिए नुक़सानदेह है

तस्वीर गूगल से साभार
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बेला के गजरे...


मेरे महबूब
तुमने कहा था
मेरे खुले बालों में लगे
बेला के गजरे
तुम्हें बहुत अच्छे लगते हैं
क्यूंकि
इन्हीं घनी ज़ुल्फ़ों के साये में
तुम्हारी रातें महकती हैं...
-फ़िरदौस ख़ान
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